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लाल बहादुर शास्त्री ने जाति व्यवस्था का किया था विरोध, नाम से हटाया था श्रीवास्तव

भारत के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की जयंती पर विशेष

Naveen Sharma

Ranchi : लाल बहादुर शास्त्री नाम के शख्स का कद भले ही छोटा था लेकिन वे सबसे बड़े नेताओं में शामिल हैं. वे देश के सबसे ईमानदार और दमदार प्रधानमंत्री में शुमार हैं. उत्तर प्रदेश के मुगलसराय में 2 अक्टूबर 1904 को जन्मे शास्त्री जी का जीवन संघर्षों से भरा हुआ था. एक गरीब परिवार से निकलकर और सबसे बड़े लोकतंत्र का कुशल नेतृत्व कर शास्त्री जी ने दुनिया को दिखाया कि अगर इंसान के अंदर आत्मविश्वास हो तो वो कोई भी मंजिल पा सकता है.

शास्त्री जी जब महज 8 महीने के थे तभी उनके सर पर से पिता शारदा प्रसाद साया ऊठ था. इसके बाद इनकी मां रामदुलारी देवी ने ही इनका पालन पोषण किया. ननिहाल पक्ष के सहयोग से उनकी परिवरिश हुई और उन्हें मां का बहुत सहयोग मिला. यहीं उन्होंने प्राथमिक शिक्षा ली.

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मीलों नंगे पैर चलकर जाते थे पढ़ाई के लिए

शास्त्री अपने चाचा के यहां उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए गए थे. वे नंगे पांव ही कई मील की दूरी पर स्थित स्कूल जाया करते थे. उस भीषण गर्मी में कोलतार की सड़कें तक गर्मी से पिघल जाया करती थीं लेकिन शास्त्री जी का पढ़ाई के प्रति जुनून अदम्य था. शास्त्री एक नाव की सवारी के लिए भुगतान करने के लिए अपने गरीब परिवार के पैसे बचाने के लिए स्कूल पहुंचने के लिए नदी भी तैर कर पार करते थे.

इसके बाद की पढ़ाई उन्होंने हरिश्चन्द्र हाई स्कूल और काशी विद्यापीठ में की. महज 16 साल की उम्र में ही सन 1920 में शास्त्री जी (Shastri) आजादी की लड़ाई में कूद पड़े थे.

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जाति व्यवस्था का विरोध किया-

चूंकि उन्हें जाति व्यवस्था में विश्वास नहीं था, इसलिए उन्होंने काशी विद्यापीठ से शास्त्री की उपाधि मिलने के बाद उन्होंने अपने नाम से जातिसूचक शब्द श्रीवास्तव हमेशा के लिए हटा लिया और नाम के आगे शास्त्री लगा लिया.

कार खरीदने के लिए था 5,000 रुपये लोन लिया

चूंकि बच्चों को उनके पिता के प्रधानमंत्री होने पर स्कूल जाने के लिए आधिकारिक कार का उपयोग करने की अनुमति शायद ही थी, इसलिए परिवार ने फिएट कार खरीदने का फैसला किया. 12,000 रुपये के लिए एक बैंक ऋण 5,000 रुपये लिया गया था, जिसे शास्त्री की विधवा को उनकी आकस्मिक मृत्यु के बाद, उनकी पेंशन से चुकाना पड़ा था.

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एक दयालु, अग्रगामी सोच रखने वाले नेता-

शास्त्री जी ने देश में विभिन्न मांगों को लेकर आंदोलन करने वालों पर लाठीचार्ज के बजाय भीड़ को तितर-बितर करने के लिए वाटर जेट का इस्तेमाल करना सुनिश्चित कराया. महिलाओं को सार्वजनिक परिवहन सुविधाओं में कंडक्टर के रूप में नियुक्त किया जाना संभव बना दिया. उन्होंने 1965 में भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान “जय जवान, जय किसान का नारा भी उठाया और भारत की खाद्य आत्मनिर्भरता का मार्ग प्रशस्त किया.”

1928 में जब उन्होंने दहेज लेने के लिए अपने ससुराल वालों के आग्रह पर शादी की, तो उन्होंने चरखा और कुछ खादी का कपड़ा लिया. यहां तक कि जब उनका निधन हो गया, तब भी कथित तौर पर उनके नाम पर कोई संपत्ति नहीं थी और उन्होंने कुछ पुस्तकों और धोती-कुर्ता को पीछे छोड़ दिया.

वह देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की कैबिनेट में मंत्री थे. रेलवे और गृह मंत्रालय जैसे बड़े विभाग को संभाला.

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पाकिस्तान को दिया मुंह तोड़ जवाब

1962 में जब भारत चीन से युद्ध हार गया था तो पाकिस्तान ने हिमाकत शुरू कर दी. पाकिस्तान की अय्यूब खान सरकार ने 1965 में चुपचाप युद्ध का ऐलान कर दिया.

ऑपरेशन जिब्राल्टर छेड़ दिया और भारतीय सेना की कम्युनिकेशन लाइन को नष्ट करने के लिए कश्मीर में हजारों सैनिक भेज दिए.

पर उस समय शास्त्री जी ने भारतीय सेना को आदेश दिया और भारतीय सेना पंजाब में अंतरराष्ट्रीय सीमा को पार कर गई. सेना ने पाकिस्तान में घुसकर उसकी सेना पर दो तरफा हमला कर दिया.

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श्वेत और हरित क्रांति के जनक

हिंदुस्तान में लाल बहादुर शास्त्री की वजह से ही श्वेत और हरित क्रांति आई. शास्त्री जी हरित आंदोलन से पूरी तरह जुड़े हुए थे. उन्होंने अपने आवास के लॉन में भी खेती शुरू कर दी थी. उन्हें जितना जवान पसंद थे, उतने ही किसान भी पसंद थे. इसी कारण उन्होंने जय जवान, जय किसान का नारा दिया.

शास्त्री जी की सोच में थी आम जनता

लाल बहादुर शास्त्री की राजनीतिक राय हमेशा आम जनता के लिए ही रहती थी. उन्होंने एक बार कहा था, ‘जो शासन करते हैं उन्हें देखना चाहिए कि लोग प्रशासन पर किस तरह प्रतिक्रिया करते हैं. अंतत: जनता ही मुखिया होती है.

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