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क्या कांग्रेसी विधायकों की लामबंदी से मंत्रीपद का कटहल पकेगा या कोई और ही गुल खिलेगा?

Anand Kumar

गर्मी के इस मौसम में झारखंड तप रहा है. लू के थपेड़ों की यह तपिश राजनीति में भी महसूस की जा सकती है. कांग्रेस पर इस गर्मी का कुछ ज्यादा ही असर है. तभी कांग्रेसी विधायकों का माथा रह-रह कर गर्म हो जाता है. दरअसल 16 सदस्यों वाली (बाद में प्रदीप यादव और बंधु तिर्की जुड़े) कांग्रेस के चार विधायक मंत्री बनकर मलाई काट रहे हैं, जो बाकियों को बर्दाश्त नहीं हो रहा है. और हो भी तो कैसे. आखिर हैं तो सभी विधायक ही. और जब इन्हीं विधायकों को अपने ही दल के मंत्री बने साथियों के आगे चिरौरी करनी पड़ती है, मिलने के लिए इंतजार करना पड़ता है, तो इनका खून खौलता है और उबलता खून भाप बनकर तीखे शब्दों के रूप में लबों से टपकता है. वैसे कांग्रेसी कोटे से मंत्री बने विधायकों के लटके-झटके और लाव-लश्कर भी बहुत हैं. यह बात भी बाकी विधायकों को अखरती है.

कांग्रेस वैसे तो देश की सबसे पुरानी पार्टी है और इसका दावा है कि यह समाज के सभी वर्गों को साथ लेकर चलती है. लेकिन झारखंड जैसे राज्य में कांग्रेस ने जो चार मंत्री बनाये हैं, उनमें दो सामान्य (एक बनिया एक ब्राह्मण), एक अल्पसंख्यक और एक आदिवासी है. पार्टी से चार महिलाएं चुनाव जीत कर विधायक बनीं, लेकिन एक को भी मंत्री नहीं बनाया गया. एक भी ईसाई मंत्री नहीं है, जबकि राज्य में ईसाईयों की बड़ी संख्या है, खासकर दक्षिणी छोटानागपुर प्रमंडल में. डॉ इरफान अंसारी एमबीबीएस डॉक्टर होने के नाते अपने को स्वास्थ्य मंत्रालय का हकदार मानते हैं, लेकिन मंत्री बन गये बारहवीं पास बन्ना गुप्ता. तिसपर बन्ना किसी विधायक को भाव भी नहीं देते. अभी पूर्व मुख्यमंत्री रघुवर दास के साथ गलबहियां करते फोटो ट्विटर पर डाल कर उन्होंने बहुतों की त्योरियां चढ़ा दी हैं. रही बाकी दो मंत्रियों की बात, तो आलमगीर आलम और रामेश्वर उरांव बहुत ज्यादा ही सीनियर हैं. उनकी अपनी ठसक और हनक है. उनसे काम कराना तो दूर, मिलना ही कांग्रेसी विधायकों के लिए टेढ़ी खीर है. रहे कृषि मंत्री बादल, तो वे भी अपने टशन के चलते बाकियों के निशाने पर ही रहते हैं.

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इन सभी मुद्दों को लेकर कांग्रेस में चाल-खुटचाल तो काफी समय से चल रही थी. असंतुष्ट विधायक पहले भी कई बार पार्टी आलाकमान से शिकायत कर चुके थे. कुछ के भाजपा के संपर्क में आने की चर्चाएं भी हुई थीं, लेकिन हर बार आशवासन देकर इन्हें चुप करा दिया जाता था. उत्तरप्रदेश चुनावों के ऐन पहले कांग्रेस के झारखंड प्रभारी आरपीएन सिंह के भाजपा में चले जाने के बाद से ही अटकलें थीं कि उनके समर्थक विधायक कुछ खेल कर सकते हैं. रही-सही कसर नये प्रभारी अविनाश पांडे के आने के बाद से पूरी हो गयी. पांडे को मंत्रियों ने हाइजैक कर लिया. बन्ना गुप्ता ने तो जमशेदपुर में प्रभारी का शानदार खैरमकदम किया. पांडेजी ने भी मंत्रियों के कामकाज को क्लीन चिट दे दी, तो असंतुष्ट विधायकों का पारा हाई हो गया. अब चार विधायकों डॉ इरफान अंसारी, विक्सल कोंगाड़ी, राजेश कच्छप और उमाशंकर अकेला ने मोर्चा खोलते हुए दावा किया है कि पांच और विधायकों का समर्थन उन्हें हासिल है. असंतुष्ट विधायक अब कांग्रेस के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी और महासचिव केसी वेणुगोपाल से मिलने की तैयारी में हैं.

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ऐसी सूरत में कांग्रेस आलाकमान को सतर्क रहना होगा. चार मंत्रियों को पालने के चक्कर में नौ विधायकों ने कहीं पलटी मार दी, तो सरकार की सूरत बदल सकती है. इधर झामुमो में भी असंतोष हिलोरें मार रहा है. यह बात अलग है कि सीता सोरेन और लोबिन हेंब्रम कभी सामने आकर आक्रमण करते दिखते हैं, तो दूसरे ही क्षण बैकफुट पर डिफेंसिव हो जाते हैं. उधर सुदेश महतो के नेत़ृत्व में सरयू राय, कमलेश सिंह, अमित यादव और लंबोदर महतो ने अलग से मोर्चाबंदी कर रखी है.

इस सब सवालों पर लाल बुझक्कड़ चाचा कहते हैं – “चैत-बैसाख के इस मौसम में वैसे भी लू के बहुतेरे झक्कड़ चलते हैं. कहा जाता है कि इस सीजन में बैसाखनंदन तो बिना खाये ही अघाये रहते हैं, लेकिन चुनाव की फसल काटनेवाले बैसाखनंदन तो सावन में भी चरने को आतुर रहते हैं. अभी तो खैर सूखे का सीजन है.. हां, कुछ दिनों बाद बाजार में लजीज रसीले आमों की बहार आ जायेगी.. राजनीति में कभी-कभी आम के साथ गुठलियों के भी दाम लग जाते हैं और इसी चक्कर में कितने ही लोग पेड़ पर लगे कटहल को देखते हुए होठों पर तेल लगाते रहते हैं.” अब कांग्रेसी विधायकों की लामबंदी से मंत्रीपद का कटहल पकेगा या नहीं, ये तो वक्त ही बतायेगा, तब तक आप और हम भी तेल और तेल की धार देखते हैं.

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