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जानिये लता से ओपी नैय्यर का क्या हुआ था पंगा, उनकी बहन आशा को ही खड़ा कर दिया मुकाबले में

ओंकार प्रसाद नैय्यर के जन्मदिन पर विशेष

Naveen Sharma

Ranchi : हिंदी सिनेमा के सबसे चर्चित म्यूजिक डायरेक्टर में शुमार ओपी नैय्यर के व्यक्तित्व की एक सबसे खास बात है उनका विद्रोही और जिद्दी होना. नैय्यर अपनी जिद्द के आगे अपने नफा-नुकसान की भी फिक्र नहीं करते थे.

अपने इसी स्वभाव की वजह से वे लता मंगेशकर जैसी ऑल टाइम ग्रेट गायिका से कभी न गवाने की जिद पर आखिर तक डटे रहे. लेखक पराग डिमरी ने ओपी नैय्यर की जीवनी दुनिया से निराला हूं , जादूगर मतवाला हूं में इस बारे में विस्तार से जानकारी दी है.

लता और ओपी नैय्यर के बीच पंगे के पीछे भी एक किस्सा है. हुआ यूं कि ओपी नैय्यर की पहली फिल्म ‘आसमान’ के आठ गाने थे. इनमें से एक गाना सहनायिका पर फिल्माया जाना था.

नैय्यर यह गाना लता से गवाना चाहते थे. लता उस समय की सबसे टॉप की गायिका थीं. लता ने लीड हीरोइन की जगह सहनायिका के लिए गाना अपना अपमान समझा और मना कर दिया. इस पर ओपी ने जब से पी संग नैन लगे गीत राजकुमारी से गवा लिया.

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इसके बाद एक और घटना भी घटी जिसने इन दो दिग्गजों के बीच की दरार को और चौड़ा कर दिया. ओपी के संगीत से सजी फिल्मों के गीत सुपरहिट होने लगे तो कई निर्माताओं ने अपनी फिल्मों के लिए पहले से तय म्यूजिक डायरेक्टरों को हटा कर ओपी को अपनी फिल्मों में संगीत देने के लिए साइन करना शुरू कर दिया.

ऐसी ही एक मामले में एक निर्माता ने संगीत निर्देशक रोशन को हटा कर ओपी को साइन कर लिया. रोशन इस फिल्म के कुछ गीत लता मंगेशकर के साथ रिकार्ड कर चुके थे. लता ने रोशन को हटाये जाने का विरोध करते हुए ओपी के साथ गाने से इन्कार कर दिया. बस यही बात नैय्यर साहब को चुभ गई और उन्होंने लता से कभी भी ना गवने के ठान ली.

इसके बाद कई फिल्म निर्माताओं ने ओपी को पैसों का लालच देकर कहा था कि वे लता से गवाये लेकिन ओपी बहुत जिद्दी थे वे कभी राजी नहीं हुए. वे साफ कह देते कि लता से गवाना हो तो आप कोई और म्यूजिक डायरेक्टर तलाश लें.

एक लाख रुपये का लता मंगेशकर पुरस्कार लेने से भी किया इन्कार

नब्बे के दशक की शुरुआत में ओपी अपने बुरे दौर में पहुंच गये थे. उनकी अपने परिवार के लोगों से नहीं पटी तो घर, गाड़ी और बैंक बैलेंस छोड़ कर अपने एक प्रशंसक के घर पर रहने लगे थे. ऐसे बुरे वक्त में भी वे अपने स्वाभिमान की रक्षा करने से नहीं चुके.

हुआ यू कि मध्य प्रदेश सरकार ने ओपी को लता मंगेशकर सम्मान के लिए चुना था. जब उनसे स्वीकृति मांगी गयी तो उन्होंने यह कहते हुए इन्कार कर दिया कि मैं लता के नाम पर कोई सम्मान इसलिए नहीं लूंगा क्योंकि मैंने कभी लता के साथ काम नहीं किया है. दूसरी वजह बतायी कि किसी जिंदा व्यक्ति के नाम पर सम्मान लेना उचित नहीं है.

