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#Latehar: सुर्खियों में रही है डोंकी पंचायत, जहां से आया है कथित भूख से मौत का मामला

Pravin Kumar

Latehar: लातेहार जिले के डोंकी पंचायत में बीते 16 मई को कथित तौर पर भूख से मौत का मामला सामने आया था जिसे स्थानीय प्रशासन ने खारिज कर दिया. डोंकी पंचायत अपनी बेबसी को लेकर दशकों से चर्चा में रही है.

जेम्स हेरेंज बताते हैं कि डोंकी पंचायत पहली दफा 1990 ई में अखबार की सुर्खियों में आयी थी. उस वक्त तत्कालीन लातेहार अनुमण्डल पदाधिकारी (वर्तमान में झारखण्ड सरकार के मुख्य सचिव) सुखदेव सिंह डोंकी गांव जमीन विवाद की जांच में गये थे. उस दौरान कुछ लोगों ने उन्हें रोक लिया था.

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2009 में पंचायत के पगार गांव में जब मनिका प्रखण्ड विकास पदाधिकारी कैलाश साहू के साथ चिकित्सकों की टीम ने स्वास्थ्य कैम्प लगाया था तो उस वक्त भी नक्सली दस्ते ने उनको घेरने की कोशिश की थी.

तब अधिकांश कर्मी इधर-उधर भागने में सफल रहे थे, लेकिन प्रखण्ड आपूर्ति पदाधिकारी को रातभर दस्ते के लोगों ने पकड़कर रख लिया था.

फिर 2011 में लातेहार उपविकास आयुक्त सुधांशु भूषण राम को भी डोंकी ग्रामसभा में नक्सलियों के तीखे सवाल-जवाब का सामना करना पड़ा था.

16 मई को 5 वर्षीय निम्मी कुमारी की कथित तौर पर भूख से मौत का मामला सामने आया है. आज भी डोंकी पंचायत अपनी बेबसी और बदहाली के लिए जाना जाता है. यहां कोई रोजगार का साधन नहीं है. आदिवासी और दलित परिवार अपनी बदहाली के लिए जाने जाते हैं.

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पंचायत के 115 असहाय परिवारों की सूची बीडीओ को सौंपी गयी थी

#Latehar: सुर्खियों में रही है डोंकी पंचायत, जहां से आया है कथित भूख से मौत का मामला24 मार्च 2020 को देश के प्रधान मंत्री ने कोविड संक्रमण की रोकथाम के मद्देनजर संपूर्ण देश में 21 दिनों के तालाबन्दी की घोषणा कर दी. इस घोषणा से गरीब परिवार पूरी तरह प्रभावित हो गये.

झारखण्ड सरकार ने पूरे राज्य में किसी परिवार को खाद्य संकट का सामना करना न पड़े इसके लिए सभी ग्राम पंचायतों को आपदा राहत कोष से दस-दस हजार रुपये आवंटित किये थे.

इधर तालाबन्दी की अवधि लगातार बढ़ायी जाती रही, लेकिन ग्राम पंचायतों को आवांटित राशि में कोई वृद्धि नहीं की गयी जिससे ग्राम पंचायतों ने भी गरीबों को आवश्यक खाद्य सामग्री उपलब्ध कराने से हाथ खड़े कर दिये.

डोंकी के ग्राम पंचायत मुखिया ने 20 अप्रैल को ही पंचायत के 115 असहाय परिवारों की सूची मनिका के प्रखण्ड विकास पदाधिकारी को सौंप दी थी. लेकिन प्रखण्ड विकास पदाधिकारी ने किसी तरह का संज्ञान नहीं लिया. उक्त सूची में मृतका निम्मी कुमारी के परिवार का नाम भी था.

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टीबी की चपेट में आ चुके हैं जगलाल भुइयां

मृतका निम्मी का परिवार लगातार गरीबी का दंश झेलता रहा रहा है. डेढ़ साल पहले निम्मी के पिता जगलाल भुइयां टीबी बीमारी की चपेट में आ गये थे.

पिछले साल नवंबर में वह चन्दवा प्रखण्ड के सासंग-ब्रह्मणी इलाके के सुकलकट्ठा में अपने दो नाबालिग बच्चों के साथ ईंट बनाने के काम के लिए गये थे. वहां 1000 हजार ईंटे बनाने पर 600 रुपये मिलने की बात भट्ठा मालिक से तय हुई है.

सामान्य दिनों में वह 11 सौ से 12 सौ तक प्रतिदिन ईटें बना लेते हैं, लेकिन इस वर्ष बीच-बीच में बेमौसम बारिश के कारण उनका काम प्रभावित हुआ है.

उनकी मुश्किल ये है कि पैसे का पूरा हिसाब आखिरी में बरसात शुरू होने के पहले भट्ठा बन्द होने के समय किया जायेगा और तभी उन्हें पैसे मिलेंगे. बीच में उन्हें अपने घर में देने के लिए भी पैसे नहीं मिलते, सिर्फ उनके खाने के लिए ही पैसे मिलते हैं.

इलाके में प्रसव भी होता है घर में ही

मृतका निम्मी की मां ने जनवरी माह में आठवीं संतान को जन्म दिया था. तब उसके पिता जगलाल अपने घर आये थे. उस वक्त मालिक ने 1500 रुपये दिये थे. प्रसव घर पर ही हुआ था. फिर वे होली त्योहार तक घर में रहे.

त्योहार के बाद जब वापस काम पर जाने लगे थे तब वह घर के सदस्यों के लिए महज 15 किलो चावल इन्तजाम करके चले गये थे.

इसके बाद से घटना की तिथि तक परिवार के सदस्यों के लिए न पैसे भेज पाये थे और न ही खाद्यान्न. उनके पास राशन कार्ड भी नहीं है और मनरेगा के तहत् जॉब कार्ड भी नहीं था.

जर्जर आवास में रहने को विवश हैं वृद्ध सुरजी देवी

जर्जर आवास में रहने को विवश हैं वृद्ध सुरजी देवी.

मृतका निम्मी कुमारी के पड़ोस में ही स्व भोला भुइयां की पत्नी सुरजी देवी अकेली रहती हैं. वह भूमिहीन हैं. उन्हें वृद्धावस्था पेंशन मिलती है, जिससे उनका गुजारा चल रहा है.

लेकिन उसकी आर्थिक हालत ऐसी बिल्कुल भी नहीं है कि वह अपने रहने लायक एक छोटा-सा घर बना सके अथवा उसकी मरम्मति करा सके. अब उनके घर की दीवार इतनी जर्जर हो चुकी है कि उन्हें हमेशा ये भय सताता रहता है कि कहीं उनके घर में रहते दीवारें ढह न जायें.

उनकी हालत और जानकारी इतनी नहीं है कि वह सरकारी बाबुओं के दफ्तरों के चक्कर लगा सके.

निष्कर्ष

झारखड़ के सुदूर और पिछड़े इलाके की तसवीर आज भी झारखंड गठन के पूर्व की तरह लगती है. इन इलाकों में अगर राज्य सरकार के द्वारा विशेष फोकस नही किया जाता तो कई और दुखद घटनाएं सामने आ सकती हैं.

स्थानीय प्रशासन भी बदहाली वाले इलाकों के विकास में सही नीति राज्य को उन्नति के मार्ग पर ले जाने में मददगार सबित हो सकती है.

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