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कॉरपोरेट लूट में फंसा धरती आबा का देश

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Srijan Kishore

हाल ही में बिहार-झारखंड के क्षेत्रीय न्यूज चैनल्स और अखबारों में यह खबर आई है कि बरसात के दिनों में वहां के गावं वालों ने तकरीबन नौ एकड़ जमीन में धान रोपा था, जिसे अडानी ग्रुप द्वारा बिना किसी प्रायः सूचना के जेसीबी मशीन से पूरी तरह मसल दिया गया. और वहां के लोगों को विस्थापित किया जा रहा है. अब सवाल यह उठता है कि जिन बंगलादेशी लोगों को घुसपैठिए बताकर मौजूदा सरकार 2019 में होने वाले चुनाव जीतने का सपना देख रही है, उन्हीं को बिजली बेचना क्या दोहरी मानसिकता नहीं है?

भारतीय इतिहास में ‘बिरसा मुण्डा’ को ना कि सिर्फ एक स्वतंत्रता सेनानी के तौर पर जाना जाता है, बल्कि झारखंड में उन्हें ‘धरती आबा’ के नाम से भी लोग जानते हैं. बिरसा मुण्डा को किसी भगवान से कम नहीं माना जाता है. 19वीं सदी के स्वतंत्रता आंदोलन के समय बिरसा मुण्डा ने अंग्रेजों द्वारा वसूले जा रहे लगान के विरोध में अपनी आवाज बुलंद की थी. उस समय ब्रिटिश हुक्मरानों, जमींदारों और उनके पुलिस प्रशासन द्वारा आदिवासियों पर भीषण अत्याचार हो रहे थे. सदियों से हो रहे आदिवासियों के विस्थापन ने बिरसा मुण्डा को यह सोचने पर विवश कर दिया था कि आखिर यह जमीन हमारी है, फिर हम इसके मालिक क्यों नहीं?

बिरसा मुण्डा इस बात को बहुत अच्छी तरह समझ गये थे कि जमीन जाने से ना सिर्फ आदिवासियों की आजीविका, बल्कि आर्थिक स्थिति, सभ्यता और परंपरा भी बर्बाद हो जायेगी. सन् 1894 में छोटानागपुर इलाके में मानसून के दौरान बारिस कम हुई, परिणाम- स्वरूप क्षेत्र में सूखा पड़ गया, फसलें खराब हो गयीं, लेकिन अंग्रेजी हुकूमत ने तब भी लगान वसूलना बंद नहीं किया. आदिवासियों का मानवाधिकार हनन तेजी से होने लगा. ये सब देखकर भगवान बिरसा मुण्डा ने ब्रिटिश सरकार के खिलाफ संघर्ष का बिगुल बजा दिया.

आदिवासी दर्शन के मुताबिक-आदिवासी लोग अपने जल, जंगल और जमीन को किसी व्यक्ति विशेष की सम्पत्ति नहीं, बल्कि पूरे कबिले की मानते हैं. सन् 1863 तक जब जमींदारों को पुलिस के जैसे हथियार आसानी से प्राप्त हो जाते थे, तब भी अपने परंपरागत हथियारों के साथ बिरसा मुण्डा सभी आदिवासियों को अपने साथ लेकर आये. उन्होंने सभी आदिवासी लोगों को इकट्ठा करके अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ जंग छेड़ दिया. मगर अफसोस, नौ जून, 1900 को बिरसा मुण्डा को अंग्रेजी हुकूमत ने जेल में जहर देकर मार डाला.

दुर्भाग्यपूर्ण और अहम तथ्य यह है कि जिस आदिवासी अस्मिता के लिए आबा बिरसा मुण्डा ने संघर्ष किया वर्तमान परिप्रेक्ष्य के सत्ता पक्षों द्वारा उसे भुलाया जा रहा है. 15 नवंबर, 2000 को बिरसा मुण्डा की जयंती पर झारखंड राज्य की स्थापना कर दी गयी. झारखंड के अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे का नाम भी ‘बिरसा मुण्डा अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा’ रखा गया. पर आज अहम सवाल यह है कि जो लड़ाई बिरसा मुण्डा ने यहां के आदिवासियों (मूलवासियों) के लिए लड़ी थी क्या उसका प्रभाव आज के झारखंडियों पर पड़ा ? क्या बिरसा मुण्डा के सिद्धान्त और उनके संघर्षों को यहां आए दिकुओं द्वारा नष्ट नहीं किया जा रहा है? क्या आदिवासी अस्मिता और अस्तित्व पर प्रहार जारी नहीं है? क्या आज आदिवासी समाज की स्थिति बदतर नहीं की जा रही है?

