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माओवादी से शादी करके पछता रही है ललिता देवी

महुआ की शराब बनाकर तीन बच्चों का कर रही है पालन-पोषण    

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Manoj Dutt Dev

Latehar : जिला के चंदवा प्रखंड के हेसला बांझी टोला ग्राम में मिटटी का एक छोटा सा घर है. देखने में ये घर वैसे तो बाकी घरों जैसा ही है. लेकिन शाम होते ही घर के पास चहल-पहल बढ़ जाती है. घर में शराबियों की जमघट लगी रहती है. और नशे में झूमते शराबियों की अलग-अलग तरह की आवाज घर से आने लगती है. घर की मालकिन ललिता देवी है, जो शराब बेचकर अपने बच्चों को पाल रही है. इस काम को करके अफसोस भी बहुत होता है, लेकिन जीने के लिए इसके सिवा कोई चारा भी नहीं है.

ललिता के लिये शराब बेचने का काम किसी चैलेंज से कम नहीं है. क्योंकि शराब पीने के बाद कुछ तो खुद को जमींदार बताकर अपनी धमक दिखाते हैं. तो कुछ ललिता को धमकाकर शराब के पैसे नहीं देते हैं. जबकि कुछ लोग उधार शराब पीकर पैसे बाद में देने की कहकर चले जाते हैं और देते नहीं.

महुआ शराब बेचने वाली ललिता देवी है कौन

चंदवा प्रखंड के हेसला ग्राम के बांझी टोला में शराब बेचकर गुजारा करने वाली ललिता देवी भाकपा माओवादी के रिजनल कमांडर बिहार स्पेशल एरिया कमिटी का सदस्य रविंदर गंझू की पत्नी है. झारखण्ड सरकार ने रविंदर गंझू पर जिंदा या मुर्दा सरेंडर करने पर दस लाख रुपया का इनाम रखा है. रविंदर गंझू के नाम से चतरा, लातेहार, लोहरदगा, गुमला सहित रांची जिला की सीमा वाले इलाका खेलारी और कुड़ू में तूती बोलती है. एक ओर इन इलाकों में रविंदर गंझू का नाम लेते ही लोग डर जाते हैं. तो दूसरी ओर रविंदर गंझू के घर में शराबियों की आवाज गूंजती है .

पहले पता होता तो शादी ही नहीं करती

ललिता देवी ने अपनी आपबीती सुनाते हुए न्यूज विंग को बताया कि साल 2007-8 में रविंदर  का  रिश्ता हुंडरू, जिला रांची स्थित मेरे घर में आया. कुछ दिन बाद ही मेरा छेका रविंदर से हो गया. फिर मैंने उनसे पूछा कि आप क्या करते हैं, तो इसपर उसने झूठ नहीं बोला और बताया था कि वो पार्टी करता है. मगर मैं उस वक्त समझ नहीं पाई थी कि, पार्टी क्या होता है? ललिता ने आगे बताया कि यदि मुझे बढ़िया से इस बारे में पता होता तो शादी ही नहीं करती. आंखों में आंसू लिये ललिता बोली कि शादी करके मेरा और बच्चों का जीवन भी बर्बाद हो गया. आगे बताया कि कुछ दिनों में हमारी शादी भी हो गयी और मैं हेसला बांझी टोला में रहने लगी. लेकिन शादी के कुछ दिनों बाद ही घर पर पुलिस आने लगी. पुलिस बार-बार रविंदर को खोजती थी, तब जाकर मुझे पता चला कि ये किस तरह की पार्टी में है. ललिता ने आगे बताया कि पुलिस जब भी आती थी, रविंदर जंगल की ओर भाग जाता था और पुलिस के जाते ही घर आ जाता था. रविंदर पुलिस के डर से रात में नहीं सोता था और कई दिनों रातों में तो वग घर भी नहीं आता था. सिलसिला तीन सालों तक चला.

रविंदर रांची में छोड़कर चला गया

साल 2012 में रविंदर और मैं पुलिस के डर से रांची चले आये और यहां बीआईटी मोड़ के पास  रविंदर खैनी बेचने लगा. वहीं हम लॉज में रहने लगे. लेकिन 7-8 महीने के बाद ही साल 2013 में वह मुझे रांची में छोड़कर 15 दिनों के लिए घर चला गया. जब वापस लौटा तो मुझे सात हजार रूपया दिया और कहा कि मुझे कुछ काम से वापस घर जाना है. लेकिन 2-3 महीने तक मैं लॉज में रही और रविंदर रांची वापस नहीं आया. तब मैं हेसला में अपने घर गयी तो पता लगा कि जब वो घर आया था, तब माओवादी कमांडर नकुल यादव उससे मिला था. नकुल ने रविंदर को जबरन बहला- फुसलाकर फिर से पार्टी में शामिल कर लिया. उसी वक्त से मैं गांव में रहने लगी.