इसके साथ ही संगीतकार को गीतकार के नाम पर रखा गया अवार्ड कैसे दिया जा सकता है. यहां गौर करनेवाली बात यह है कि ओपी ने जब यह पुरस्कार लेने से मना किया तो उन दिनों काम ना के बराबर था, उनकी माली हालत बहुत खराब थी.

इसके बावजूद ओपी ने एक लाख रुपये की इनामी राशि वाले इस पुरस्कार को लेने से मना कर दिया. उस दौर में एक लाख रुपये की कीमत बहुत ज्यादा होती थी.

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ओपी की आशा भोसले से अनबन

ओपी ने लता के विकल्प के रूप में उनकी बहन आशा भोसले को ही खड़ा कर दिया था. आशा की गायकी में निखार ओपी के संगीत निर्देशन में आया था. ओपी के म्यूजिक डायरेक्शन का कमाल था कि आशा की आवाज में एक से बढ़ कर एक हिट गाने आये.

लता के बाद आशा नंबर दो की गायिका बन गयी थीं. कुछ वर्षों के बाद ओपी की आशा भोसले से अनबन हो गयी. इसका नतीजा था कि 1974 में दोनों ने मिलकर साथ काम न करने का फैसला किया. बाद में आरडी बर्मन के साथ भी जोड़ी बनी तो आशा खासकर कैबरे और मादक अंदाज के गीतों के लिए तो संगीत निर्देशकों की पहली पसंद बन गयी थीं.

12 रुपये से एक लाख रुपये तक का सफर

ओपी ने उस वक्त के लोकप्रिय गायक सीएच आत्मा के लिए गीत बनाया, जिसके बोल थे ‘प्रीतम आन मिलो’. ‘प्रीतम आन मिलो’ के साथ ओपी नैय्यर भी मकबूल हुए लेकिन इसका मेहनताना मिला था सिर्फ बारह रुपये. इन बारह रुपयों से शुरू हुआ सिलसिला बाद में लाख रुपये प्रति फिल्म तक भी पहुंचा. ओपी नैय्यर अपने जमाने के सबसे महंगे संगीतकार थे.

हीरो बनने के लिए आये थे बंबई

ओपी संगीतकार बनने के लिए नहीं बल्कि हीरो बनने के लिए बंबई आये थे. हीरो बनने के लिए उनके पास सिर्फ शक्ल थी. ये बात उन्हें जल्द ही समझ में आ गयी कि सिर्फ शक्ल की बदौलत हीरोगिरी नहीं चलेगी.हीरो छोड़ कुछ दिन गायक बनने की भी कोशिश की. एक दिन घूमते-फिरते उनकी कृष्ण केवल से मुलाकात हो गई. कृष्ण केवल उन दिनों ‘कनीज (1949)’ बनाने की सोच रहे थे और उन्हें इस फिल्म के लिए कंपोजर की जरूरत थी. कनीज में नैय्यर साहब ने बैकग्राउंड स्कोर दिया.

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आसमान’ और ‘छम छमा छम’ से शुरू हुआ म्यूजिक डायरेक्शन

1952 में आई फिल्मों ‘आसमान’ और ‘छम छमा छम’ में उन्होंने पहली बार स्वतंत्र रूप से संगीत दिया था. बतौर संगीतकार ‘आसमान’ नैय्यर की पहली फिल्म कही जाती है. हालांकि फिल्में कुछ कमाल नहीं कर पाईं लेकिन इनके जरिए फिल्म जगत में नैय्यर की जान-पहचान का दायरा जरूर बड़ा हो गया.

ओपी नैय्यर की अच्छी परिचितों में गीता दत्त भी शामिल थीं. उन्होंने इस बुरे वक्त में उन्हें गुरुदत्त से मिलने की सलाह दी. इस बात का अंदाजा शायद नैय्यर को भी नहीं होगा कि यह मुलाकात उनको क्या से क्या बनाने जा रही है.

