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झरिया के लाखों लोग जान से खिलवाड़ कर रहे हैं, आखिर क्यों?

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Vikash Pandey

Dhanbad: उस जगह के पास की जमीन के अंदर से आज भी धुआं निकल रहा है, जहां आज से एक साल पहले एक बाप-बेटा को जमीन लील गया था. झरिया शहर में प्रवेश से ठीक पहले स्थित इंदिरा चौक से लगा यह इलाका है. विडंबना है कि उसी जगह पर भूमिगत आग और भू-धंसान के खतरे से खेलते अपने बाल- बच्चे परिवार के साथ सैकड़ों लोग झोपड़ियां बनाकर रह रहे हैं. इनकी जिंदगी की फिक्र किसी को नहीं.

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किसी को नहीं पता कि यहां का कब-कौन सा घर अचानक से जमीन में समां जाए. उसके बाद बड़ा-सा गोफ होगा. उससे धुआं और गैस निकलेगा. लाख कोशिशों के बाद भी जमींदोज हुए आदमी की लाश, शायद ही मिल पाये. यह अनहोनी नहीं है? परिस्थितियां इसके अनुकूल है. प्रतिकूल है तो यहां जिंदगी की जंग.

इस खास जगह की बात नहीं है. पूरे झरिया शहर का ही भविष्य अनिश्चित है. झरिया-धनबाद रेल लाइन को आग लग गयी. आरएसपी कॉलेज बढ़ती आग के कारण बंद करने की नौबत आ गयी. झरिया शहर को लीलने के लिए चारों तरफ से बढ़ती आग के बीच लाखों लोग जिंदगी दांव पर लगाए क्यों पड़े हैं? सवाल है जाएं तो कहां जाएं. सरकार को इनकी जान की चिंता है और न ही इनके भविष्य और रोजी-रोटी की.

लपलपाती आग पर मजबूर जिंदगी

झरिया के हजारों परिवार अपनी जान-जोखिम में डालकर रहने को मजबूर हैं. झरिया के अग्नि प्रभावित इलाका इंदिरा चौक में चारों तरफ घनी आबादी है. इनके घर के बाहर जमीन में लगी आग से धुआं निकल रहा है. कहीं-कहीं लपलपाती आग भी निकल रही है. जहरीली गैस दिन-रात निकलती रहती है. गौरतलब है कि 24 मई 2017 को इसी क्षेत्र में बबलू अंसारी और रहीम अंसारी नामक पिता-पुत्र अचानक से तेज आवाज के साथ जमींदोज होने से काल के गाल में समा गये थे. फिर भी लोग यहां जान-जोखिम में डालकर रहने को मजबूर हैं.

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राहत का मजाक लोगों के साथ

घटना के तुरंत बाद यहां आसपास के घरों को ढाह दिया गया था. बीसीसीएल ने पुनर्वास देने की बात कही. महज 16 लोगों को पुनर्वासित करने की खानापूर्ति की गई. जबकि, लगभग 150 लोग मृतक बबलू अंसारी के घर के पीछे अब भी रहने को मजबूर हैं. इसके अलावा घटनास्थल से महज 20 मीटर की दूरी पर सड़क के उस पार हजारों लोग घर और दुकान बनाकर रहे हैं. क्योंकि स्थानीय लोगों की पेट की आग के सामने यह जानलेवा आग लोगों को भयावह नहीं जान पड़ता. यहां के लोग इतने सक्षम नहीं है कि आग की वजह से अपना घर बार छोड़कर दूसरे जगह अपना आशियां बसा सके.

इसके अलावा यदि कभी बीसीसीएल या जरेडा की मेहरबानी से एकाध परिवार को पुनर्वास योजना के तहत कहीं दूसरे सुरक्षित स्थान पर आवास मिल भी जाता है, तो रोजगार के तलाश में उन्हें वहां से भी भागना पड़ता है. क्योंकि उनके लिए वैसी जगह पर दो जून की रोटी जुटा पाना भी टेढ़ी खीर लगने लगती है. बेलगाड़िया जहां ज्यादतर लोगों को पुनर्वास मिला है वहां बच्चों का स्कूल, कॉलेज, सड़क जैसी मूलभूत सुविधाओं का भी घोर अभाव है. जिसकी वजह से झरिया के इंदिरा चौक, बस्तकोला, इस्लामपुर, राजपुर, एना कोलियरी, सब्जी बागान, नयी दुनिया, घनुडीह, लोदना आदि क्षेत्रों में लाखों लोग आग से जिंदगी का खतरनाक खेल खेलने को मजबूर हैं.

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लापरवाही का दंश झेल रहे हैं झरिया के 4 लाख लोग

बीसीसीएल और सरकार की लापरवाही की वजह से झरिया की लगभग 4 लाख की आबादी अग्नि प्रभावित क्षेत्रों में रहने को मजबूर हैं. क्योंकि झरिया की आग जगजाहिर होते हुए भी आग को बुझाने के प्रति सरकार और बीसीसीएल शुरू से ही उदासीन रही है. इसके अलावा पुनर्वास का काम भी कछुआ की चाल से भी धीरे चल रहा है. इस कारण झरिया के विभिन्न क्षेत्रों में भू-धंसान और गोफ बनने से लोगों की जाने जाती रही है. इन्हीं घटनाओं में लगभग 10 वर्ष पूर्व शिमला बहाल में एक लड़की जमीन में जिंदा समा जाने गई थी. कुछ वर्ष पूर्व चौथाई कुल्ही, घनुडीह, बस्तकोला समेत झरिया में भू धं-सान और गोफ बनने के ऐसे ही दर्जनों मामले हुए, इनमें कई की जान गयी.

