OFFBEATOpinionऐसे थे हमारे नायक जयपाल सिंह मुंडा

जानिए, प्रमोद पाहन कैसे बन गये मरड़ गोमके

जयंती विशेषः ऐसे थे हमारे नायक जयपाल सिंह मुंडा-1

जयपाल सिंह मुंडा एक बहुमुखी प्रतिभावाले और झारखंड के इतिहास में एक ऐसे किरदार हैं जिनको भुलाया नहीं जा सकता. एक साधारण आदिवासी  परिवार से निकलकर वे इंग्लैंड तक पहुंचे और वहीं उनकी शिक्षा-दीक्षा हुई. आईसीएस में  सेलेक्शन के बाद भी उन्होंने  अंग्रेजों की सबसे बड़ी नौकरी इसलिए छोड़ दी कि वे हॉकी खेलना चाहते थे . तीन जनवरी को उनकी जयंती है. पढ़िए उनकी बहुआयामी शख्सीयत की दिलचस्प कहानियां.

अश्विनी कुमार पंकज

जयपाल सिंह मुंडा आज के झारखंड के टकरा पाहनटोली गांव के रहनेवाले थे. वे मुंडा आदिवासी समुदाय के हैं और उनके पिता परंपरागत रूप से मुंडा समाज के पाहन थे. पाहन मुंडा समाज में एक पद है, जिनपर समाज के धार्मिक-आध्यात्मिक कार्यों के संपादन का भार होता है. उनकी सामाजिक भूमिका पुजारी की बजाय नैतिक मुखिया के तौर पर कहीं ज्यादा होती है. उनके पिता का नाम अमरू पाहन और मां का नाम राधामुनी था. आठ भाई बहनों में बहन किस्टोमनी सबसे बड़ी थी. दूसरे नंबर पर ये स्वयं थे फिर इनसे छोटे दो भाई जयश्री और रघुनाथ थे. शेष चारों बहनें इन सबसे छोटी थीं.

रांची से 11 मील दूर इस गांव में जन्मे थे मरड़ गोमके

टकरा पाहनटोली खूंटी जिले में है. पाहनटोली रांची से 11 मील दक्षिण में है. जयपाल सिंह मुंडा ने अपनी ऑटोबायोग्राफी में अपने गांव और परिवार का परिचय देते हुए बताया है कि, अगर आप पक्की सड़क से हमारे गांव जायेंगे तो लगभग 14 मील चलना होगा. और नदी पार कर, जो गरमी के दिनों मे प्राय: सूखी रहती है, आना चाहे तो रांची से 11 मील की दूरी है टकरा पाहनटोली की. गांव में सिर्फ पांच पाहन भाइयों के घर हैं, जिनमें हमारे पिता सबसे छोटे हैं. टकरा लगभग पूरी तरह से ईसाई धर्म में कन्वर्ट हो गया है. यहां एक चर्च और प्राइमरी स्कूल है. मारांगहादा और खूंटी हमारे गांव से महज पांच मील की दूरी पर है. मरांगहादा में प्रत्येक शनिवार को एक बड़ा हाट (साप्ताहिक बाजार) लगता है, जबकि खूंटी सबडिविजनल मुख्यालय है और इलाके का सबसे बड़ा व्यापारिक केंद्र.

आबा अमरू पाहन की अंगुली थाम जब पहुंचे थे रांची के संत पॉल स्कूल

जयपाल सिंह मुंडा का वास्तविक नाम प्रमोद पाहन था. उनके जन्म की वास्तविक तिथि क्या थी, इसे वह भी नहीं जानते थे. हालांकि अब 3 जनवरी 1903 की तारीख उऩकी जन्मतिथि के रूप में स्थापित हो चुकी है. फिर भी यह सवाल अपनी जगह पर ही कायम है कि उनकी असली जन्मतिथि क्या है. उऩका नाम भी प्रमोद से कैसे जयपाल हुआ और उनकी सामुदायिक पहचान मुंडा कैसे उनसे अलग हुआ, इस बारे में उन्होंने लिखा है, मेरा नाम किसने और कब बदला, मुझे नहीं मालूम, वह 1911 की 3 जनवरी थी जिस दिन शायद मेरा नाम बदला गया होगा. तब मैं 8-10 साल का रहा होउंगा. घर में लोग मुझे प्रमोद कहते थें और 3 जनवरी के पहले तक यहीं मेरा नाम था. लेकिन 3 जनवरी को जब मैं अपने आबा (पिता) अमरू पाहन की अंगुली थामे, सकुचाते हुए रांची के संत पॉल स्कूल पहुंचा था तो न सिर्फ मेरी पैदाइश की तारीख बदल गई बल्कि मेरा नाम भी बदल गया था.

दीदी को छोड़नी पड़ी पढ़ाई

ऐसा माना जाता है कि जब वे संत पॉल स्कूल रांची में पढ़ने आए थे उस समय उनकी उम्र लगभग 12 वर्ष की रही होगी. इसके पहले की पढ़ाई उन्होंने टकरा के ही प्राइमरी स्कूल से की थी. जयपाल सिंह मुंडा ने ही बताया है कि टकरा स्कूल में लूकस शिक्षक थे. जिन्होंने जयपाल को हिंदी और गणित की प्राथमिक शिक्षा दी थी. इसी के साथ अंग्रेजी के कुछ शब्दों का भी ज्ञान उन्हें वहीं मिला था. जयपाल सिंह के अनुसार, बाबा (पिता) ने मुझे संत पॉल में भरती करा दिया और दीदी किस्टोमनी को रांची में ही संत मार्गरेट गर्ल्स स्कूल में दाखिला दिलाया. लेकिन मां ने दीदी की पढ़ाई पर आपत्ति कर दी. जिससे वह पढ़ने से वंचित रह गई. दीदी पढ़ने में बहुत तेज थी पर मां की जिद के आगे पिता को झुकना पड़ा और दाखिला हो जाने के बाद भी उसे स्कूल छोड़ना पड़ा.

केनोन क्रॉसगेव ने पहचानी थी जयपाल सिंह मुंडा की प्रतिभा

संत पॉल स्कूल के प्रधानाध्यापक केनोन कॉसग्रेव थे. कॉसग्रेव तब संत पॉल मिशन के धर्माधिकारी और रांची नगरपालिका के वाइस चेयरमैन भी थे. उनकी पारखी नजरों ने जयपाल सिंह मुंडा की मेधा को पहचान लिया था. इसलिए बहुत जल्दी ही जयपाल कॉसग्रेव के प्रिय छात्र बन गए. कहते हैं छात्र जयपाल की जितनी लगन पढ़ाई में थी, उतने ही वे खेलकूद और अन्य गतिविधियों में तेज थे. कॉसग्रेव शायद उनकी सीखने की इसी बहुमुखी प्रतिभा से प्रभावित हुए थे. इसीलिए संत पॉल में दाखिल होने के छठे साल 1918 में जब कॉसग्रेव रिटायर हुए और इंग्लैंड लौटने लगे तो वे अकेले नहीं गए, अपने साथ जयपाल को भी लेते गए.
(लेखक अश्विनी कुमार पंकज की पुस्तक ‘मरड़ गोमके जयपाल सिंह मुंडा’ से साभार)

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