गुरुदत्त ने उन्हें ‘आर-पार (1954)’ का संगीत रचने की जिम्मेदारी दी. उनकी अगली फिल्म ‘मिस्टर एंड मिसेस 55 (1955)’ का संगीत भी ओपी नैय्यर ने दिया था. इन दोनों फिल्मों की कामयाबी ने उन्हें हिंदी फिल्म जगत में स्थापित कर दिया.

इसके बाद जो हुआ वो कहानी सब जानते हैं. इसके बाद ओपी ने ‘तुमसा नहीं देखा,’ ‘बाप रे बाप,’ ‘हावड़ा ब्रिज,’ ‘सीआईडी,’ ‘फागुन’ में यादगार गीतों की सौगात दी. ‘सीआईडी’ में ओपी नैय्यर ने आशा भोसले को पहली बार मौका दिया और इस जोड़ी ने बाद में कई हिट गाने दिए.

शास्त्रीय संगीत की शिक्षा नहीं फिर भी रचा लाजवाब संगीत

यह भी आश्चर्यजनक लेकिन सत्य है कि संगीतकार’ ओपी नैय्यर ने शास्त्रीय संगीत की शिक्षा नहीं ली थी. उस दौर में लोगों को यकीन दिलाना मुश्किल था कि एक इंसान जिसने न स्कूल की पढ़ाई ढंग से की, न संगीत की वह ‘तू है मेरा प्रेम देवता (कल्पना)’ जैसे गीत को पूरी समझ के साथ कैसे कंपोज कर सकता है. इस गाने के बोल शुद्ध हिंदी में है और धुन शास्त्रीय संगीत पर है.

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तालियां, सीटी और घोड़ों की टापों से संगीत

कुछ इसे अजीब बात मानेंगे तो कुछ करिश्मा लेकिन संगीत के अपने सीमित ज्ञान के सहारे ही ओपी नैय्यर ने अपनी तिलिस्मी धुनें रची हैं. कुछ गाने जैसे ‘मांग के साथ तुम्हारा’ या ‘जरा हौले हौले चलो मोरे साजना’ सुनते हुए जो टक-टुक टक-टुक सी घोड़े की टापों की आवाज सुनाई देती है, वह ओपी नैय्यर की पहचान है.

ऐसे ही नया दौर के मशहूर गाने ‘उड़े जब जब जुल्फें तेरी’ में तालियों का इस्तेमाल गाने को शानदार शुरुआत देता है. मुखड़े और अंतरे के बीच सितार का सोलो प्रयोग सिर्फ नैय्यर के संगीत में मिलेगा. वे तालियां, सीटी और घोड़ों की टापों से संगीत निकालते थे.

1950 में आकाशवाणी ने इनके गानों पर प्रतिबंध लगाया था

ओपी नैय्यर से जुड़ी एक मजेदार बात है कि संगीत के साथ उनकी ‘प्रयोगधर्मिता’ भले ही श्रोताओं को लुभाती हो लेकिन 1950 में आकाशवाणी ने उनके गानों पर प्रतिबंध लगा दिया था. तर्क यह था कि इन गानों को संगीत की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता.

कॉमेडियन के लिए पूरे तीन मिनट का गाने बनाये, कई ट्रेंड सेट किये

नैय्यर की प्रयोगधर्मिता सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं थी. वे कई मामलों में ट्रेंड सेटर कहे जा सकते हैं. जैसे कॉमेडियन के लिए पूरे तीन मिनट का गाना बनाना, अभिनेत्रियों से संगीत के हिसाब से अदाएं करवाना वगैरह. ओपी नैय्यर ने हमेशा मझोले फिल्मकारों के साथ काम किया. फिर भी वे अपने दौर के सबसे महंगे संगीतकार रहे. बीआर चोपड़ा की ‘नया दौर’ इकलौती ऐसी फिल्म है जिसमें उन्होंने किसी बड़े बैनर तले काम किया.

