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जानिये बॉलीवुड के फिल्म डायरेक्टर प्रकाश झा की किन दो फिल्मों का मेन फोकस रही है रांची

  • जन्मदिन पर विशेष

Naveen Sharma

मैंने फिल्म निर्माता व निर्देशक प्रकाश झा पहली फिल्मv हिप हिप हूर्रे देखी थी. तभी से वो मेरे पसंदीदा डायरेक्टर में शुमार हो गये थे. इस फिल्मप की एक खास बात यह भी थी कि इसकी शूटिंग रांची के विकास विद्यालय में हुई थी. इनकी दो चार फिल्मोंू को छोड़ कर लगभग सारी फिल्में देखी हैं.

सैनिक स्कूल तिलैया में की पढ़ाई

प्रकाश झा का जन्म 27 फ़रवरी 1952 को चंपारण बिहार में हुआ था. उन्होंने ने अपनी शुरुआती पढ़ाई कोडरमा स्थित सैनिक स्कूल तिलैया से पूरी की है. उसके बाद आगे की पढ़ाई केंद्रीय विद्यालय बोकारो से सम्पूर्ण की. उन्होंने बीएससी ऑनर्स में स्नातक की पढ़ाई दिल्ली यूनिवर्सिटी से की है. वह बचपन से एक पेंटर बनने की चाहत रखते थे. लेकिन मुंबई आने के बाद जब उन्हें फिल्म धर्म की शूटिंग देखने का अवसर मिला तभी से उन्होंने ठान लिया कि वह भी एक फ़िल्मकार बनेगें. इसके लिए साल 1973 में फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीयूट में दाखिला ले लिया.

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अभिनेत्री दीप्ति नवल शादी की, फिर अलग हुए

प्रकाश झा अभिनेत्री दीप्ति नवल के प्रेम में पड़े. इन्होंने आपस में शादी भी कर ली लेकिन बाद में तलाक हो गया. ईनकी एक गोद ली हुई बेटी है-दिशा.

शार्ट फिल्म बैन हुई, नेशनल अवार्ड भी मिला

प्रकाश झा करियर की शुरुआत डॉक्यूमेंट्री अंदर द ब्लू से की. उसके बाद उन्होंने आठ वर्षो के लम्बे अंतराल में कई डॉक्युमेंट्रिज का निर्माण किया. इस दौरान उन्होंने बिहार के दंगों के उपर एक शार्ट फिल्म बनाई, जिसे रिलीज होने के कुछ दिन बाद ही बैन कर दिया गया, लेकिन प्रकाश को उस शार्ट फिल्म के नेशनल अवार्ड से सम्मानित किया गया था.

दामुल

दामुल साहित्यकार शैवाल की कहानी पर बनी उनकी सबसे विचारोत्तेजक फिल्मै है. इसमें बिहार के सामंती व्यवस्था वाले समाज और राजनीतिक तिकड़मबाज़ी का बहुत बढ़िया फिल्मांकन है.

मृत्युदंड

 

मुझे इनकी फिल्मों् में सबसे बेहतरीन फिल्मड मृत्युदंड लगी. माधुरी और अयूब खान लीड रोल में थे. इसके कुछ गीत भी अच्छे थे.

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सच्ची घटना से प्रेरित फिल्म गंगाजल

बिहार के ही बैकड्राप पर बनी अजय देवगन की गंगाजल देखी थी. यह तेजाब फेंक कर लोगों को अंधा करने की सच्ची घटना पर आधारित यह फिल्म व्यवसायिक रूप से भी काफी सफल रही थी.अजय देवगन के साथ प्रकाश जी की अंडरस्टैंडिंग काफी अच्छी बनी. इस कारण इन्होंने कई फिल्में साथ में की जैसे अपहरण, राजनीति, दिल क्या करे और सत्याग्रह आदि. ये सारी फिल्में विशुद्ध रूप से व्यवसायिक फिल्में थी इसके बावजूद इनमें समसामयिक समस्याओं को उठाया गया था.

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बिहार में किडनैपिंग के धंधे को उजागर करती अपहरण

अजय देवगन को लीड रोल में लेकर बनी अपहरण भी जबर्दस्त फिल्मि थी. यह बिहार में किडनैपिंग के एक धंधे के रूप लेने और इसके राजनीतिक कनेक्शन की पोल खोलनेवाली बोल्ड फिल्मो थी. नाना पाटेकर का किरदार बिहार के नामी डॉन से प्रेरित था.

