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2019 के सियासी संग्राम में खल रही लालू की कमी

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Priyanka

2019 का चुनावी समर चरम पर है. प्रचंड प्रचार, धुआंधार रैलियां, जनसभाएं… इन सबके बीच बिहार की जनता इस सियासी संग्राम में अगर कुछ मिस कर रही है, तो वो है लालू यादव का चुटीला अंदाज. उनका भाषण और उनके अपने अंदाज में विरोधियों पर हमले और जनता से वोट की अपील.

लोगों के साथ-साथ आरजेडी में भी लालू प्रसाद की कमी हर नेता-कार्यकर्ता को खल रही होगी. खासकर विधान परिषद में नेता प्रतिपक्ष और लालू की पत्नी राबड़ी देवी को. एक तो इलेक्शन का टेंशन, ऊपर से बिखरता हुआ परिवार. शायद लालू साथ होते तो आज उनके परिवार में वो नहीं होता जो हो रहा है.

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हालांकि, तेजस्वी चुनावी रण में एड़ी-चोटी का जोर लगा रहे हैं. चाहे महागठबंधन में सीटों का बंटवारा हो, या फिर पार्टी में टिकट बांटना, या विरोधियों पर हमला… तेजस्वी पूरे एग्रेशन के साथ लगे हुए हैं, और पार्टी की कमान भी संभाल रखी है.

लेकिन लालू की कमी तो खल ही रही है. ऊपर से चुनौतियां भी कम नहीं है. सबसे बड़ी चुनौती राजद का बिखरता कुनबा है. लालू के बड़े बेटे और सूबे के पूर्व स्वास्थ्य मंत्री तेजप्रताप ने बागी रूख अपना लिया है. पहले ससुर चंद्रिका राय को टिकट मिलने और बाद में शिवहर और जहानाबाद में प्रत्याशी चयन को लेकर वो तेजस्वी से नाराज हैं.

तेजप्रताप ने तो अलग मोर्चा भी बना लिया है, लालू-राबड़ी मोर्चा. उनकी पंसद के उम्मीदवार ने निर्दलीय रुप से पर्चा भी भर दिया है. तेजप्रताप ने तेजस्वी को लेकर कई बार प्रहार भी किया. जाहिर है भाई-भाई के इस मतभेद का असर पार्टी पर भी पड़ रहा है. ऐसे में लालू होते तो शायद हालात कुछ और होते.

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अगर झारखंड राजद को देखे तो पूरी की पूरी पार्टी ही बिखरी नजर आती है. 1998 से राजद का हिस्सा रहीं अन्नपूर्णा देवी ने लालटेन का साथ छोड़ दिया. उनके साथ ही पार्टी के कद्दावर नेता रहे गिरिनाथ सिंह भी बीजेपी में शामिल हो गये. जर्नादन पासवान ने भी राजद को अलविदा कह दिया है.

झारखंड में राजद सीट बंटवारे को लेकर नाराज दिखा. महागठबंधन में आरजेडी को सिर्फ एक सीट (पलामू) मिली. लेकिन पार्टी ने चतरा से सुभाष यादव को अपना प्रत्याशी बनाया है.

कहने को तो यहां फ्रेंडली फाइट होगी, लेकिन चुनाव में फ्रेंडली लड़ाई जैसा कुछ नहीं होता, या तो जीत होती है या हार. तेजस्वी के समक्ष झारखंड में पार्टी को मजबूत करना भी बड़ी चुनौती है. जाहिर है राजद नेताओं का भी मानना होगा कि लालू जी होते तो पूरा कुनबा यूं नहीं बिखरता.

सिर्फ बिहार की जनता और पार्टी को ही लालू यादव की कमी नहीं महसूस हो रही है. बल्कि राजद सुप्रीमो खुद ही इन चीजों को काफी मिस कर रहे हैं. चारा घोटाले में दोषी करार दिये जाने के बाद से जेल में बंद लालू यादव को लोकतंत्र के सबसे बड़े मुकाबले की हर एक चीज की कमी महसूस हो रही है.

तब ही तो सुप्रीम कोर्ट से बेल पीटिशन खारिज होने के बाद उन्होंने बिहारवासियों को लिखी चिट्ठी में कहा कि आपकी कमी महसूस हो रही है.

44 सालों में पहला चुनाव है, जिसमें वो बिहार की जनता के साथ नहीं हैं. अपनी भावुक चिट्ठी के जरिये जहां उन्होंने लोगों के जहन में अपनी यादें ताजा करने की कोशिश की, वहीं राजद के पक्ष में वोट करने की अपील करना भी वो नहीं भूले वो भी अपने ही अंदाज में.

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जाहिर है बिहार की राजनीति में लालू यादव वो धुरी है, जिनके ईद-गिर्द कभी पूरी सियासत घुमा करती थी. इसकी धमक दिल्ली तक सुनायी पड़ती थी. एक समय तो ऐसा आया जब वे किंग मेकर की भूमिका में रहे. वीपी सिंह, देवगौड़ा और इंद्र कुमार गुजराल के प्रधानमंत्री बनने के पीछे उनकी अहम भूमिका रही थी. लेकिन चारा घोटाले में सजायाफ्ता लालू आज रांची के होटवार जेल( फिलहाल रिम्स में इलाजरत) में बंद हैं. वो चुनावी मंच, रैलियां, सियासी दांव-पेंच को मिस कर रहे हैं. और जनता उनके अंदाज को…

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