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हिन्दी की मशहूर साहित्यकार कृष्णा सोबती का 94 साल की उम्र में निधन 

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New Delhi: हिंदी की प्रसिद्ध साहित्यकार और ज्ञानपीठ अवॉर्ड से सम्मानित कृष्णा सोबती का शुक्रवार को निधन हो गया. वो 94 वर्ष की थीं. और पिछले कुछ दिनों से अस्वस्थ थीं. उनके निधन की खबर से साहित्य जगत में शोक की लहर है. बता दें कि बीते कुछ समय पहले सीने में तकलीफ के चलते अस्पताल में भर्ती कराया गया था. 18 फरवरी 1925 को वर्तमान पाकिस्तान के एक कस्बे में जन्मी सोबती ने मध्यमवर्गीय महिलाओं की समस्याओं को प्रखर तौर पर सामने रखा था. अपने उपन्यासों में राजनीति और समाज की नब्ज टटोलने के साथ ही मध्यमवर्गीय महिला की बोल्ड आवाज बनकर सामने आईं. उन्होंने अपनी रचनाओं में महिला सशक्तिकरण और स्त्री जीवन की जटिलताओं का जिक्र किया था.

साहित्य के क्षेत्र में बड़ा योगदान

उपन्यास और कहानी विधा में  कृष्णा सोबती ने जमकर लेखन किया. उनकी प्रमुख कृतियों में डार से बिछुड़ी, मित्रो मरजानी, यारों के यार तिन पहाड़, सूरजमुखी अंधेरे के, सोबती एक सोहबत, जिंदगीनामा, ऐ लड़की, समय सरगम, जैनी मेहरबान सिंह जैसे उपन्यास शामिल हैं. उनके उपन्यास मित्रो मरजानी को हिंदी साहित्य में महिला मन के अनुसार लिखी गई बोल्ड रचनाओं में गिना जाता है. बादलों के घेरे नामका उनका कहानी संग्रह काफी चर्चित रहा है. उनके एक और उपन्यास जिंदगीनामा को हिंदी साहित्य की कालजयी रचनाओं में से माना जाता है. 2015 में देश में असहिष्णुता के माहौल से नाराज होकर उन्होंने अपना साहित्य अकादमी अवॉर्ड वापस लौटा दिया था

लेखिका कृष्णा सोबती को कई सम्मान भी मिले. इनमें साहित्‍य अकादमी सम्मान, साहित्य शिरोमणि सम्मान, शलाका सम्मान, मैथिली शरण गुप्त पुरस्कार, साहित्य कला परिषद पुरस्कार, कथा चूड़ामणि पुरस्कार शामिल है. साल 2017 का ज्ञानपीठ पुरस्कार उन्हें देने की घोषणा भी की गई थी.

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