1949 से लेकर 1974 के बीच सिर्फ 1961 ही एक ऐसा साल था जब उनकी कोई फिल्म नहीं आई. हालांकि 1974 में आशा भोंसले का साथ छूटने बाद नैय्यर का करियर ढलान पर आ गया. उन्होंने दिलराज कौर, वाणी जयराम, कविता कृष्णमूर्ति सबसे गवाया, पर गीतों में ‘वो’ बात नहीं आ पाई. नब्बे के दशक में भी दो-तीन फिल्में आईं, मगर उनका भी हश्र वही रहा.

सुहाग रात को ही पत्नी से कहा मेरे प्रेम के किस्से तुम तक पहुंचेंगे

शादी की पहली ही रात पत्नी सरोज मोहिनी को ये बता दिया कि उनके प्रेम प्रसंग के किस्से सुनकर अगर वो बाद में कलह करने वाली हैं तो तुरंत घर छोड़कर जा सकती हैं. नैय्यर का स्वभाव, उनकी साफगोई उनके पारिवारिक जीवन पर भी भारी पड़ा.

जिसने पिता का अनुशासन नहीं माना वो जिंदगी का क्या मानता. शादी की पहली ही रात पत्नी सरोज मोहिनी को ये बता दिया कि उनके प्रेम प्रसंग के किस्से सुनकर अगर वे बाद में कलह करने वाली हैं तो तुरंत घर छोड़कर जा सकती हैं.

नैय्यर ने साफ-साफ कहा कि जो किस्से उन तक पहुंचेंगे उनमें से ज्यादातर सच होंगे. उस समय तो सरोज मोहिनी ने बड़प्पन दिखाते हुए हामी भर दी. लेकिन आम जीवन में ऐसा होता नहीं है सो एक दिन बच्चों सहित उन्हें छोड़कर चली गईं.

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ज्योतिष और होम्योपैथी की भी जानकारी थी

ओपी नैय्यर को संगीत से इतर ज्योतिष और होम्योपैथी की भी जानकारी थी. कहते हैं कि रिटायरमेंट के बाद उनके प्रशंसक मरीज बनकर उनसे मिलने आते थे.

जो विद्रोही स्वभाव, जिद और अक्खड़पन नैय्यर को बचपन में ही मिल गया था वह आखिरी वक्त तक उनके साथ रहा. 28 जनवरी 2007 को उनकी मृत्यु हुई थी लेकिन जाते-जाते भी उन्होंने अपनी जिद नहीं छोड़ी. अंत्येष्टि में परिवार का कोई व्यक्ति शामिल न हो, यही आखिरी जिद थी. जो उनके परिवार वालों ने ससम्मान पूरी की.

ओपी के यादगार नगमें

  • ठंडी हवा काली घटा- फिल्म- मिस्टर एंड मिसेज 55 (1955)
  • ले के पहला पहला प्यार फिल्म- C.I.D. (1956)
  • उड़ें जब जब जुल्फें तेरी – फिल्म- नया दौर (1957)
  • आइये मेहरबां, बैठिये जानेजां – फिल्म- हावड़ा ब्रिज (1958)
  • एक परदेशी मेरा दिल ले गया -फिल्म- फागुन (1958)
  • बाबू जी धीरे चलना प्यार में जरा संभलना -फिल्म- आर-पार (1954)
  • ये है रेशमी जुल्फों का अंधेरा -फिल्म- मेरे सनम (1965)
  • वो हसीन दर्द दे दो, जिसे मैं गले लगा लूं – फिल्म- हमसाया (1968)
  • आओ हुजूर तुमको सितारों में ले चलूं – किस्मत (1968) आशा भोसले
  • चेहरे से जरा आंचल जो आप ने सरकाया- एक बार मुस्कुरा दो (1972) आशा भोसले-मुकेश
  • चैन से हम को कभी – प्राण जाये पर वचन ना जाये (1972) आशा भोसले
  • सुन मेरे सजना- निश्चय (1922), अमित कुमार, कविता कृष्णमूर्ति
  • किसी हसीन यार की तलाश है – निश्चय (1922), अमित कुमार, कविता कृष्णमूर्ति

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