आज के दौर में मौजूदा राज्य सरकार ने यहां के मूलवासियों को एक ओर धोखा दिया है, तो दूसरी ओर देश के बड़े-बड़े उद्योगपतियों के लिए राज्य की जमीन और खनिज संपदा की लूट का पूरा लेखा-जोखा भी सरकार तैयार करने में लगी है. अब प्रश्न यह उठता है कि क्या केवल एक ही तबके के लिए विकास सही है ? क्या यहां के मूलवासियों को विस्थापित करके उनकी जमीन काॅरपोरेट को देना ही विकास का तात्पर्य है ? क्या इसी कारण झारखंड राज्य की स्थापना हुई थी ? क्या बिरसा का संघर्ष काॅरपोरेट के लिए था ? यह बात बिल्कुल स्पष्ट है कि वर्तमान राज्य सरकार ने सिर्फ पूंजी निवेश को ही राज्य के विकास का मानक मान लिया है.

बिरसा मुण्डा के संघर्ष का नतीजा ? वर्तमान समय में तथाकथित काॅरपोरेट ने नया नारा दिया है -‘जमीन नहीं दी, तो जमीन में गाड़ दूंगा’-यह कोई सिनेमा का डायलाॅग नहीं, बल्कि सत्ता पक्ष का वक्तव्य है, जो काॅरपोरेट के सामने पूर्ण रूप से नतमस्तक होकर इस तरह के वाक्य का प्रयोग विकास के नाम पर कह रहा है. झारखंड राज्य के बेहद पिछड़े इलाके में आता है ‘संथाल परगना’. इसमें गोड्डा का इलाका जहां देश के ताकतवर उद्योग घराने योजनाएं बना रहे हैं. वर्तमान सरकार को पूंजीपतियों द्वारा काफी सहयोग दिया जा रहा है, जिसके एवज में सरकार ने अडानी ग्रुप के लिए नियम-कानून को ताक पर रख दिया है. यहीं पर अडानी पावर प्लांट बनना है. इसका फायदा किसे मिलना है, इसका आकलन बेहद जरूरी है. यहां अडानी ग्रुप द्वारा 1600 मेगावाट क्षमता का एक थर्मल पावर प्लांट लगाया जा रहा है. मसलन, इस मेगा पावर प्लांट से जो बिजली उत्पादन होगा, वह पूरी बिजली बंग्लादेश को बेची जाएगी. लेकिन यहां के आदिवासियों को इस बिजली उत्पादन का कोई फायदा नहीं मिलेगा. इससे साफ पता चलता है कि सरकार किसके लिए काम कर रही है.

गौरतलब है कि इस थर्मल पावर प्लांट के लिए आधा दर्जन गांवों के किसानों की जमीन ले ली गई है. जमीन किसान के लिए सब कुछ है, लेकिन जब उस किसान को जमीन में गाड़ देने की बात की जाए, तो फिर उन किसानों की जिन्दगी और फिर विकास का क्या मतलब रह जाता है ? वर्तमान सरकार अडानी ग्रुप के लिए जमीन अधिग्रहण के कार्य में लगी हुई है. वहीं दूसरी ओर आदिवासी किसानों की बात सुनने को तैयार नहीं है. कई किसानों की जमीन जबरदस्ती ले ली गई और कई के परिवारों की जानकारियां भी गलत दिखाई जा रही है. दुख की बात यह है कि इन सबमें झारखंड सरकार अपनी ऊर्जा नीति भी बदलने को तैयार हो गई. पूरी घटना का सिलसिलेवार अध्ययन किया जाए, तो यह बात स्पष्ट हो जाती है कि दरअसल 800 मेगावाट की दो यूनिट से कुल 1600 मेगावाट बिजली उत्पादन होगा. गोड्डा जिला बंगाल से सटा हुआ है, जिससे वे बंगाल के रास्ते बंग्लादेश को आसानी से बेच सकेंगे.

