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जानिये क्यों एक्ट्रेस नूतन ने संजीव कुमार को सरेआम जड़ दिया था थप्पड़

एफर्टलेस एक्टिंग के सरताज संजीव कुमार की जयंती पर विशेष

Naveen Sharma

Ranchi : संजीव कुमार हिंदी फिल्मों के सबसे उत्कृष्ट कलाकारों में से एक हैं. उनकी सबसे बड़ी खासियत यह थी कि वे एफर्टलेस एक्टिंग (सहज अभिनय) करते थे. यही बात उन्हें अन्य कलाकारों से जुदा करती है. उनकी दूसरी खासियत ये थी कि वे किसी भी फिल्म में अपने रोल को इस नजरिये से देखते थे कि उसमें अभिनय के अलग-अलग रंग दिखाने की कितनी संभावनाएं हैं.

इस वजह से उनको हम हर तरह की भूमिकाएं करते हुए देखते हैं वे चाहे हीरो हों, विलेन हों या फिर कॉमेडियन के रूप में हों.

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शोले में ठाकुर का रोल धर्मेंद्र करना चाहते थे, ऐसे मिला संजीव को रोल

संजीव कुमार को आमतौर पर लोग 1975 में आई रमेश सिप्पी की सुपर हिट फिल्म शोले में ठाकुर की भूमिका के लिए सबसे अधिक याद करते हैं. संजीव कुमार को वृद्ध व्यक्ति की भूमिका निभाने में महारत हासिल थी. शोले में उन्होंने रिटायर्ड पुलिस आफिसर की दमदार भूमिका निभाई थी. इस फिल्म में ठाकुर का रोल धर्मेंद्र करना चाहते थे.

निर्देशक रमेश सिप्पी उलझन में पड़ गए. उन दिनों धर्मेन्द्र और संजीव कुमार दोनों ही हेमा मालिनी (hema malini) के दीवाने थे.

रमेश सिप्पी ने ट्रिक अपनाई उन्होंने धर्मेन्द्र से कहा कि तुमको वीरू का रोल निभाते हुए ज्यादा से ज्यादा हेमा के साथ रोमांस करने का मौका मिलेगा. यदि तुम ठाकुर बनोगे तो मैं संजीव कुमार को वीरू का रोल दे दूंगा. इस पर धर्मेन्द्र बीरू का रोल करने को राजी हो गए.

इस फिल्म में वैसे तो सभी कलाकारों ने बढिय़ा अभिनय किया है लेकिन असली मुकाबला तो ठाकुर और गब्बर सिंह के बीच ही था. इसलिए सबसे ज्यादा क्रेडिट ठाकुर बने संजीव कुमार और गब्बर सिंह बने अमजद खान ले जाते हैं. इस एक रोल के लिए भी संजीव कुमार हमेशा याद किए जाएंगे.

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असली नाम हरिहर जेठालाल जरीवाला

संजीव कुमार का जन्म 9 जुलाई 1938 को सूरत में मध्यमवर्गीय गुजराती परिवार में हुआ था. उनका नाम हरिहर जेठालाल जरीवाला था. वे पहले रंगमंच से जुड़े. इसके बाद फि़ल्मालय के एक्टिंग स्कूल में दाखिला लिया.

वर्ष 1960 में उन्हें फि़ल्मालय बैनर की फि़ल्म हम हिन्दुस्तानी में छोटी सी भूमिका मिली. 1968 में रिलीज हुई राजा और रंक की सफलता ने संजीव कुमार के पैर हिंदी फिल्मों में मजबूती से जमाए.

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खिलौना फिल्म की कामयाबी के बाद बनी पहचान

वर्ष 1970 में प्रदर्शित खिलौना फिल्म की जबर्दस्त कामयाबी के बाद संजीव कुमार ने बतौर अभिनेता अलग पहचान बना ली. इसमें उन्होंने मंदबुद्धि के व्यक्ति की भूमिका बड़ी शिद्दत से निभाई थी.

वर्ष 1970 में ही प्रदर्शित फि़ल्म दस्तक में उन्होंने लाजवाब अभिनय किया था. इसके लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया.
इसके बाद इनकी हिट फि़ल्म सीता और गीता और मनचली प्रदर्शित हुईं.

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गुलजार के साथ जुगलबंदी से आईं बेहतरीन फिल्में

1972 में निर्देशक गुलजार संजीव कुमार की फिल्म सुबह-ओ-शाम में उनके अभिनय से बेहद प्रभावित हुए. इसके बाद गुलजार ने संजीव कुमार को लेकर कोशिश (1973) फिल्म बनाई.

