Opinion

जानिये, केंद्र सरकार राहत पैकेज के नाम पर कैसे दूरगामी और मनभावन सपने दिखा रही है

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Faisal Anurag

बीस लाख करोड़ के राहत पैकेज के बावजूद मजदूरों और खेतीहर मजदूरों की समस्याओं के निदान को ले कर भरोसे की कमी बनी हुई है. वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने किसानों के लिए कर्ज से राहत की घोषणा की है. राहत के इस लाभ से बंटाइदारों के वंचित रह जाने की संभावना बनी हुई है.

लोकसभा चुनाव के समय से किसानों को दी जाने वाली राशि उन किसानों तक ही गयी है, जो जमीन के मालिक हैं. लेकिन जमीन पर वास्तविक श्रम करने वाले उससे वंचित ही रह गए हैं.

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 गांव लौट रहे मजूदरों को दो महीने तक राशन दने की घोषणा की गयी है,  इसकी जरूरत है. लेकिन इन कदमों के बावजूद ठहराव की शिकार इकोनोमी में गति शायद ही आए. अब तक के तमाम एलान बाजार में मांग पैदा करने की उम्मीद नहीं पैदा कर पाए हैं.

सरकार का पूरा नजरिया लिक्विडिटी और कर्ज का सहारा देना है. लेकिन भारत की इकोनोमी इससे कहीं ज्यादा की अपेक्षा कर रही है. जिस तरह शेयर बाजार ने इन पैकेज को ले कर प्रतिक्रिया दी है, उससे स्पष्ट है कि  सरकार को अभी बहुत कुछ करने की जरूरत है. खास कर ग्रामीण भारत के लिए और लोगों की जेब तक नकदी पहुंचाने के लिए.

जानकारों का फोकस एरिया भी यही है. संकट को गहरायी से समझने की जरूरत है. इसके बगैर राह नहीं निकल सकती है. सरकार की घोषणाओं को लेकर द टेलिग्राफ ने एक शब्द का अर्थपूर्ण बैनर लिखा है क्रम्बस. इसका हिंदी अर्थ है टुकड़ा. भारतीय इकोनोमी और सरकार पर एक गंभीर टिप्पणी इसमें अंतरनिहित है.

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जयति घोष और प्रभात पटनायक जैसे अर्थशास्त्रियों ने हर्ष मंदर के साथ मिल कर एक लेख द हिंदू में लिखा है. इस लेख में ग्रामीण भारत की तकलीफों का बयान करते हुए इकोनोमी के संकट को समझने का प्रयास किया गया है.

इसी अखबार के लिए लिखे गए एक लेख में टी नागराज ने भी आमदनी बढ़ाने और रोजगार की वापसी का सुझाव दिया है. मनरेगा के माध्यम से प्रवासियों को राजगार देने की बात तो वित्तमंत्री ने की है, बावजूद इसके ग्रामीण भारत के ठहराव को गति में लाने के लिए अभी और बड़े कदम की जरूरत बतायी गयी है.

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रिचर्ड महापात्रा डाउन द अर्थ के संपादक हैं. उन्होने अपने लेख में बताया है, भारत का लगभग 87 प्रतिशत कार्यबल अनौपचारिक क्षेत्र में है. हमारे द्वारा की गयी गणना से पता चला कि कुछ 125 शहरों/कस्बों से प्रवासन की सूचना आई है. सैकड़ों किलोमीटर पैदल चलकर और गाड़ियों में सामान की तरह भरकर अपने घरों तक पहुंचे ये लोग एक अनिश्चित भविष्य का सामना करने को मजबूर हैं. वे जीवित रहने के लिए क्या करेंगे?

यूनएनडीपी के प्रशासक अकिम स्टेनर ने तो कोरोना को सिर्फ एक बीमारी से ज्यादा बताते हुए कहा है यह महामारी सिर्फ एक स्वास्थ्य संकट नहीं है. और इसके प्रतिकूल प्रभाव विश्व के बड़े हिस्से में दिखेंगे. हमने पिछले दो दशकों में जो भी प्रगति की है, यह बीमारी उसे मिट्टी में मिलाकर रख सकती है. हम एक पूरी पीढ़ी को खो सकते हैं. अगर हम मरीजों को मरने से बचा लें फिर भी मानवाधिकारों, रोजगार के अवसरों एवं मानवीय गरिमा को भारी क्षति पहुंचने का खतरा है.

किसानों ओर कृषि ढांचे को मजबूत करने की घोषणा का महत्वपूर्ण पहलू यह है कि उसके लिए 1 लाख करोड़ की राशि नबार्ड को बाजार से जुटाने को कहा गया है. यानी सरकारी सहायता इसमें सिर्फ घोषणा तक ही सीमित है. आवश्यक वस्तु अधिनियम के संशोधन से भी किसान से ज्यादा मिडिल मेन और व्यपारी वर्ग लाभान्वित होगा. और आमलोगों को बाजार की प्रतिस्पर्धा के अनुसार ज्यादा कीमत चुकानी पडेगी.