सैकड़ों घर उजड़े और इसका सिलसिला जारी है. अनगिनत परिवार तबाह हो चुके हैं. फिर भी बीसीसीएल और सरकार के कान में जूं तक नहीं रेंगती. कहीं किसी बड़ी दुर्घटना में कोई मर जाता है तो काफी सक्रियता दिखाई जाती है. सत्ता और विपक्ष के नेता बरसाती मेंढक की तरह टर्र-टर्राने लगते है. इनकी मानवता भी कुछ घड़ियों के लिए जग जाती है. मीडिया में इनके फोटो भर जाते हैं. और फिर नेताजी को फुरसत कहां है? आउटसोर्सिंग कंपनियां सारे मानकों को ताक पर रखकर कोयला निकाल रही है. आग को बढ़ने का पूरा इंतजाम और वैग्यानिक उपाय यहां किया जाता है, ताकि आग में हजारों टन कोयला खाक होने के बहाने उसकी चोरी की जा सके. बीसीसीएल और सरकार की नजर में इंसान की जान की तुलना में कोयला का उत्पादन इतना जरूरी है कि उसने झरिया को एक टापू बना दिया है. जो चारों ओर आग और खदानों से घिरा हुआ है.

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अब पहले की तरह चहल-पहल नहीं

झारखंड की सबसे बड़ी और पुरानी मंडी-गलियों की भूल-भूलैया वाले झरिया शहर में अब पुराने दिनों की तरह चहल-पहल नहीं. वजह चारों तरफ से बढ़ती आग से सिमटती झरिया, जो अब वीरान होने लगी है. यहां से सब्जी पट्टी, फल मंडी, किराना थोक बाजार दशकों मे एक-एक कर धनबाद शिफ्ट हो गया. झरिया का प्रमुख शिक्षा का केंद्र आरएसपी कॉलेज, बिहार बिल्डिंग सिनेमा हॉल, झरिया राजगढ़, ब्लॉक आदि बंद हो गये. अब सभी ओर खंडहर ही खंडहर हैं. झरिया के हजारों ट्रांसपोर्ट बंद हो चुके हैं. कई कारखाने बंद पड़े हैं. ई ऑक्शन के कारण झरिया की कोयला मंडी भी अब सुनसान होने लगी है.

अब भी नहीं भागे रहीम-बबलू के परिजन

इंदिरा चौक के लोगों से बातचीत के दौरान ही 24 मई 2017 को जमीन धंसने से मरने वाले पिता-पुत्र बबलू अंसारी और रहीम अंसारी के परिजन भी मिल गये. उनके परिजन अब भी आग लगे स्थान पर ही रहने को मजबूर हैं. मृत बबलू खान के बड़े भाई असरफ खान ने बताया कि उस घटना के बाद बेलगडिया में बीसीसीएल ने उसके परिवार को घर तो दिया गया. लेकिन 4 भाइयों में से दो ही भाई को घर मिला. जबकि उसी स्थान पर साथ में ही रहने वाले बड़े भाई और छोटे भाई को आज तक आवास नहीं मिला है. उनकी वृद्ध मां भी आज भी मौत के आगोश में बेटे और पोते की जान ले लेनेवाली जमीन पर अपनी मौत का इंतजार कर रहीं हैं.

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अशरफ ने बताया कि उस घटना के बाद बीसीसीएल ने 2-3 हफ्ते तक नीचे कुल्ही के सरकारी स्कूल में उनके परिजनों को पुनर्वास ना होने तक रहने को कहा था. लेकिन बीसीसीएल की चुप्पी के बाद स्कूल प्रबंधन ने उन्हें बाहर निकाल दिया. इसके बाद झरिया सीओ और थाना में भी इस बात की जानकारी देने के बाद भी कुछ सुनवाई नहीं हुई. मजबूरन फिर से मां और छोटा भाई उसी स्थान पर जान-जोखिम में डालकर रह रहे हैं.

सिर्फ 11 परिवारों को घर दिया

मृतक बबलू खान की दादी ने बताया कि बीसीसीएल ने सिर्फ 11 परिवार को ही घर दिया. इसके वजह से अब भी सैकड़ों लोग वहां रहने को बाध्य हैं. यह भी कहा कि अगर हमलोग यहां से चले जायेंगे तो कमाएंगे क्या? हमारा परिवार यहां लगभग 150 साल से रह रहा है. यहां से हमारी रोजी-रोटी चलती है. दूसरी जगह पेट की आग कैसे बुझायेंगे? बताया कि बेटे की मौत के बाद उसके बेटे को आउटसोर्सिंग कंपनी में काम दिया गया था. वहां उसे 12000 रुपये मिलते थे. वह कंपनी भी तीन महीने बाद बंद हो गई, जिससे उसकी नौकरी भी चली गई.

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