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जानें काकोरी कांड में शामिल 13 साल के मन्मथ नाथ गुप्त की किस चूक के कारण पकड़े गये थे सभी क्रांतिकारी  

मन्मथ नाथ गुप्त की पुण्यतिथि पर विशेष

Naveen Sharma

Ranchi :  आम तौर पर बंदूक और कलम को एक तरह से एक दूसरे का विरोधी माना जाता है. ऐसे बहुत कम लोग होते हैं जो बंदूक और कलम दोनों के इस्तेमाल में समान रूप से कुशल हों. इसी तरह की अनूठी प्रतिभा से संपन्न थे क्रांतिकारी और लेखक मन्मथनाथ गुप्त.

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इनका जन्म 7 फरवरी 1908 को वाराणसी में हुआ था. पिता वीरेश्वर विराटनगर (नेपाल) में स्कूल के हेडमास्टर थे. इसलिए मन्मथनाथ ने भी दो वर्ष वहीं शिक्षा पाई. बाद में वे वाराणसी आ गए. उस समय के राजनीतिक वातावरण का प्रभाव उन पर भी पड़ा और 1921 में ब्रिटेन के युवराज के बहिष्कार का नोटिस बांटते हुए गिरफ्तार कर लिए गए और तीन महीने की सजा हो गई.

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काकोरी कांड में हुए शामिल

जेल से छूटने पर मन्मथ ने काशी विद्यापीठ में प्रवेश लिया और वहाँ से विशारद की परीक्षा उत्तीर्ण की. मात्र 13 वर्ष की आयु में ही स्वतन्त्रता संग्राम में कूद गये और जेल गये. बाद में वे हिन्दुस्तान रिपब्लिकन ऐसोसिएशन के सक्रिय सदस्य भी बने. क्रांतिकारी गतिविधियों के लिए पैसे की जरूरत थी.

8 अगस्त 1928 को राम प्रसाद ‘बिस्मिल’ के घर पर हुई एक इमर्जेन्सी मीटिंग में निर्णय लेकर सरकारी खजाना लूटने की योजना बनी. अगले ही दिन 9 अगस्त 1925 को शाहजहाँपुर शहर के रेलवे स्टेशन से बिस्मिल के नेतृत्व में कुल 10 लोग, जिनमें शाहजहाँपुर से बिस्मिल के अतिरिक्त अशफाक उल्ला खाँ, मुरारी शर्मा तथा बनवारी लाल, बंगाल से राजेन्द्र लाहिडी, शचीन्द्रनाथ बख्शी तथा केशव चक्रवर्ती (छद्मनाम), बनारस से चन्द्रशेखर आजाद तथा मन्मथनाथ गुप्त एवं औरैया से अकेले मुकुन्दी लाल शामिल थे; 8 डाउन सहारनपुर-लखनऊ पैसेंजर रेलगाड़ी में सवार हुए.

क्रान्तिकारियों के पास पिस्तौलों के अतिरिक्त जर्मनी के बने 4 माउजर भी थे. इनके बट में कुन्दा लगा लेने से वह छोटी आटोमेटिक रायफल की तरह लगता था और सामने वाले के मन में भय पैदा कर देता था. इन माउजरों की मारक क्षमता भी अधिक होती थी उन दिनों ये माउजर आज की ए०के०-47 रायफल की तरह चर्चित हुआ करते थे.

लखनऊ से पहले काकोरी रेलवे स्टेशन पर रुक कर जैसे ही गाड़ी आगे बढी, क्रान्तिकारियों ने चेन खींचकर उसे रोक लिया और गार्ड के डिब्बे से सरकारी खजाने का बक्सा नीचे गिरा दिया. पहले तो उसे खोलने की कोशिश की गयी किन्तु जब वह नहीं खुला तो अशफाक उल्ला खाँ ने अपना माउजर से गोली मारकर ताला तोड़ दिया.

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मन्मथ की एक गलती से पकड़े गये थे क्रांतिकारी

क्रान्तिकारियों ने डकैती के दौरान पिस्तौलों के अतिरिक्त जर्मनी के बने चार माउजर भी इस्तेमाल किये थे. उन दिनों ये माउजर आज की ऐ.के- 47 रायफल की तरह चर्चित हुआ करता था. लखनऊ से पहले काकोरी रेलवे स्टेशन पर रुक कर जैसे ही गाड़ी आगे बढ़ी, क्रान्तिकारियों ने चेन खींचकर उसे रोक लिया और गार्ड के डिब्बे से सरकारी खजाने का बक्सा नीचे गिरा दिया. पहले तो उसे खोलने की कोशिश की गयी किन्तु जब वह नहीं खुला तो अशफाक उल्ला खाँ ने अपना माउजर मन्मथ नाथ गुप्त को पकड़ा दिया और हथौड़ा लेकर बक्सा तोड़ने में जुट गए.

मन्मथ ने गलती से माउजर का ट्रिगर दबा दिया जिससे छूटी गोली एक आम यात्री को लग गयी. उसकी वहीं मौत हो गयी. इससे मची अफरा-तफरी में, चाँदी के सिक्कों व नोटों से भरे चमड़े के थैले चादरों में बाँधकर वहाँ से भागने के दौरान एक चादर वहीं छूट गई. अगले दिन यह खबर सब जगह फैल गयी.

