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जानें कौन है झारखंड की वो पहली जोड़ी जो ओलंपिक में बढ़ायेगी देश का मान

Amit Jha

Ranchi: ओलंपिक में देश के लिये पदक जीतना और तिरंगा लहराने का ख्वाब हर भारतीय खिलाड़ी का होता है. फिलहाल अलग-अलग खेलों से इंडियन टीम और प्लेयर्स के सेलेक्शन का दौर जारी भी है. इसमें झारखंड से एक बड़ा नाम तीरंदाज दीपिका कुमारी का भी है. तीसरी बार ओलंपिक खेलने में लगी दीपिका इस बार अपने जीवनसाथी अतनू दास के साथ मिलकर तीरंदाजी में कमाल दिखाने को तैयार है. यह पहली बार होगा जब झारखंड से कोई खिलाड़ी इस रूप में ओलंपिक में भागीदारी करेगी. बल्कि खेलों के इतिहास में भारत की ओर से यह पहली जोड़ी होगी जो पति पत्नी के तौर इस प्लेटफॉर्म पर परफॉर्म करती नजर आयेगी. हालांकि तीरंदाजी में अंकिता भगत औऱ कोमलिका बारी भी इस बार के ओलंपिक में नजर आ सकती (संभावित) हैं.

केवल 4 बेटियों ने ओलंपिक में बढ़ाया है झारखंड का मान

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झारखंड बने 20 साल हो चुके. इतने सालों में हॉकी और आर्चरी को छोड़कर और कोई ऐसा खेल नहीं हैं, जिसमें किसी खिलाड़ी ने ओलंपिक में हिस्सेदारी की हो. आर्चरी में मात्र लक्ष्मी रानी मांझी (सरायकेला खरसावां), रीना कुमारी (बोकारो) और दीपिका कुमारी (रांची) ही ऐसी खिलाड़ी रही हैं जो आर्चरी में ओलंपिक तक खेल चुकी हैं. इसके अलावे हॉकी में निक्की प्रधान ने भी भारतीय हॉकी टीम का हिस्सा बनकर ओलंपिक में भागीदारी की है. हालांकि उम्मीद जतायी जा रही है कि भारतीय महिला हॉकी टीम इस बार के ओलंपिक में शामिल होगी तो उसमें शामिल निक्की प्रधान और सलीमा टेटे (झारखंड) दोनों इस बार ओलंपियन बन सकेंगी.

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Pitambara
Pushpanjali
Sanjeevani

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अगले ओलंपिक में मिल सकते हैं और ओलंपियन

तीरंदाजी की शानदार प्लेयर रही पूर्णिमा महतो और झानू हांसदा कहती हैं कि स्कूली लेवल से खिलाड़ियों को तैयार करने पर काम करना होगा. ओलंपिक में शामिल खेलों को देखते हुए उसी हिसाब से ट्रेनिंग फैसिलिटीज औऱ अन्य सुविधाएं मुहैया करानी होंगी. पूर्णिमा ने भरोसा जताते हुए कहा कि झारखंड में सरकार ने कुछ एक्सिलेंसी सेंटर तैयार किये हैं. होटवार में और दूसरे खेल केंद्रों के जरिये छोटे छोटे बच्चों के उपर ध्यान दिये जाने की पहल हुई है. इससे 2024 ना सही, 2028 तक कुछ ओलंपियन झाऱखंड से तैयार होकर सामने आयेंगे.

झानू हांसदा के मुताबिक खेल में बेहतर कैरियर भी मायने रखता है. टाटा एकेडमी से जुड़े खिलाड़ियों को 5-5 सालों तक लगातार स्पेशल ट्रेनिंग दी जाती है. इसके बाद यहां से निकलने वाले प्लेयरों को सेना, पुलिस, रेलवे और दूसरे जगहों पर अच्छी नौकरी भी मिल जाती है. ऐसे में खिलाड़ी. कोचों को बेहतर भविष्य का रास्ता मिलने पर और भी खिलाड़ी ओलंपिक तक खेलने के लिये प्रयास करेंगे.

ट्रेनिंग क्वालिटी से रिजल्ट

द्रोणाचार्य अवार्डी धर्मेंद्र तिवारी के मुताबिक टाटा आर्चरी एकेडमी में लोकल और विदेशी ट्रेनर शामिल रहते हैं. इसी तरीके से राज्य में और भी एकेडमी को प्रोत्साहित करना होगा. झारखंड ओलंपिक संघ के मधुकांत पाठक कहते हैं कि राज्य में शानदार इंफ्रास्ट्रक्चर खेलों के लिहाज से तैयार किये गये हैं. पर इनका उपयोग खिलाड़ियों, कोचों और खेल संघों के लिये आसान नहीं. आर्चरी के लिये टाटा एकेडमी एक आदर्श उदाहरण है. हॉकी में यहां खिलाड़ियों में जन्मजात स्किल देखने को मिलता है. यही वजह है कि इन खेलों से प्लेयर ओलंपिक तक जा रहे हैं. खिलाड़ियों को शुरूआती दौर से प्रॉपर ट्रेनिंग मिलने पर झारखंड ओलंपिक में और शानदार उपलब्धि हासिल कर सकता है.

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