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जानिए, हेमंत और रामेश्वर के दिल्ली प्रवास से जुड़ी अंदर की खबर

Gyan Ranjan

Ranchi: मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन दिल्ली से रांची लौट आये हैं. उनके पांच दिनों के दिल्ली प्रवास की वजहें क्या थीं और इसका हासिल क्या है, इसे लेकर सियासत के गलियारे में बहुतेरे चर्चे हैं. कभी इस दौरे का मकसद झारखंड कैबिनेट के खाली पड़े 12वें बर्थ का मसला सुलझाना बताया गया तो कभी यह चर्चा उड़ी कि बोर्ड-निगमों के बंटवारे का फॉर्मूला तय करने पर कांग्रेस के आला के साथ उनकी बैठक होनी है.

ऐसा कुछ भी हुआ नहीं. इन पांच दिनों में ले-देकर सिर्फ कांग्रेस के एक लीडर के. सी. वेणुगोपाल से हेमंत सोरेन की मुलाकात की तस्वीर और खबर सामने आयी. कयास लगाये गये कि सोनिया-राहुल, मोदी-शाह से सीएम की मुलाकात हो सकती है, लेकिन न तो पूर्व से ऐसा कोई कार्यक्रम निर्धारित था और न ही हेमंत सोरेन के पांच दिनों के प्रवास में ऐसी किसी बात-मुलाकात की खबर सामने आयी.

सो, लाख टके का सवाल यह उठ रहा है कि पांच दिनों तक सीएम हेमंत सोरेन और वित्त मंत्री सह कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष रामेश्वर उरांव दिल्ली में क्या करते रहे?

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हेमंत सोरेन का डिप्लोमैटिक जवाब

दिल्ली में एक रिपोर्टर ने सीएम हेमंत सोरेन से उनके दौरे के उद्देश्य में बारे में पूछा था तो उन्होंने इसका बड़ा ही कैजुअल लेकिन डिप्लोमेटिक उत्तर दिया था- “दिल्ली मेरे लिए घर की तरह है…लंबे समय से आता रहा हूं…यहां कई लोग हैं हमारे…यहां आना-जाना लगा ही रहता है…किसी ऐसे मकसद से नहीं आया हूं कि मीडिया को जानकारी दी जाये.”

पर, सियासत में कोई नेता जो बात कहता है, अक्सर उसका अर्थ हू-ब-हू वैसा नहीं होता. इसलिए दिल्ली प्रवास के उद्देश्य पर हेमंत सोरेन के कैजुअल जवाब को सियासी गलियारे में ‘कैजुअली’ नहीं लिया जा रहा.

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शराब कारोबार पर कांग्रेस-झामुमो के बीच इफ-बट्स

तमाम चर्चाओं के बीच एक जोरदार चर्चा यह है कि हाल में झारखंड कैबिनेट द्वारा राज्य में शराब के थोक कारोबार में प्राइवेट पार्टी को एंट्री देने का जो फैसला लिया गया है, उसे लेकर कांग्रेस और झामुमो दोनों पार्टियों के बीच कुछ ‘इफ-बट्स’ हैं. मुख्यमंत्री और वित्त मंत्री के दिल्ली प्रवास का कनेक्शन इसी मसले से जोड़ा जा रहा है.

शराब के थोक कारोबार को बीवरेज कॉरपोरेशन से हटाकर प्राइवेट पार्टी को सौंपने के प्रस्ताव से जुड़ी फाइल पर वित्त विभाग ने कुछ शर्तें रखी थीं. वित्त विभाग की नोटिंग में कहा गया था कि प्राइवेट पार्टी को शराब का थोक कारोबार सौंपने का निर्णय लिया जाता है तो इसमें इस बात की जिम्मेदारी भी तय हो कि इस नयी व्यवस्था से राजस्व की हानि नहीं होगी.

लेकिन, इस शर्त को सिद्धांततः स्वीकार नहीं किया गया और प्राइवेट पार्टीज को एंट्री देने का निर्णय कैबिनेट ने पारित कर दिया.

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चर्चा है कि नहीं सुलझा मसला

शराब के कारोबार में प्राइवेट पार्टी आयेगी, तो जाहिर है इसके लिए ऊंची बोली लगेगी. प्राइवेट पार्टी की एंट्री का मसला सिर्फ सरकारी राजस्व से जुड़ा नहीं है, बल्कि ऐसी व्यवस्था में कई पक्षों का हित-अहित, लाभ-हानि भी ‘इन्वॉल्व’ रहता है.

राज्य सरकार में वित्त विभाग कांग्रेस के हिस्से में है, जबकि सरकार का नेतृत्व झामुमो करता है. सरकार चलाने के मसले पर दोनों पार्टियां भले एक कॉमन गांठ से बंधी हैं, लेकिन दोनों के अपने-अपने और अलग-अलग इंटरेस्ट भी हैं.

अंतःपुर की चर्चाओं पर यकीन करें तो यह प्रकरण दोनों दलों के इंटरेस्ट के इश्यू को डिजॉल्व करने की कोशिशों से जुड़ा है. बताया जा रहा है कि पांच दिवसीय दिल्ली प्रवास के बावजूद मसला अभी सुलझा नहीं है.

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