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झारखंड राज्य की ऊर्जा नीति के हिसाब से भी कुल उत्पादन का कम-से-कम 25 प्रतिशत बिजली राज्य को दिया जाता है. लेकिन इस प्रावधान को अडानी ग्रुप के लिए हटा दिया गया है. इसका अर्थ है कि जमीन किसान की, पर उसका फायदा सिर्फ पूंजीपतियों को पहुंचाया जा रहा है. अडानी ग्रुप के ‘सोशल इम्पैक्ट असेसमेंट’ रिपोर्ट के अनुसार इस परियोजना के लिए 1,214 एकड़ जमीन की जरूरत होगी और इसके अलावा 74 एकड़ जमीन निजी रेल लाइन बिछाने के लिए चाहिए, ताकि कोयला लाने में आसानी हो. ऊर्जा नीति में बड़ा बदलाव वर्ष 2016 में किया गया कि अगर किसी और परियोजना से भी राज्य को 25 प्रतिशत बिजली मुहैया कराया गया, तो उस पर भी अडानी ग्रुप अधिक राशि वसूल कर सकती है. वर्तमान दर के हिसाब से इन सबसे झारखंड राज्य को करीब 7,410 करोड़ रुपये आने वाले 25 सालों में लगेंगे.

स्क्राॅल.इन की एक रिपोर्ट के मुताबिक अब झारखंड सरकार अडानी ग्रुप के तरफ से किसानों की जमीन अधिग्रहण करेगी. 1,214 एकड़ में से अब तक 174.84 एकड़ जमीन अधिग्रहण झारखंड सरकार ने पूरा भी कर लिया है. चिंताजनक बात यह भी है कि भूमि अधिग्रहण और पुनर्वास एक्ट 2013 के अनुसार यदि कोई जमीन का टुकड़ा “पब्लिक पर्पस” के लिए सरकार द्वारा अधिग्रहण किया जाना है, तो भी 80 प्रतिशत जमीन मालिकों की मंजूरी लेना जरूरी होता है, जो इस परियोजना में जमीन मालिकों की सहमति नहीं ली गई. हालांकि इस क्षेत्र और इससे जुड़े सरकारी ऑफिसर दावा जरूर कर रहे हैं, परंतु एबीपी न्यूज की एक रिपोर्ट के मुताबिक कई लोगों के नामों में गड़बड़ियां हैं. आदिवासियों को बगैर बताए लगातार जमीन अधिग्रहण की प्रक्रिया जारी है.

कुछ और तथ्य पर गौर करें, तो पता चलता है कि इन सभी 10 गांवों में 841 परिवार हैं, जिनकी कुल आबादी 5,339 है. हालांकि यह वर्ष 1932 के सर्वे के आंकड़े हैं, जाहिर है इससे गड़बड़ी होगी. यह सवाल तो उठना ही था कि जब पूरी बिजली बंग्लादेश को बेची जानी है, तो फिर ‘लोक उत्पादन’ के नाम पर जमीन क्यों अधिग्रहित की जा रही है.

श्रीमती कांची कोहली, जो सेंटर फाॅर पॉलिसी रिसर्च में ‘कानून शोध निदेशक’ पर पर कार्यरत हैं, उन्होंने भी यही बात उठायी है कि जब इस परियोजना से यहां के लोगों को फायदा होने के बजाय सिर्फ इससे नुकसान ही पहुंचाया जा रहा है, तो फिर ‘पब्लिक पर्पस’ कह कर गुमराह करना सही नहीं है. झारखंड में आदिवासी संघर्ष की झलक इस परियोजना में स्पष्ट दिखाई देती है. जान देंगे, जमीन नहीं देंगे’ का नारा पूरे जोर-शोर से लगाया जा रहा है. गांव वाले भी साफ-साफ कहते हैं कि यदि कंपनी के कर्मचारियों को जमीन चाहिए ही, तो हमें हमारी जमीन में ही मार के जमीन ले लें. यह यहां के लोगों के बीच बहुत ही आम बात हो चुकी है.

इन सारी बातों का सारांश यही है कि विकास क्या सिर्फ एक तबके के लिए जरूरी है ? क्या राज्य के गरीब किसान आदिवासियों की जमीन लूटकर उद्योगपतियों को देना और मुआवजे के नाम पर सिर्फ आर्थिक राशि और नौकरी से बात बनेगी ? बिरसा मुण्डा के संघर्ष के अनुरूप नतीजा नहीं दिखाई दे रहा है. झारखंड में आदिवासियों का विकास होना चाहिए था, जो दिखाई नहीं दे रहा है. उद्योग के लिए जमीन तो चाहिए ही और जमीन अधिग्रहण भी जरूरी है. पर किसी एक पूंजीपति के लिए पूरे नियम को ताक पर रख देना कहां तक उचित है ? बिरसा मुण्डा के संघर्ष को देखें, तो प्रश्न उठता है कि झारखंड किसका है?

(यह लेखर सेंट्रल यूनिवर्सिटी के स्कॉलर हैं और यह उनके निजी विचार हैं)

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