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लता मंगेशकर, आशा, मन्ना डे., एआर रहमान, हरिहरन और सोनू के गुरु गुलाम मुस्तफा खान नहीं रहे

पद्म श्री, पद्म भूषण औऱ पद्म विभूषण पुरस्कार से हो चुके हैं सम्मानित

Ranchi: भारतीय शास्त्रीय गायन के क्षेत्र के दिग्गज गायक गुलाम मुस्तफा खान का निधन हो गया है. खान साहब लता मंगेशकर, आशा भोसले, गीता दत्त और मन्ना डे जैसे गायक और गायिकाओं के गुरु रहे हैं. इसके साथ ही नयी पीढ़ी के सोनू निगम, हरिहरन और शान भी उनके शिष्य रहे हैं.

रामपुर-सहसवान घराने से ताल्लुक

वर्ष 1931 में बदायूं में जन्मे गुलाम मुस्तफा खान रामपुर-सहसवान घराने से ताल्लुक रखते हैं. अपनी प्रतिभा से उन्होंने देश-विदेश में यूपी का नाम रोशन किया. गुलाम मुस्तफा को 1991 में पद्मश्री, 2003 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, 2006 में पद्मभूषण और 2018 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया. गुलाम मुस्तफा खान ने बहुत छोटी उम्र में ही गाना शुरू कर दिया था.

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पहला पार्श्व गीत पहली ही बार में रिकार्ड हुआ

उनके पिता उस्ताद वारिस हुसैन खान ने उन्हें दो साल की उम्र में ही संगीत की शिक्षा देनी शुरू कर दी थी. जब वह आठ साल के थे तब उन्होंने एक जन्माष्टमी समारोह में पहली बार मंच पर अपनी प्रस्तुति दी थी.

उनका पहला पार्श्वगायन एक मराठी गीत के लिए था. इसे एक बार में ही रिकार्ड कर लिया गया था. संगीत निर्देशक भी हैरान थे कि पहली बार पाश्र्वगायन कर रहा कोई गायक इतने अच्छे से गाना गा सकता है.

फिल्मों में गाने के कई प्रस्ताव मिले लेकिन परंपरा को आगे बढ़ाना जरूरी समझा

मुस्तफा खान ने बाद में कुछ गुजराती और हिंदी फिल्मों के लिए भी गाया लेकिन उनका पहला शौक हमेशा से शास्त्रीय गायन ही रहा. उस्ताद खान कहते हैं कि फिल्मों में गाने के मुझे कई प्रस्ताव मिले लेकिन मैं एक पारंपरिक कलाकार हूं. मेरे पुरखों ने अपना पूरा जीवन हमारे घराने को विकसित करने के लिए समर्पित किया है. उस परंपरा को बनाए रखना मेरा कर्तव्य है.

शायद यही समर्पण है कि प्रसिद्ध तबला वादक उस्ताद जाकिर हुसैन ने उन्हें शास्त्रीय संगीतकार के रूप में अपनी पहली रिकॉर्डिंग के लिए श्रेय दिया. गुलाम मुस्तफा खान ने फिल्म्स डिवीजन द्वारा बनाई गई 70 से अधिक डॉक्यूमेंटरी फिल्मों को अपनी आवाज दी है. इनमें से कई को अंतर्राष्ट्रीय और राष्ट्रीय पुरस्कार मिल चुके हैं.

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रामपुर सहसवान घराने से संबंधित रहे हैं

उस्ताद गुलाम मुस्तफा खान के दादा उस्ताद इनायत हुसैन खान को रामपुर सहसवान घराने का संस्थापक माना जाता है. उस्ताद इनायत हुसैन खान को उस्ताद बहादुर हुसैन खान ने तानसेन का वंशज बताया है.

मुस्तफा खान अपने चचेरे भाई पद्म भूषण उस्ताद निसार हुसैन खान को अपना गुरु मानते हैं. उन्होंने मृणाल सेन की फिल्म ‘भुवन शोम’ से गायन की शुरुआत की और संगीत निर्देशक विजय राघव राव के नेतृत्व में ‘बदनाम बस्ती’ के लिए ‘सजना काहे नहीं आए…’ गाया.

उन्होंने एक ही फिल्म में पाश्र्व गायक होने के अलावा जयपुर में एक जर्मन डॉक्यूमेंटरी ‘रेन मेकर’ में बैजू बावरा की भूमिका निभाई.

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