ब्रिटिश सरकार ने इस ट्रेन डकैती को बहुत गम्भीरता से लिया और सी. आई. डी इंस्पेक्टर तसद्दुक हुसैन के नेतृत्व में स्कॉटलैण्ड की सबसे तेज तर्रार पुलिस को इसकी जाँच का काम सौंप दिया.

पुलिस को घटनास्थल पर मिली चादर में लगे धोबी के निशान से इस बात का पता चल गया कि चादर शाहजहाँपुर के किसी व्यक्ति की है. शाहजहाँपुर के धोबियों से पूछने पर मालूम हुआ कि चादर बनारसीलाल की है. बिस्मिल के साझीदार बनारसीलाल से मिलकर पुलिस ने इस डकैती के बारे में सब उगलवा लिया.

इसके बाद एक-एक कर सभी क्रांतिकारी पकड़े गये और उन पर मुकदमा चला. इनमें से चार क्रांतिकारियों- राम प्रसाद बिस्मिल, राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी, अशफाक उल्ला खान व ठाकुर रोशन सिंह को फांसी हुई और बाकी सभी को 5 वर्ष से लेकर आजीवन कारावास की सजा सुनाई गयी.

मन्मथ उस वक़्त नाबालिग थे, इसलिए उन्हें फांसी की सजा न देकर आजीवन कारावास (14 साल) की कड़ी सजा मिली. साल 1939 में जब वे जेल से छूटकर आये तो उन्होंने फिर एक बार अंग्रेजों का विद्रोह शुरू किया.

हालाँकि, इस बार उनका हथियार उनकी लेखनी थी. उन्होंने ब्रिटिश सरकार के खिलाफ समाचार-पत्रों में लिखना शुरू किया. जिसके चलते उन्हें एक बार फिर कारावास की सजा सुनाई गयी. साल 1939 से लेकर 1946 तक उन्होंने जेल में रखा गया. उनके रिहा होने के एक साल बाद ही देश आजाद हो गया.

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जब बयाँ किया दिल का अफ़सोस

आज़ाद भारत में वे कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया से जुड़े और तमाम गतिविधियों में सक्रीय रहे. साल 1997 में 27 फरवरी को दूरदर्शन नेशनल की डॉक्युमेंट्री ‘सरफरोशी की तमन्ना’ के लिए उन्होंने अपना अंतिम साक्षात्कार दिया. इस साक्षात्कार में उन्होंने कबूला कि उनकी ही एक गलती की वजह से काकोरी कांड के सभी क्रन्तिकारी और उनके प्रिय ‘बिस्मिल’ पकड़े गये थे. उन्होंने बताया कि उन्हें इस बात का ताउम्र अफ़सोस रहा है कि उस वक़्त उन्हें फांसी क्यों नही हुई.

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साहित्यिक अवदान :

मन्मथ गुप्त ने साहित्य की विभिन्न विधाओं में लिखा है. स्वतंत्रता के बाद भी उनका लेखन-कार्य जारी रहा. स्वतन्त्र भारत में वे योजना, बाल भारती और आजकल नामक हिन्दी पत्रिकाओं के सम्पादक भी रहे. उन्होंने हिंदी, अंग्रेजी और बंगाली में लगभग 120 किताबें लिखीं. जिनमें शामिल हैं- द लिवड़ डेंजरसली- रेमिनीसेंसेज ऑफ़ अ रेवोल्यूशनरी, भगत सिंह एंड हिज़ टाइम्स, आधी रात के अतिथि, कांग्रेस के सौ वर्ष, दिन दहाड़े, सर पर कफन बाँध कर, तोड़म फोड़म, अपने समय का सूर्य:दिनकर, और शहादतनामा आदि.

कथा साहित्य और समीक्षा के क्षेत्र में इनका कार्य विशेष महत्व का है. बहता पानी (प्रकाशन वर्ष: 1955 ई.) उपन्यास क्रान्तिकारी चरित्रों को लेकर चलता है. समीक्षा-कृतियों में कथाकार प्रेमचंद (प्रकाशन वर्ष: 1946ई.), प्रगतिवाद की रूपरेखा (प्रकाशन वर्ष: 1953 ई.) तथा साहित्य, कला, समीक्षा (प्रकाशन वर्ष: 1954 ई.) की अधिक ख्याति हुई हैं.’भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन का इतिहास”क्रान्ति युग के अनुभव’ ‘चंद्रशेखर आज़ाद”विजय यात्रा’ ‘यतींद्रनाथ दास”कांग्रेस के सौ वर्ष ‘कथाकार प्रेमचंद”प्रगतिवाद की रूपरेखा’साहित्यकला समीक्षा आदि समीक्षा विषयक ग्रंथ हैं. उन्होंने कहानियाँ भी लिखीं.

प्रसिद्ध क्रांतिकारी और सिद्धहस्त लेखक मन्मथनाथ गुप्त का निधन 26 अक्टूबर 2000 में हुआ.

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