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जानिये, सीमांत गांधी ने कांग्रेस नेताओं से क्यों कहा कि आपने हमें भेड़ियों के सामने फेंक दिया

भारत रत्न अब्दुल गफ्फार खान की पुण्यतिथि पर विशेष

Naveen Sharma

भारत के स्वतंत्रता संग्राम में ख़ान अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ान का महत्वपूर्ण योगदान है. वे कमाल की शख्सियत थे. उन्हें सीमान्त गांधी,बच्चा खां, तथा बादशाह खान के नाम से भी पुकारा जाता है. ब्रिटिश सरकार से आजादी के लिए संघर्षरत ‘स्वतंत्र पख्तूनिस्तान’ आंदोलन के प्रणेता थे.

भारत के विभाजन का पुरजोर विरोध किया

एक धर्मनिरपेक्ष इंसान होने के नाते गफ्फार खान ने हमेशा ही भारत के विभाजन का विरोध किया. इसके कारण मुस्लिम लीग के समर्थकों ने उन्हें मुस्लिम-विरोधी भी कहा. 1946 में पेशावर में उनपर जानलेवा हमला भी हुआ. जब कांग्रेस भारत का विभाजन रोकने में असफल रही तब गफ्फार खान बहुत आहत हुए. उन्होंने गांधी और कांग्रेस के अन्य नेताओं से कहा कि आप लोगों ने हमें भेड़ियों के सामने फेंक दिया.

जमींदार परिवार में हुआ जन्म

खान अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ान का जन्म ब्रिटिश इंडिया में पेशावर घाटी के उत्मान जई में एक समृद्ध परिवार मैं हुआ था. उनके पिता बहराम इलाके के एक समृद्ध ज़मींदार थे और स्थानीय पठानों के विरोध के बावजूद उन्होंने अपने दोनों बेटों को अंग्रेजों द्वारा संचालित मिशन स्कूल में पढ़ाया. गफ्फार पढ़ाई में होशियार थे और मिशन स्कूल में उन्होंने शिक्षा के महत्त्व को समझा. हाई स्कूल के अंतिम वर्ष में उन्हें अंग्रेजी सरकार के अंतर्गत पश्तून सैनिकों के एक विशेष दस्ते में शामिल होने का प्रस्ताव मिला पर उन्होंने यह प्रस्ताव ठुकरा दिया. उन्हें अच्छी तरह से पता था कि इस ‘विशेष दस्ते’ के अधिकारियों को भी उन्ही के देश में द्वितीय श्रेणी का नागरिक समझा जाता था.

अलीगढ मुस्लिम विश्वविद्यालय में पढ़ाई की

गफ्फार खान ने अलीगढ मुस्लिम विश्वविद्यालय में पढ़ाई की. उच्च शिक्षा के लिए अपने भाई की तरह लंदन जाना चाहते थे. उनकी मां इसके खिलाफ थीं इसलिए उन्होंने यह विचार त्याग दिया और अपने पिता के साथ खेती-बाड़ी का कार्य करने लगे.

महज बीस साल की उम्र में स्कूल खोला

सन 1910 में महज बीस साल की उम्र में गफ्फार ने  गृहनगर उत्मान जई में एक स्कूल खोला जो बहुत सफल साबित हुआ. 1911 में वो पश्तून स्वतंत्रता सेनानी तुरंग जई के हाजी साहेब के स्वाधीनता आन्दोलन में शामिल हो गये. अंग्रेजी हुकुमत ने उनके स्कूल को सन 1915 में प्रतिबंधित कर दिया. सन 1915 से लेकर 1918 तक उन्होंने पश्तूनों को जागृत करने के लिए लगभग 500 गांवों की यात्रा की. इसके बाद उन्हें ‘बादशाह खान’ का नाम दिया गया.

खुदाई खिदमतगार

पश्तूनों के उत्थान में संघर्षरत बादशाह खान एक ऐसे भारत की स्थापना चाहते थे जो आज़ाद और धर्मनिरपेक्ष हो. इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए उन्होंने खुदाई खिदमतगार नामक संगठन बनाया जिसे सुर्ख पोश भी कहा गया. खुदाई खिदमतगार की स्थापना महात्मा गांधी के अहिंसा और सत्याग्रह जैसे सिद्धान्तों से प्रेरित होकर की गयी थी.

बादशाह खान के करिश्माई नेतृत्व का कमाल था कि संगठन में लगभग 100000 सदस्य शामिल हो गये. उन्होंने शांतिपूर्ण तरीके से अंग्रेजी पुलिस और सेना का विरोध करना शुरू कर दिया. खुदाई खिदमतगारों ने हड़तालों, राजनैतिक संगठन और अहिंसात्मक प्रतिरोध के माध्यम से अंग्रेजी हुकुमत के खिलाफ सफलता हासिल की और खईबर-पख्तुन्ख्वा में एक प्रमुख राजनीतिक शक्ति बन गये. बादशाह के भाई डॉ खान अब्दुल जब्बर खान ने संगठन के राजनैतिक खंड की जिम्मेदारी संभाली और 1920 के दशक के अंतिम सालों से लेकर सन 1947 तक प्रांत के मुख्यमंत्री रहे.

