ChaibasaJharkhandKhas-KhabarRanchiTODAY'S NW TOP NEWSTop Story

कोल्हानः मुश्किल होगी चुनावी डगर- राजनेताओं को कांटे की तरह चुभेंगे जनता के सवाल

  • राशन,पेंशन,रोजगार जैसे मुद्दे जन आक्रोश का बन सकते हैं बड़ा कारण
  • चाईबासा लोकसभा क्षेत्र में आमजनों का मुद्दा सांसद और विधायक को करेगा परेशान

Ranchi/Chaibasa: सरकार के विकास के दावों के बीच झारखंड का ग्रामीण अंचल हाफ रहा है. सरकार की योजनाएं आम जनों की पहुंच से दूर होती जा रही हैं. जहां विकास के दावे खोखले साबित हो रहे हैं. सूबे के खाद्य आपूर्ति मंत्री और सरकार के मुखिया के बीच का टकराव और खाद्य आपूर्ति विभाग की लपारवाही के कारण सुदूरवर्ती झारखंड के हिस्से में राशन,पेंशन और प्रधानमंत्री आवास योजना का समुचित रूप से अनुपालन नहीं हो पा रहा है. कोल्हान के ग्रामीण इलाकों में सरकारी योजनाएं जरुरतमंदों की पहुंच से कोसो दूर है.

पिछले एक साल में चाईबासा के खूंटपानी प्रखंड के उलिराजाबासा गांव में चार महीनों से राशन नहीं मिला है. वहीं छोटा बंकुआ में पांच महीनों से राशन नहीं मिला है. प्रखंड व ज़िला प्रशासन के समक्ष शिकायत करने के बावज़ूद भी लोग अपने राशन से वंचित हैं.

advt

आरगुन्डी गांव में ही राशन दुकान होने के बावज़ूद यहां के लोगों को राशन लेने के लिए अनिवार्य आधार-आधारित बायोमेट्रिक प्रमाणिकरण के लिए 2.5 किमी दूर प्रखंड आना पड़ता है. उनके गांव में इंटरनेट नेटवर्क नहीं है. कई बार तो दिन भर बैठना पड़ता है एवं 2-3 दिनों तक लगातार जाना पड़ता है. लोगों के लिए आने-जाने का खर्चा और दैनिक मज़दूरी का नुकसान राशन लेने का हिस्सा बन गया है. कभी नेटवर्क कमज़ोर होता है, तो कभी सर्वर डाउन. अपनी स्वतंत्रता के लिए बार-बार लड़ने वाले हो आदिवासी अब अपने भोजन के अधिकार के लिए नेटवर्क, आधार और सर्वर के गुलाम बन गए हैं.

क्या है गांवों की हकीकत

हाटगम्हरिया प्रखंड के देव जोड़ी गांव के वृद्ध पचाए मुंडुईया अकेले रहते हैं और शारीरिक रूप से कमज़ोर हैं. उनके पास आधार कार्ड नहीं है. उनका राशन कार्ड आधार से नहीं जुड़ा होने के कारण 2017 में रद्द कर दिया गया था. पिछले दो वर्षों में इस मुद्दे पर इतने हल्ला-हंगामा होने के बाद भी सरकार के अधिकारी और मंत्री फर्जी राशन कार्ड से सरकारी राशि के बचाव का ढोल पिटते रहे जबकि जरूरतमंदों को राशन कार्ड रद्द होने के राशन नहीं मिलता. अभी भी हजारों लोगों का कार्ड नहीं बना है. खूंटपानी प्रखंड की शारीरिक रूप से विकलांग असाई बोदरा को फरवरी 2019 में राशन नहीं मिल पाया, क्योंकि उनका कार्ड रद्द कर दिया गया है.

जिन्हें राशन मिलता भी है, उन्हें कटौती कर के दिया जाता है. इसी प्रखंड के कुइड़ा गांव की राशन डीलर गांव के अंत्योदय कार्डधारियों के 35 किलो अनाज प्रति माह कोटा से 5-7 किलो अनाज काटती हैं. कार्डधारियों के कार्ड पर दर्ज सभी व्यक्तियों के 5 किलो अनाज के प्रति माह कोटा से 0.5-1.5 किलो अनाज काटे जाते हैं. कुइड़ा गांव के आंगनवाड़ी केंद्र में बच्चों को कभी कभार ही खाना मिलता है. जामडीह पंचायत के नोगरा गांव का केंद्र तो पिछले डेढ़ साल से बंद है.

adv

काम के अधिकार का हनन

कोल्हान के गांवों में रोज़गार की आवश्यकता समझना मुश्किल नहीं है. माता-पिता के साथ कई बार बच्चे भी मज़दूरी करते दिखाई देते हैं. लेकिन गांवों में नरेगा अंतर्गत काम के अधिकार का हनन आम बात है. इचापी टोले के अधिकांश नरेगा मज़दूरों का पिछले कुछ वर्षों में किए गए काम का भुगतान अभी भी बकाया है. खूंटपानी प्रखंड के छोटा बांकुआ गांव की भी यही कहानी है. अब यहां अधिकांश मज़दूरों ने नरेगा में काम करना छोड़ दिया है.

