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जानिये सबकुछ, कौन है फेसबुक की केटी हारबथ व आंखि दास, क्या संबंध है भाजपा से, क्यों हो रही चर्चा

Soumitra Roy

ये हैं केटी हारबथ. भारत से लेकर ब्राजील और जर्मनी से लेकर ब्रिटेन तक. दुनिया के बड़े लोकतंत्र में फेसबुक पर जनमत को प्रभावित करने वाले फेक न्यूज, प्रोपोगेंडा और विभाजनकारी विचारधारा को बढ़ावा देने वाली फौज की मुखिया. 2008 में न्यूयॉर्क की मेयर रूडी गुलियानी के राष्ट्रपति पद के चुनाव अभियान में डिजिटल स्ट्रैटेजिस्ट की भूमिका निभा चुकीं केटी अब फेसबुक के वॉशिंगटन स्थित दफ्तर में एक खास यूनिट की अगुवा हैं.

इनका काम जानकर आप हैरत में पड़ जाएंगे. केटी का काम दुनिया के कुछ बड़े लोकतांत्रिक देशों में एक राजनीतिक दल विशेष के चुनाव अभियान में सहयोग करना. और फिर उसी दल के सरकार में आते ही सरकारी अधिकारियों को प्रोपोगेंडा के लिए तकनीकी प्रशिक्षण भी देना है.

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यानी केटी फेसबुक के साथ मिलकर सरकारों के भीतर भी एक अलग ट्रोल आर्मी का गठन करती हैं. एक ऐसी आर्मी, जिसकी विश्वसनीयता अधिकारियों के ओहदे और जिम्मेदारियों को देखते हुए महत्वपूर्ण मानी जानी चाहिए, जो वास्तविकता में अक्सर होती नहीं है.

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भारत में फेसबुक की लोक नीति की मुखिया आंखि दास भी यही काम करती हैं. असल में उनका काम सरकार के साथ लायजनिंग करना है. केटी की टीम पर अगर रूसी पैसे से अमेरिका के पिछले राष्ट्रपति चुनाव को प्रभावित करने का आरोप है, तो आंखि दास पर फेसबुक के व्यापारिक हितों को बचाने के लिए बीजेपी आईटी सेल के जहर बुझे सांप्रदायिक पोस्ट को अनदेखा करने का आरोप है.

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फेसबुक के वॉशिंगटन स्थित दफ्तर में एक खास यूनिट की अगुवा केटी हारबथ की फोटो

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 2014 के चुनाव अभियान में फेसबुक की अहम भूमिका रही थी. मोदी के जितने फॉलोवर फेसबुक पर हैं, उतने दुनिया के किसी भी नेता के नहीं हैं.

एक और शख्सियत हैं शेरिल सैंडबर्ग. फेसबुक की मुख्य कार्यकारी अधिकारी शेरिल जुलाई 2014 में मोदी के बुलावे पर भारत आती हैं और एक किताब के विमोचन में वे भगवा पहनकर फोटो खिंचवाती हैं. उसी तस्वीर में आंखि दास भी मौजूद हैं, जिनकी चर्चा आज जोरों पर है.

आंखि दास वर्ष 2017 में तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त नसीम जैदी का इंटरव्यू करने पहुंच जाती हैं. किस हैसियत से और क्यों, इस पर मोदी सरकार खामोश है.

वॉल स्ट्रीट जर्नल की 14 अगस्त की रिपोर्ट में उन 8 मौकों का उल्लेख किया गया है, जब आंखि दास के सीधे या अप्रत्यक्ष हस्तक्षेप ने बीजेपी और पार्टी के आईटी सेल के हिंदू राष्ट्रवाद को न केवल बढ़ावा दिया, बल्कि उसे राजनीति फायदे के लिए दुष्प्रचार के रूप में आगे बढ़ाने के लिए मदद भी की गई.

एक्टिविस्ट साकेत गोखले ने आंखि दास के राजनीतिक संपर्कों, खासकर बीजेपी और आरएसएस से रिश्तों का प्रमाण सहित खुलासा किया है.

