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कुणाल बेस्ट शायर ऑफ सदन, नारायण दास बेस्ट डेब्यू और सीपी सिंह ने ओढ़ा दिनकर का चोला

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Akshay Kumar Jha

Ranchi: झारखंड विधानसभा का बजट सत्र शांतिपूर्वक चल रहा है. विधायकों को इतना समय मिल रहा है कि वो शायरी और कविता पाठ कर रहे हैं. हालांकि समय को लेकर अध्यक्ष हर दस मिनट में माननीय सदस्यों को हिदायद देते रहते हैं. लेकिन फर्क शायद ही किसी को पड़ता है. बीते दो–तीन दिनों की बात करें तो देखा गया कि कुछ विधायक हैं जिन्होंने खुल कर सदन में शायरी की. शायरी अच्छी लगने पर माननीय सदस्यों की वाह-वाही भी मिली. वहीं कुछ विधायक शायरी और कविता सुनकर चिढ़ते दिखे. चिढ़ते दिखने वाले विधायकों की शिकायत यह थी कि उन्हें तो कभी कुछ कहने का मौका ही नहीं मिलता है. बाकियों को पता नहीं कैसे इतना समय मिलता है. प्रदीप यादव के सवाल के आते ही सत्ता पक्ष के कुछ विधायक तो सेटिंग का भी आरोप लगा रहे हैं. सफाई में अध्यक्ष महोदय को कहना पड़ रहा है कि अगर कोई शंका है, तो वो अपनी बात विधानसभा के सचिव के पास रख सकते हैं.

बेस्ट शायर कुणाल षाड़ंगी को और नारायण दास को बेस्ट डेब्यू अवार्ड

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विधायकों में प्रदीप यादव, कुणाल षाड़ंगी, सीपी सिंह और इरफान अंसारी सबसे ज्यादा शायरी पढ़ने वाले विधायक हैं. लेकिन अभी तक सदन में कुणाल षाड़ंगी की शायरी की सबसे ज्यादा सराहना हुई है. इसलिए उन्हें बेस्ट शायर ऑफ द सदन माना जा रहा है. वहीं इरफान अंसारी और सीपी सिंह की शायरी को गंभीरता से नहीं लिया जा रहा है. प्रदीप यादव चूंकि मामले को समझ कर बड़ी ही संजिदगी से किसी शेर को सदन में रखते हैं, इसलिए उनकी शायरी में आंकड़ों का वजन ज्यादा और दर्द कम होता है. लेकिन शायरी पढ़ने का इनका यही हाल रहा तो जल्द ही इन्हें अपना एक तखल्लुस (उपनाम) भी रख लेना चाहिए. वहीं शुक्रवार को देवघर के विधायक नारायण दास ने जिस तरीके से लगातार एक के बाद एक शायरी पढ़ी, उससे उनके शायर होने का पता सदन को चला. अचानक से उनका ये रूप सामने आने पर, उन्हें सदन का बेस्ट शायर डेब्यू माना जा रहा है. गुरुवार को प्रदीप यादव को जवाब दे रहे बीजेपी विधायक बिरंची नारायण ने भी शायरी पढ़ी. वैसे उन्हें बराबर अपनी बात रखते वक्त शायरी पढ़ते हुए देखा जाता रहा है.

और जब रोने लगीं निर्मला देवी…

बड़कागांव विधायक निर्मला देवी पहली पाली के ही समय से सदन में अपनी बात रखना चाह रही थीं. लेकिन उन्हें बोलने का मौका नहीं दिया जा रहा था. दूसरी पाली जैसे ही शुरू हुई वो अपनी बात रखने के लिए खड़ी हो गयीं. उन्होंने कहा कि आखिर तत्कालीन आयुक्त नितिन मदन कुलकर्णी की जांच रिपोर्ट के आधार पर पदाधिकारियों पर कार्रवाई क्यों नहीं हो रही है. वो कहने लगीं कि हम कानून का सम्मान करते हैं. इसलिए हमें भुगतना पड़ा. हमें सजा देते हुए भोपाल भेज दिया गया. लेकिन जिन अधिकारियों पर अनियमितता की बात जांच के बाद सामने आयी, उनपर किसी तरह की कोई कार्रवाई नहीं होती है. इतना कहते ही निर्मला देवी सदन में रोने लगी.

क्या था मामला

दरअसल हजारीबाग के तत्कालीन डीसी मनीष रंजन और एसपी पंकज कंबोज ने जनता की भावनाओं और हितों की अनदेखी की. दोनों अफसरों ने एक निजी कंपनी के प्रभाव में जनसुनवाई की कार्रवाई और आयोजन में व्यापक स्तर पर अनियमितता बरती. राज्यपाल के निर्देश पर हजारीबाग के तत्कालीन आयुक्त नितिन मदन कुलकर्णी की जांच में इसकी पुष्टि हुई थी. आयुक्त ने मामले में जांच के बाद दो मई 2013 को राज्यपाल के तत्कालीन प्रधान सचिव को भेजी. रिपोर्ट में साफ तौर पर कहा गया था कि पर्यावरण स्वीकृति के लिए जनसुनवाई की तिथि और स्थान के संबंध में निर्णय लेने के लिए उपायुक्त ही सक्षम थे. लेकिन प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय के निर्देशों को दरकिनार कर परियोजना स्थल (केरेडारी) से 45 किमी दूर हजारीबाग शहर स्थित नगर भवन में नक्सली बंदी के दिन जनसुनवाई हुई थी.

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