मजबूरी में बेच रही हूं शराब

ललिता ने आगे बताया कि जीने के लिये अब पैसों की जरूरत थी और बच्चों की परवरिश भी करनी थी. ऐसे में मजबूरी में मुझे महुआ के शराब बेचने का धंधा करना पड़ा. जब मैं घर पर रहने लगी उसके छह महीने बाद रविंदर घर आया. लेकिन उस वक्त रविंदर के साथ नकुल सहित कई माओवादी सदस्य थे, मगर वह सब घर के अंदर नहीं आये थे. ललिता ने कहा कि, घर के अंदर आते ही रविंदर ने बताया कि नकुल यादव के दबाव में पार्टी में रहना पड़ रहा है और वह मेरा पीछा भी नहीं छोड़ रहा है. लेकिन उसी बीच नकुल ने रविंदर को चलने के लिए आवाज लगायी. ललिता ने कहा कि उसी वक्त मैं घर से बाहर निकली और नकुल यादव से बोली कि इन्हें घर पर ही छोड़ दीजिए, आखिर क्यों ले जा रहे हैं मेरे पति को जब वह नहीं जाना चाहता है. मगर नकुल ने रविंदर को उल्टा-पुल्टा  समझाकर और पुलिस का डर बताकर अपने जाल में फंसाकर ले जाने लगा. लेकिन जाते-जाते मैंने कहा कि पार्टी करने वाला रोज मारा जा रहा है तो क्यों ले जा रहे हैं रविंदर को. इसपर नकुल ने कहा कि पार्टी में इतना-इतना लोग के पास हथियार है कि वे सभी पुलिस को ही उड़ा देंगे. इसके बाद रविंदर 11 महीने तो कभी एक साल पर घर आने लगा और जब भी आता था तो उसके साथ नकुल के साथ पूरा दस्ता भी रहता था. रविंदर घर आता भी था तो बिना खाये ही कुछ देर में ही सबकते साथ निकल जाता था. साथ ही रविंदर दो-तीन हजार रूपया देता था. लेकिन मैं इसका विरोध करती थी और कहती थी कि सिर्फ इतने से ही क्या होगा, आप चुपचाप घर पर ही रहिये, बच्चे आपको खोजते हैं.

माओवादी से शादी करके पछता रही है ललिता
रविंदर गंझू की पत्नी ललिता

ललिता ने आगे बताया कि साल 2016 में एक बार जब वह घर आया तो मुझे शराब नहीं बेचने की हिदायत देने लगा और कहने लगा कि घर पर शराबी लोग आता है. जिससे बहुत बेइज्जती होता है. इसके बाद रविंदर ने मुझसे झगड़ा भी किया और मुझपर हाथ उठाने की भी कोशिश की. फिर मैंने रविंदर से कहा कि आपके पार्टी से बच्चों का पेट नहीं भरता है. चार बच्चे हैं तो आप कमाइये तो मैं भी शराब बेचना बंद कर दूंगी. शराब बेचकर छह हजार रूपये कमा लेती हूं और तुम तो मुझे कुछ देते भी नहीं. मगर वो तो मेरी बात सुनता नहीं था, वो उस दिन निकला और फिर से नकुल के पास चला गया. उसके बाद से कभी भी घर नहीं आया.

चार बच्चों को पालना बहुत कठिन है

ललिता ने बताया कि मेरे चार बच्चे हैं. बड़ा बेटे का नाम प्रभात कुमार (12 ), दूसरा बेटी है सुसमा कुमारी (9), तीसरा भी बेटी है रेशमा कुमारी (6), सबसे छोटा बेटा तीन साल का तूफान है और सिर्फ वही मेरे पास रहता है. बाकि तीनों बच्चे रांची के हुंडरू में नानी घर पर रहकर ही पढ़ते हैं. तीनों बच्चे धनरोपनी या फिर महुआ के सीजन में आते हैं और महुआ चुनने में मदद करते हैं. ललिता ने मन आंखों से बताया कि किसी तरह महुआ के शराब को बेचकर जीवन यापन करती हूं और उसी से   चार-पांच हजार महीना में कमा लेती हूं. पुलिस ने तीन बार घर की कुर्की जब्ती भी किया और दो बार तो घर का खपरा भी उजाड़ दिया. जीवन बहुत कष्ट से गुजार रही हूं. वहीं ललिता ने बताया कि वो चाहती है कि रविंदर सरेंडर कर दे, ताकि पुलिस के झंझट से बचे और साथ ही रविंदर कि जिंदगी भी बच जाए. ललिता ने नकुल यादव को ही रविंदर को बर्बादी का कारण बताया. साथ ही कहा कि  नकुल खुद तो सरेंडर करके जेल में मौज से रह रहा है और बाकी सबको जंगल पार्टी में फंसा दिया.. ललिता ने बताया कि थोड़ा बहुत खेत है, जिसपर खेती करके खाने के लिए कुछ अनाज उपजाते थे, लेकिन उसे भी पुलिस ने जब्त कर लिया.