किस्सा ख्वानी नरसंहार

1930 ई. के नमक सत्याग्रह के दौरान गफ्फार खान को 23 अप्रैल को गिरफ्तार कर लिया गया. इसके विरोध में खुदाई खिदमतगारों विरोध प्रदर्शन के लिए पेशावर के किस्सा ख्वानी बाज़ार में इकठ्ठा हुए. अंग्रेजों ने निहत्थी और अहिंसात्मक भीड़ पर मशीनगनों से गोलियां चलाने का आदेश दिया जिसमे लगभग 200 -250 लोग मारे गये. इसी दौरान गढ़वाल राइफल रेजिमेंट के दो प्लाटूनों ने निहत्थी और अहिंसात्मक भीड़ पर गोलियां चलाने से इनकार कर दिया. इसके परिणामस्वरूप उनका कोर्ट मार्शल किया गया और कठोर सजा सुनाई गयी.

गफ्फार खान और कांग्रेस

गफ्फार खान और महात्मा गांधी के बीच एक आध्यात्मिक स्तर की मित्रता थी. दोनों ने सन 1947 तक मिल-जुलकर काम किया. गफ्फार खान के खुदाई खिदमतगार और कांग्रेस (जो स्वाधीनता संग्राम का नेतृत्व कर रही थी) ने स्वाधीनता के संघर्ष में एक-दूसरे का साथ निभाया. बादशाह खान खुद कांग्रेस के सदस्य बन गये थे. कई मौकों पर जब कांग्रेस गांधीजी के विचारों से सहमत नहीं होती तब गफ्फार खान गांधी के साथ खड़े दिखते. वो कई सालों तक कांग्रेस कार्य समिति के सदस्य रहे पर उन्होंने अध्यक्ष बनने से इनकार कर दिया.

गफ्फार खान महिला अधिकारों और अहिंसा के पुरजोर समर्थक थे. उन्होंने ताउम्र अहिंसा में अपना विश्वास कायम रखा. उनके इन सिद्धांतों के कारण भारत में उन्हें ‘फ्रंटियर गांधी’ के नाम से पुकारा जाता है.

पाकिस्तान में शामिल होने के जनमत संग्रह का विरोध

सन 1947 में जब ‘खईबर-पख्तुन्ख्वा’ को पाकिस्तान में शामिल होने के मसले पर जनमत संग्रह कराया गया तब कांग्रेस और गफ्फार खान ने इसके विरोध किया. इसके साथ ही जनमत संग्रह में शामिल होने से इनकार कर दिया. जिसके परिणामस्वरुप ‘खईबर-पख्तुन्ख्वा’ ने बहुमत से पाकिस्तान में शामिल होने के पक्ष में मत दिया.

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पकिस्तान में कई वर्षों तक जेल में या नजरबंद रहे

हालांकि देश के विभाजन से गफ्फार खान किसी प्रकार से भी सहमत नहीं थे पर बंटवारे के बाद उन्होंने पाकिस्तान में शामिल होने का निर्णय लिया. देश के प्रति अपनी निष्ठा भी प्रकट की लेकिन पाकिस्तानी हुकुमत को उनकी निष्ठा पर सदैव संदेह रहा. विडम्बना ऐसे रही की इस महान देशभक्त और स्वतंत्राता सेनानी की इच्छाओं को पाकिस्तान की सरकार ने अनसुना कर दिया और सरकार खान एवं उनके समर्थकों को पाकिस्तान की विकास और प्रगति में बाधा मानते रहे. उनकी निष्ठा पर संदेह करनेवाली तमाम सरकारों ने उन्हें या तो घर में नजरबन्द रखा या जेल में रखा. इलाज के लिए वो कुछ समय के लिए इंग्लैंड गये और फिर वहां से अफगानिस्तान चले गये. लगभग 8 सालों तक निर्वासित जीवन बिताने के बाद 1972 में वो वापस लौटे पर बेनजीर भुट्टो सरकार ने उन्हें फिर गिरफ्तार कर लिया.

भारत रत्न भी दिया गया

खान अब्दुल गफ्फार खान का निधन सन 1988 में पेशावर में हुआ जहां उन्हें घर में नजरबन्द रखा गया था. उनकी इच्छा के अनुसार उन्हें उनके जलालाबाद (अफगानिस्तान) स्थित घर में दफनाया गया. उनके अंतिम संस्कार में 2 लाख से भी ज्यादा लोग शामिल हुए जो उनके महान व्यक्तित्व का परिचायक था. सन 1987 में भारत सरकार ने उन्हें देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया था.

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