कोशिश में उनके अभिनय का नया आयाम दर्शकों को देखने को मिला. उन्होंने गूँगे व्यक्ति की भूमिका में जान डाल दी थी. बगैर संवाद बोले सिर्फ आँखों और चेहरे के भाव से दर्शकों को सब कुछ बताने में वे कामयाब रहे थे.

गुलजार ने संजीव कुमार को लेकर एक और यादगार फिल्म बनाई वो आंधी (1975) थी. इसमें संजीव कुमार ने राजनेता बनी सुचित्रा सेन के पति की भूमिका निभाई थी. यह लाजवाब फिल्म थी.

इसके तीन गीत बहुत ही बेहतरीन बन पड़े हैं जैसे तेरे बिना जिंदगी से कोई शिकवा तो नहीं,दूसरा इस मोड़ से जाते हैं कुछ सुस्त कदम रस्ते कुछ तेज कदम राहें और तुम आ गए हो नूर आ गया है.

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लाइट कॉमेडी की बेहतरीन फिल्में

इसके बाद गुलजार और संजीव कुमार की जुगलबंदी में मौसम (1975) फिल्म बनी. वहीं इन्होंने अंगूर (1980) और नमकीन (1982) लाइट कॉमेडी की बेहतरीन फिल्में दीं. इस जोड़ी ने नौ फिल्में बनाई. नया दिन नई रात (1974) में संजीव कुमार ने एक अलग रिकार्ड बनाया. उन्होंने नौ भूमिका अदा की और अपने अभिनय के कई रंग एक ही फिल्म में दिखाए.

दो बार राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार

संजीव कुमार को दो बार सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला. एक बार दस्तक (1971) के लिए और दूसरी बार कोशिश (1973) के लिए. वहीं फिल्मफेअर पुरस्कारों में दो बार उन्होंने बेस्ट एक्टर (आंधी-1976 और अर्जुन पंडित-1977) का अवार्ड मिला. एक बार बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर (शिकार-1969) का अवॉर्ड जीता.

1978 में आई त्रिशूल फिल्म में अमिताभ बच्चन के पिता की भूमिका वे बखूबी निभाते हैं. इनदोनों में जबर्दस्त मुकाबला नजर आता है. ये जोड़ी एक बार फिर सिलसिला फिल्म में नजर आती है और एक शानदार फिल्म बनती है.

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शतरंज का खिलाड़ी

पति पत्नी और वो तथा श्रीमान श्रीमती जैसे लाजवाब कॉमेडी फिल्मों में अलग ही रंग में दिखते हैं. उनके एक्टिंग का एक और बेहतरीन नमूना आप सत्यजीत रे की क्लासिक फिल्म शतरंज का खिलाड़ी (1975)में देख सकते हैं.

विधाता में ट्रेजडी किंग को कड़ी टक्कर

1982 में आई विधाता फिल्म में वे ट्रेजडी किंग दिलीप कुमार को कड़ी टक्कर देते नजर आते हैं. जानी दुश्मन जैसी हॉरर फिल्म में वे राक्षस की भूमिका निभाते हुए अलग ही अंदाज में दिखते हैं.

अभिनेत्रियों से रोमांस के किस्से

एक बार नूतन ने संजीव कुमार को थप्पड़ गाल पर रसीद दिया था. दरअसल नूतन और संजीव के बीच रोमांस की खबरें फैल रही थीं. इससे नूतन के वैवाहिक जीवन में खलबली मच गई थी. नूतन को लगा कि संजीव इस तरह की बातें फैला रहे हैं लिहाजा आमना-सामना होने पर उन्होंने संजीव को थप्पड़ जमा दिया था.

संजीव कुमार शादी करने से बचते रहे. हेमा मालिनी को वे पसंद करते थे, लेकिन बीच में धर्मेन्द्र आ गए. सुलक्षणा पंडित के साथ संजीव की नजदीकियां सुर्खियां बटोरती रहीं, लेकिन सुलक्षणा के साथ शादी करने की हिम्मत संजीव नहीं जुटा पाए.

वे आजीवन कुँवारे रहे और मात्र 47 वर्ष की आयु में 1984 में हृदय गति रुक जाने से बम्बई में उनकी मृत्यु हो गयी. 1960 से 1984 तक पूरे पच्चीस साल तक वे लगातार फि़ल्मों में अपने एक से बढ़ कर एक भूमिका निभाते रहे.
संजीव कुमार को उनके शिष्ट व्यवहार व विशिष्ट अभिनय शैली के लिए लोग उन्हें हमेशा याद करेंगे.

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