पिता कि पिटाई से बचने कि लिए रविंदर बना माओवादी

लातेहार जिला के चंदवा प्रखंड के हेसला बांझी टोला निवासी रविंदर गंझू पिता स्व रामवर्त गंझू का सबसे छोटा भाई लालू गंझू ने बताया कि जब मैं करीब चार था. उस वक्त रविंदर की उम्र 15 साल होगी और वह मेरे साथ लट्टू खेला रहा था. इससे आगे लालू ने बताया कि रविंदर लट्टू को नचाकर मेरी हथेली पर रख देता था. इसी क्रम में एक बार लट्टू मेरी ऊंगली में गढ़ गया और पिता जी के पिटाई की डर से रविंदर 1994 में ही घर से भाग गया. उसे बहुत खोजा गया, मगर वो नहीं मिला. रविंदर 13 साल बाद घर आया, लेकिन उस वक्त तक पिता का देहांत हो चुका था. उस समय तक  रविंदर की उम्र भी 22 साल हो गयी. इतने सालों तक वह कहां रहा और क्या किया, ये बात किसी को नहीं बताया. घर आने के एक साल के बाद उसकी शादी हो गयी और वह पत्नी के साथ रहने लगा. शादी के तीन साल के अंदर उसके दो बच्चे हुए. लेकिन उसी बीच बार-बार पुलिस घर आने लगी और रविंदर को खोजने लगी. इसी बीच रविंदर रांची आ गया और खेनी बेचने लगा. लेकिन कुछ दिन बाद ही वह माओवादी कमांडर नकुल के साथ रहने लगा. जब रविंदर के सरेंडर के बारे में लालू से पूछा गया तो उसने चौकाने वाला बयान दिया. उसने कहा कि रविंदर पार्टी का समर्पित कार्यकर्ता है, और वो खुद को गोली मार लेगा, मगर सरेंडर नहीं करेगा. इससे आगे लालू ने कहा कि हमने कई बार प्रयास करके देखा है, लेकिन रविंदर मानने को तैयार नहीं है. साथ ही लालू ने बताया कि  रविंदर की वजह से पूरा परिवार परेशान है, पुलिस आती है और कुर्की करके चली जाती है.

हमारी जमीन पर पुलिस का कब्जा है

माओवादी से शादी करके पछता रही है ललिता
लालू गंझू

साथ ही लालू ने कहा कि हम तीनों भाई कुवर गंझू (45) रविन्दर गंझू (43) एवं मैं लालू गंझू का आपस में बंटवारा हो गया है. पिताजी के नाम से कुल दो एकड़ तैंतालीस डिसमिल जमीन थी. ऐसे में हर भाई को 73-73 डिसमिल जमीन का बंटवारा हुआ है. मगर पुलिस इस बात कोई नहीं मानती है और जमीन पर भी कब्जा कर रखा है. इससे पूरा परिवार परेशान है. रविंदर पकड़ा जाता या सरेंडर कर देता तो सारी परेशानी खत्म हो जाती. वहीं लालू ने बताया कि हमारी दो बहनें भी हैं, पहली बहन दसमी देवी (42) एवं मंजू देवी (30) दोनों की शादी हो गयी है. बातचीत में लालू ने बताया कि  रविंदर पार्टी में रहते हुए जब भी घर आता था तो उसके साथ पूरा दस्ता भी आता था. एक बार जब साल 2013 में रविंदर अपने दस्ते के साथ आया तो मैं भी शराब के नशे में था. मैंने हिम्म्त जुटाकर उससे कहा कि तुम घर मत आया करे, तुम्हारी वजह से पूरा परिवार परेशान है, तो उस दौरान रविंदर के साथ मेरा बहुत झगड़ा हुआ और मारपीट भी हुआ. उसके बाद से रविंदर कभी घर नहीं आया.