किसानों ने तो  तत्काल नकदी की मांग की थी. ताकि वे डिजल बीज आदि की खरीद के लिए इसका इस्तेमाल कर सकें. लेकिन सरकार की घोषणा में इसे नजरअंदाज किया गया है. इसी तरह रेहड़ी-पटरी वालों की भी मांग नकदी की थी. जिससे वे तुरंत समस्या ये जूझ सकें.

लेकिन उन्हें भी महत्व नहीं दिया गया है. दुनिया के अधिकांश देशों ने अपने जीडीपी के अनुसार जिस राहत पैकेज की घोषणा की है, उसमें नकदी भुगतान पर ही जोर है. लेकिन भारत सरकार ने नकदी के बजाय दूरगामी सपने दिखाये हैं.

हर्ष मंदर ने अपने एक लेख में एक रिसर्च से आए आंकड़े का विवरण भी दिया है. स्वैन की रिपोर्ट बताती है कि लॉकडाउन के दूसरे चरण में मजदूरों के बीच असुरक्षा और अनिश्चितता की भावना बढ़ी. 50 प्रतिशत कामगारों के पास एक दिन से भी कम वक्त का राशन उपलब्ध है. 46 प्रतिशत मजदूरों के पास बिल्कुल भी पैसे या भोजन नहीं हैं.

पांच में से चार मजदूरों को लॉकडाउन के दूसरे चरण तक कोई राशन नहीं मिला था. 64 प्रतिशत कामगारों के पास 100 रुपये से भी कम पैसे बचे हैं. वही, 74 फीसदी लोगों के पास उनकी रोज की दिहाड़ी का बस आधा हिस्सा ही बचा हुआ है, जिसके सहारे लॉकडाउन का पूरा समय काटना है.

मात्र 6 प्रतिशत कामगारों को उनका पूरा पगार मिला है. जबकि 16 फीसदी लोगों को मालिकों ने आंशिक भुगतान किया है. 78 प्रतिशत लोगों को उनके मालिकों ने लॉकडाउन लागू होने के बाद से कोई भुगतान नहीं किया.

लॉकडाउन के पहले चरण में 89 प्रतिशत लोगों को कोई मजदूरी नहीं मिली. इसी तरह 99 प्रतिशत स्व-रोजगार से लगे लोगों की आय लॉकडाउन के बाद से पूरी तरह ठप हो गयी है.

41 प्रतिशत मजदूरों का कहना है कि उनके ऊपर घर का किराया है. और लोन चुकाने जैसी जिम्मेदारियां हैं. और गांव वापस लौटने के लिए पैसे नहीं हैं तो उन्हें शहर में ही रुकना पड़ेगा. एक तिहाई मजदूर अपने मौजूदा नियोक्ता के साथ ही काम करना चाहते हैं. तो एक तिहाई लोग इस असमंजस में हैं कि आगे क्या करें.

ये आंकड़े बताते हैं कि केवल एलान ही पर्याप्त नहीं है. बल्कि उस तंत्र को भी संवेदनशील और समभाव से भरने की जरूरत है जो लोगों के बीच सक्रिय है. पंचायतों और ग्राम सभाओं की भूमिका इसमें अहम हो सकती है. लेकिन उसके लिए भी बड़ी सावधानी की जरूरत है. एक ऐसे दौर में जब विकेंद्रीकरण के विचार ही गौण हो रहे हैं,  जिसकी ओर ममता बनर्जी, विजयन और केजरीवाल लगातार इशारा कर रहे हैं, राज्य सरकारों के संकट को भी समझने की जरूरत है.

उनकी आर्थिक सीमाओं को अब तक की आर्थिक घोषाओं से कितनी ताकत मिलेगी. इसपर भी विचार किए जाने की जरूरत है. भाजपा शासित असम भी कह रहा है कि केंद्र का जोन बंटवारा का नियम सही है. इसे अन्य मामलों के संदर्भ में भी समझना होगा.

मुख्य चुनौती तो ठप पड़ी आर्थिक गतिविधि को तीव्र करने की है. लेकिन यह आधे-अधूरे निर्णयों से कितना हो सकेगा, इसके बारे में संदेह को माहौल है. लॉकडाउन ने आर्थिक क्षेत्र के लिए बड़ी मुसीबत पैदा की है. और केंद्र उससे बाहर आने के जो उपाय बता रहा है, उससे विशेषज्ञों के बड़े समूह में भरोसा नहीं है. हर्ष मंदर ने सही ही कहा है कि वर्तमान परिवेश में श्रम करने वालों के जीने की आशा धूमिल होती जा रही है.

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