नरेगा मज़दूर भी टेक्नोलॉजी का प्रहार भुगत रहे हैं. नोगरा गांव के मंगला तुई को 2017 में किए गए 17 दिनों के काम का भुगतान अभी तक नहीं मिला है. उनका भुगतान उनके स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के खाते में न जाकर गांव से 35 किमी दूर चाईबासा स्थित ज़िला को-ऑपरेटिव बैंक के खाते में चला गया है. न उन्हें इसकी जानकारी है और न ही उन्होंने कभी यह खाता खोला था.

पेंशन से वंचित

हर गांव में बड़े पैमाने पर वृद्ध व विधवा पेंशन से वंचित हैं. उलिराजाबासा गांव के अनेक लोगों ने कई बार पेंशन के लिए आवेदन भी दिया था, लेकिन किसी की पेंशन स्वीकृत नहीं हुई. हाटगम्हरिया प्रखंड के केंदपोसी गांव की वृद्ध बुधनी सिंकू को दो साल से पेंशन मिलना बंद हो गया है, क्योंकि वो अपना आधार पेंशन योजना से लिंक नहीं करवा पायी थी.

ठेकेदारों द्वारा शोषण

इचापी के कई आदिवासी परिवारों के लिए प्रधानमंत्री आवास योजना स्वीकृत हुई है. लेकिन आधे से ज्यादा पैसा क्षेत्र के ही एक ठेकेदार ने हड़प लिया. नोगरा गांव में अधिकांश मज़दूरों का जॉब कार्ड एक ठेकेदार ने जब्त कर रखा है. कमोवेश ऐसी स्थिति लगभग हर गांव में देखने को मिलती है. सोचने की बात ये भी है कि ये ठेकेदार, राशन डीलर आदि किसी न किसी राजनैतिक दल से जुड़े हैं.

राजनीतिक प्रतिबद्धता की कमी

सरकार की विकास योजना का प्रचार और जमीनी हकीकत में अंतर का असर कोल्हान में भाजपा को झेलना पड़ सकता है. आनेवाले लोकसभा और विधानसभा चुनावों में शायद इसका परिणाम इलाके में दिखने की भी संभावना है. लेकिन विपक्षी दलों की ओर से भी आम जनो से जुड़े विषय पर पहल नहीं करना राजनीति में आमजनो के मुद्दे को दरकिनार करने की प्रवृति की ओर इशारा करता है.

आजकल कोल्हान क्षेत्र की प्रमुख लोकसभा सीट, चाईबासा काफी चर्चा में है. क्षेत्र के वर्तमान सांसद भाजपा के हैं. इस क्षेत्र की एक विधानसभा सीट के अतिरिक्त अन्य सभी पर 2014 में झामुमो ने अपना झंडा गाड़ा था. यहां कांग्रेस और मधु कोड़ा (अब कांग्रेस) का भी बड़ा जनाधार है. फिलवक्त राज्य के विपक्षी महागठबंधन के लिए यही सवाल है कि कांगेस आम जनों के आक्रोश को कैसे स्वर देती है और भाजपा के समक्ष चुनौती है कि विकास के दावे और विकास योजनाओं को आम जनों तक कैसे पहुंचाये. इसी खेल के बीच आदिवासी बाहुल क्षेत्र के लोगों को उनका अधिकार कैसे मिले आज ये भी बड़ी चुनौती है. कोल्हान के लोगों के लिए भी राशन व सामाजिक सुरक्षा पेंशन जीवनरेखा समान है. साथ ही, अन्य जन अधिकारों जैसे नरेगा अंतर्गत काम का अधिकार, बच्चों के लिए आंगनवाड़ी सेवाएं आदि पर भी लोगों की निर्भरता है.

इसे भी पढ़ेंःसरयू राय ने इस्तीफा टाला, राज्यपाल से मिलने के बाद कहा “जो एजेंडा पहले मिलने का था उसमें परिवर्तन…

advt
Advertisement

Related Articles

Back to top button