West Bengal

कोलकाता :  नहीं बढ़ रहा किराया, बंगाल की सड़कों से नदारद हो रही हैं प्राइवेट बसें

Kolkata :   कोरोना से बचाव के लिए शारीरिक दूरी का पालन करने हेतु सीटों के बराबर यात्रियों को लेकर चलने की मजबूरी और ईंधन की कीमत में लगातार हो रही बढ़ोतरी के कारण बस मालिक परेशानी में हैं. इसके कारण कोलकाता समेत शिल्पांचल की सड़कों से प्राइवेट बसें नदारद होने लगी हैं. सोमवार सप्ताह के पहले दिन महानगर में बहुत कम संख्या में प्राइवेट बसें चली हैं. जिसकी वजह से नियमित यात्री परेशानी में पड़े हुए हैं.

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आठ जून से खुल गये हैं दफ्तर

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के निर्देशानुसार गत आठ जून से ही कोलकाता में प्राइवेट और निजी दफ्तर खोल दिए गए हैं. लोकल ट्रेन और मेट्रो सेवा पहले से ही बंद हैं. ऐसे में दफ्तर आने-जाने वालों के लिए बस ही एक मात्र सहारा है. सरकारी बसों की संख्या इतनी अधिक नहीं है कि बड़ी संख्या में दफ्तर जाने वाले यात्रियों की भीड़ संभाल सके.

इसलिए प्राइवेट बसों पर ही लोग आधारित रहते हैं. दफ्तर शुरू होने के बाद बस मालिकों के संगठन के साथ राज्य सरकार की बैठक हुई थी. जिसमें किराया बढ़ोतरी के लिए एक कमेटी बनाई गई थी. लेकिन लंबा वक्त बीतने के बाद भी कोई फैसला नहीं लिया गया. इधर, पिछले 15 दिनों में डीजल की कीमत में नौ रुपये की बढ़ोतरी हुई है. लगातार कीमतों में बढ़ोतरी के बावजूद केंद्र अथवा राज्य की सरकारें बस मालिकों की सुविधाओं के लिए कोई कदम नहीं उठा रही हैं.

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500 रुपये अतिरिक्त खर्च पड़ रहा है

बस चलाने के लिए एक दिन में करीब 50 से 55 लीटर तेल लगता है. डीजल की कीमत बढ़ने के कारण प्रतिदिन 500 रुपये का अतिरिक्त डीजल खर्च हो रहा है. इसलिए बस मालिकों ने बस चलाने से इनकार करना शुरू कर दिया है. नाम प्रकाशित नहीं करने की शर्त पर एक बस मालिक ने बताया कि बस के कारोबार से कई लोगों का रोजगार जुड़ा हुआ है. इसे ध्यान में रखते हुए नुकसान सहकर भी बस चलाई जा रही है.

घर से पैसे लग रहे हैं लेकिन सरकार भाड़ा बढ़ोतरी के बारे में कोई निर्णय नहीं ले रही. इसलिए अब बस चलाना मुश्किल है. कोलकाता में एक बस के रोज करीब चार ट्रिप लगते थे लेकिन अब केवल दो ट्रिप लगते हैं. ज्वाइंट काउंसिल ऑफ बस सिंडिकेट के महासचिव तपन बनर्जी ने बताया कि कोलकाता की सड़कों से 90 फ़ीसदी बसें नदारद हैं क्योंकि मालिक चला नहीं पा रहे हैं.

कर्मचारियों का वेतन और बसों का मेंटेनेंस करने में काफी पैसे खर्च होते हैं. अगर सरकार सोच-विचार कर भाड़ा बढ़ोतरी नहीं करती है तो बस चलाना मुश्किल होगा.

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