यह खुलासा रिलायंस जिओ के साथ फेसबुक की 43 हजार करोड़ के सौदे के 116 दिन बाद हुआ है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चीन को कथित झटका देने के लिए जिस चीनी ऐप टिकटॉक पर पाबंदी लगाई. उससे जिओ को फायदा हुआ है और यह बात अब सार्वजनिक हो चुकी है कि जिओ उसी टिकटॉक को खरीदने जा रहा है.

साफ है इस पूरे मामले की पहली कड़ी वर्ष 2014 ब्लूमबर्ग की उस रिपोर्ट से जुड़ती है, जिसमें कहा गया है कि किस तरह बीजेपी के प्रोपोगेंडा को समर्थन देने के लिए फेसबुक ने पहले से ही तैयारी कर ली थी.

कैलिफोर्निया के मिनले पार्क में वर्ष 2015 को मोदी और फेसबुक के मुखिया मार्क जकरबर्ग की गलबहियां करती तस्वीरें केवल एक इत्तेफाक नहीं थीं. दोनों के बीच गठजोड़ 2014 के आम चुनाव से पहले ही हो चुका था.

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भारत में फेसबुक की लोक नीति की मुखिया आंखि दास की फोटो

यह भारत के लिए एक बेहद खतरनाक मुद्दा है, क्योंकि एक विदेशी सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म अपने व्यापारिक हितों के लिए देश के लोकतंत्र और प्रत्यक्ष निर्वाचन प्रणाली में जनमत को प्रभावित कर रही है. केवल वर्ष 2014 में ही नहीं, बल्कि वर्ष 2019 के आम चुनावों में भी और अब तो खुल्लमखुल्ला तरीके से.

एक और खतरा यह है कि कहीं न कहीं इस पूरे गंठजोड़ में असहमति के सवाल उठाने वालों की निगरानी और कार्रवाई का रिमोट भी फेसबुक की बदौलत सरकार के हाथों आ जाने की आशंका है. यानी सरकार जब चाहे असहमतियों और सवालों को रोकने के लिए अपना डंडा चलाए.

ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट यह भी कहती है कि मोदी ने फेसबुक से मिले आंकड़ों के आधार पर ही ऐसे स्वयंसेवकों की पहचान कर उन्हें नियुक्त किया, जो उनके फायदे के लिए झूठे दुष्प्रचार कर सकें.

केटी हारबथ ने भारत में करीब 6000 अधिकारियों, कर्मचारियों को ढेरों कार्यशालाओं, तकनीकी सत्रों के माध्यम से प्रशिक्षित किया. क्या यह ऐसा काम था, जो भारत सरकार नहीं कर सकती थी ? इसके पीछे गहरे स्वार्थ छिपे थे, जो आज प्रोपोगेंडा के रूप में हमारे सामने है.

बीते 6 साल में दर्जनों ऐसे पत्रकारों की हत्या की गई है, जो सरकार की नीतियों, कामकाज से असंतुष्ट थे. वे सवाल पूछते थे. ऐसे सवाल, जिनका जवाब देना सरकार के लिए मुश्किल था.

इसी तरह विपक्षी दलों के लिए भी सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म पर अपना पक्ष रखना असंभव हो गया है, क्योंकि बीजेपी की ट्रोल आर्मी हिंदू राष्ट्रवाद का झंडा लिए मुकाबले में आ खड़ी होती है. महिलाओं को बलात्कार, हत्या, अपहरण, भद्दी गालियां दी जाती हैं. रोजाना झूठे वीडियो प्रचारित किए जाते हैं. भारत फेक न्यूज का दुनिया में सबसे बड़ा गढ़ बन चुका है.

इस मुहिम में फेसबुक सरकार का साथ दे रहा है. फेसबुक के ही दो और प्लैटफॉर्म व्हाट्सएप मैसेंजर और इंस्टाग्राम भी इसमें सहायक नजर आते हैं.

यह पूरा मामला इस देश की निर्वाचन प्रणाली और सरकार की वैधानिकता पर सवाल खड़े करता है. यह निर्वाचन आयोग की भूमिका पर सवाल खड़े करता है और एक राष्ट्रीय दल के रूप में बीजेपी की मंशा पर सवाल खड़े करता है, जिसने फेसबुक और व्हाट्सएप को झूठे दुष्प्रचार का जरिया बनाया हुआ है.

डिस्क्लेमरः ये लेखक के निजी विचार हैं.

11 Comments

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