लाधुप सेन्हा ब्लास्ट के बाद रविंदर गंझू चर्चा में आया

साल 2009 में हुए लोकसभा चुनाव के दौरान चंदवा प्रखंड के हेसला बांझी टोला ग्राम एवं लाधुप सेना में भाकपा माओवादी ने लैंड माइंस कर पोलिंग पार्टी को निशाना बनाया था. इस ब्लास्ट में बस पर सवार होकर जा रहे बीएसएफ के पांच-छह जवान शहीद हुए थे. घटना के पीछे नकुल यादव के दस्ते में सक्रिय रविंदर गंझु का नाम सामने आया था. वहीं इस घटना के पहले रविंदर का नाम पार्टी के साथ जुड़ा तो था, लेकिन उसे सक्रिय नहीं माना जाता था. वहीं साल 2009 में लाधुप सेन्हा ब्लास्ट  भी रविंदर गंझू के घर से महज दो किमी कि दूरी पर हुई थी. इसी से रविंदर पुलिस रिकॉर्ड में चर्चा में आया और धीरे-धीरे रविंदर गंझू भाकपा माओवादी का बिहार रिजनल कमिटी का सदस्य बनता गया. रविंदर गंझू के खिलाफ लातेहार जिला में कुल 21 नक्सल उत्पात के मामले दर्ज हैं.

अनुयायी के सरेंडर करने के बाद झंडा ढोने का क्या फायदा

डीआईजी विपुल शुक्ला
डीआईजी विपुल शुक्ला

सरेंडर के सवाल पर पलामू क्षेत्र के डीआईजी विपुल शुक्ला ने बताया कि जब उनके अनुयायी ही सरेंडर कर गए हैं. तो ऐसे में झंडा ढ़ोने का क्या फायदा. साथ ही उन्होंने कहा कि तेलंगाना बेस का सुधाकरण, नीलिमा जैसे नक्सली की आंखें खुल गयीं और उन्होंने सरेंडर कर दिया. तो लातेहार जिला में बचे बाकि नक्सलियों को भी सरेंडर कर देना चाहिए. डीआईजी ने कहा कि हम सरेंडर करने वाले नक्सलियों का स्वागत करते हैं और उन्हें पूरी सुरक्षा के साथ सरेंडर करवाया जाएगा. यह नक्सलियों के सामने सुनहरा अवसर है, वे इसका लाभ उठायें अन्यथा अंजाम के लिए तैयार रहें.

माओवाद की आग में युवा झुलसना नहीं चाहते

झारखण्ड के लातेहार जिला को एस समय में अति नक्सलग्रस्त इलाका माना जाता था. जिले में माओवाद का प्रभाव 2013 तक चरम पर था. हर कोई अपने अधिकार के लिए जमींदारी प्रथा से निजात पाने के लिए लाल झंडा पकडकर चलना चाहता था. जबकि कई लोगों ने तो भाकपा माओवादी संघटन में शामिल होकर खुलकर आंदोलन भी किया. जिला के कई युवक जोश में कम उम्र में ही माओवाद के जाल में फंसते भी चले गये. जिसका नतीजा था कि माओवाद मजबूत होता चला गया.

माओवाद की मजबूती के साथ-साथ इनका नेतृत्व करने वाले बाहरी नेता आर्थिक रूप से मजबूत होते चले गए. माओवादी नेताओं ने स्थानीय लोगों को सदस्य बनाकर उनके हाथ में माओवाद का झंडा थमाया और सरेंडर भी करते चले गए. झंडा पकड़कर चलने वाले माओवाद के क्रांतिकारी पुलिस के हत्थे भी चढ़ते गए और अपनी बची खुची जिंदगी जेल में गुजारने को विवश हैं. जिन्हें उनके परिवार वालों के अलावा कोई भी देखने वाला या आर्थिक मदद करने वाला भी नहीं है. वहीं अब भी माओवाद का झंडा पकड़कर सिद्धांत की बात करने वाले कुछ ही नेता बचे हुए हैं, उनके दस्ते में कोई सदस्य भी नहीं है. क्योंकि माओवाद की आग में कोई युवा अब झुलसना नहीं चाहता है. नतीजा यह है कि जंगलो में भटक रहे माओवादी दस्ते में केवल कमांडर ही कमांडर हैं. एक-एक माओवादी कमांडर भाकपा माओवादी के कई पदों पर आसीन हैं और दिन-रात पुलिस से भागते चल रहे हैं.

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