कोचिंग के धंधे की पोल खोलती आरक्षण

इसी तरह से आरक्षण में उन्होंने कोचिंग के धंधे की पोल खोली थी. इसमें अमिताभ बच्चन, अजय देवगन और मनोज वाजपेयी जैसे अभिनेताओं में जबर्दस्त मुकाबला देखने को मिला था. इनकी सत्याग्रह और जय गंगाजल फिल्में् भी देखीं हैं. जय गंगाजल में तो प्रकाश जी ने महत्वपूर्ण किरदार भी निभाया था.

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महाभारत से प्रेरित राजनीति

राजनीति फिल्मे में हम महाकाव्य महाभारत का प्रभाव साफ देख सकते हैं.अजय देवगन, मनोज वाजपेयी व रणबीर कपूर सहित आप कई पात्रों को चिह्नित कर सकते हैं कि कौन कर्ण जैसा किरदार है, कौन अर्जुन और कौन भीष्म से प्रेरित.

रांची में ही हुई थी परीक्षा की शूटिंग, कहानी में थे झोल

प्रकाश झा ने कुछ वर्ष पूर्व फिल्म परीक्षा की शूटिंग रांची में ही की थी. इस फिल्म की शूटिंग जब रांची के गवर्नमेंट गर्ल्स हाई स्कूल में चल रही थी तो मैं शूटिंग देखने गया था. कोर्ट रूम का सीन फिल्माया जा रहा था. निर्माता व निर्देशक प्रकाश झा से भी मुलाकात हुई थी. परीक्षा फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी इसकी लचर कहानी है. कहानी का अंत भी आनन फानन में किया गया है. कुल मिलाकर कहानी पर ढंग से काम नहीं हुआ है ना ही रिसर्च. इसलिए कहानी वास्तविक ना लग कर बनावटी ज्यादा लगती है.
हालांकि आदिल हुसैन का अभिनय ठीक है लेकिन कहानी का परिवेश वास्तविक नहीं लगता है. बुलबुल बने शुभम का अभिनय भी ठीक है.

फिल्म में झारखंड के कई कलाकारों ने काम किया है उनमें एक डॉ सीमा सिंह भी हैं जिन्होंने स्कूल की प्रिंसिपल का किरदार निभाया है. वहीं अजय मलकाणी भी बच्चे को बस्ती में पढ़ाने वाले शिक्षक की भूमिका में हैं. राकेश रमण भी बर्तन कारखाने के मैनेजर के रोल में हैं. इन जान पहचान के लोगों को देख कर अच्छा लगा.

भीड़ जुटाने और उसे फिल्माने में माहिर

प्रकाश झा की फिल्में इस लिए भी ज्यादा पसंद आतीं हैं क्योंकि बिहार (अभी झारखंड ) का होने की वजह से उनकी फिल्मों के विषय और भाषा से अपनापन लगता है. इनकी कई फिल्मों में विषयों की वजह से भीड़ की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है. वे भीड़ जुटाकर उस फिल्म से लोगों को कनेक्ट कर फिल्मह को लोकप्रिय बनाने की राह आसान करते हैं. आज 70 वर्ष के होने के बाद भी वो जिस उत्साह और एनर्जी के साथ फिल्मन निर्माण में जुटे हैं वो काबिले तारीफ है. वे आधा दर्जन से अधिक बार विभिन्न श्रेणियों में राष्ट्रीय फिल्मज पुरस्कार हासिल कर चुके हैं. अभी हाल में प्रकाश झा ने OTT पर वेब सीरीज आश्रम बनायी है. बॉबी देओल इसमें लीड रोल में हैं. यह वेब सीरीज काफी चली थी.

Poster of the movie Raajneeti

संयुक्त बिहार के पहले ऐसे फिल्म निर्देशक हैं जिन्होंने हिंदी सिनेमा में अपनी पुख्ता पहचान बनाई और इस इलाके के लोगों को हौसला दिया कि आपमें प्रतिभा हो तो आप कितनी भी छोटी जगह से आते हों ये बात मायने नहीं रखती है. यह भी एक कारण है जिसकी वजह से वे इतने अच्छे लगते हैं.

 

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