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जानिए उस स्वतंत्रता सेनानी को जिन्होंने मुंडारी में लिखी गांधीजी की जीवनी

स्वतंत्रता सेनानी और राज्यसभा सदस्य भइया राम मुंडा की 103 वीं जयंती (11 जनवरी) पर विशेष

Ranchi : स्वतंत्रता सेनानी, राजनीतिज्ञ और समाजसेवी भइया राम मुंडा की 103 वीं जयंती सोमवार (11 जनवरी) को है. हर साल की तरह इस वर्ष भी उनके खूंटी स्थित गांव सेल्दा में बड़ी संख्या में ग्रामीण जुटेंगे. इस दौरान स्व भइया राम मुंडा के नाम के पत्थर की धुलाई एवं हल्दी, धूप धूवन से पूजा होगी.

कौन थे भइया राम मुंडा

खूंटी के सुदूर गांव सेल्दा के एक साधारण मुंडा परिवार में जन्मे असाधारण व्यक्ति, जिन्होंने तमाम कठिनाइयों के बावजूद राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनायी. स्व भइया राम मुंडा का जन्म 11 जनवरी 1918 को हुआ था. इनके पिता गोपाल मुंडा का निधन तभी हो गया था जब ये (भइया राम मुंडा) छोटे थे.

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पिता के निधन के बाद इनकी शिक्षा की जिम्मेदारी माता चांद देवी ने लिया. इनकी माता ने ही इन्हें पढ़ने के लिए प्रेरित किया. भईया राम मुंडा पढ़ने में मेधावी थे. 1931 में मिडिल स्कूल की परीक्षा में रांची जिले में चौथा स्थान प्राप्त किया. 1945 में अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत की. 1950-52 में रांची जिले कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष बने. इसके बाद 1969 मे कांग्रेस प्रत्याशी चयन समिति के सदस्य बने.

आकाशवाणी रांची में भी आजीवन सलाहकार समिति के सदस्य बने रहे. 1967 में तमाड़ विधानसभा के विधायक, बने. फिर 1972-78 तक राज्यसभा के सदस्य रहे. 1972 में जब छोटानागपुर खादी ग्राम उद्योग संस्थान की स्थापना हुई तो इन्हें उसका अध्यक्ष पद को संभालने का मौका मिला. ये आजीवन खादी ग्रामोद्योग संस्थान के अध्यक्ष रहे. ‌

जीवन के संघर्ष ने इन्हें शिक्षा के महत्व से परिचित करा दिया था. मां ने शुरुआती दौर में ही शिक्षा के प्रति जो रूचि जगायी थी उसकी वजह से इन्होंने अपने जीवन में महिलाओं की शिक्षा पर और खासकर आदिवासी महिलाओं की शिक्षा पर काम किया. जनजातीय साहित्य के क्षेत्र में भी इनका योगदान रहा.

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इनकी मुंडारी लोक कथाओं का संकलन 1961 में ‘दड़ा जमा कन होड़ो कहानी को’ के नाम से प्रकाशित हुआ. इस प्रकाशन की वजह से इनका नाम वर्ल्डकैट आईडेंटिटीज में भी दर्ज है. इस कथा का प्रसारण आकाशवाणी द्वारा किया जाता था और स्वर डॉ रामदयाल मुंडा दिया करते थे.

उन्होंने मुंडारी भाषा में गांधी की जीवनी लिखी. 1945 में डॉ राजेंद्र प्रसाद ने बिहार राज्य के आदिवासियों एवं पिछड़ी जाति के उत्थान के लिए आदिम जाति सेवा मंडल की स्थापना की. इस संस्था के अंतर्गत 500 स्कूलों का संचालन किया जाता था. इस संस्था में मुख्य सलाहकार के तौर पर भइया राम मुंडा का योगदान रहा.

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