Opinion

किशन पटनायक: लीक से हटकर एक राजनेता

Madhukar

आमतौर से राजनेता बुद्धिजीवी नहीं होते हैं और अधिकतर बुद्धिजीवी लोग राजनीति के दलदल में फंस ना नहीं चाहते हैं. इन सबसे अलग मेरे बौद्धिक और राजनीतिक गुरु किशन पटनायक सिद्धांत वादी और मूल्य से समझौता न करने वाले राजनेताओं की अग्रिम पंक्ति में गिने जाते हैं. ओड़िया हिंदी और अंग्रेजी में एक अच्छे लेखक की तौर पर पहचान है. 30 जून 1930 को उड़ीसा के सबसे पिछड़े इलाके के गरीब इलाके के रूप में परिचित कालाहांडी में जन्म हुआ था.

नागपुर विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर और शिक्षा प्राप्त की उत्तर भारत के विश्वविद्यालयों में “छोटे लोहिया” के नाम से परिचित किशन पटनायक 1962 में संबलपुर से जीतकर 32 साल की उम्र में लोकसभा पहुंचे. नेहरू सरकार की नाकामियों और जनहित के मुद्दे को उठाकर उन्होंने लोकसभा को झकझोरा. कालाहांडी की गरीबी और भुखमरी पर किशन पटनायक का दिया गया भाषण सबको रुला दिया हिंदी में सदन की कार्यवाही आरंभ करवाई.

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राजनीतिक चिंतक किशन पटनायक की समाजवादी आंदोलन में अहम हिस्सा रही डॉ राम मनोहर लोहिया के सच्चे अनुयाई के रूप में आखिरी सांस तक सिद्धांत के अनुरूप वह सोच और काम में दृढ़ थे. साधारण दिखने वाले असाधारण के व्यक्तित्व के अधिकारी किशन पटनायक ने अखिल भारतीय समाजवादी युव जनसभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में उन्होंने जनों को संगठित और समाजवादी आंदोलन में सक्रिय करने की जिम्मेदारी निभाई. उनके साथ जनेश्वर मिश्रा समाजवादी युव जनसभा के राष्ट्रीय महामंत्री थे.

मेरे जैसे बहुत सारे छात्र और नौजवान उनके वाणी और लेखन से प्रेरणा लेकर समाजवादी आंदोलनों से जुड़े राजनीति में रवि राय ,दिनेश दासगुप्ता, गणनाथ प्रधान, युधिष्ठिर दास, नारायण साहू और रोमा मित्र के घनिष्ठ सहयोगी रहे. उन्होंने डॉ लोहिया द्वारा स्थापित हिंदी (जोन) अंग्रेजी में ”मैनकाइंड” जैसी बौद्धिक पत्रिकाओं का संपादन किया तथा सामूहिक वार्ता के संस्थापक संपादक थे “धर्म युद्ध”,” दिन मांग”,” रविवार”,” सेमिनार” विभिन्न पत्रिकाओं और समाचार पत्रों में लेख निकलता था.

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“ कल्पना” में उनकी कविताएं भी छपी उनके लेखों का” भारत शुद्र का होगा” ,”विकल्प ही नहीं है. दुनिया “भारतीय राजनीति पर एक दृष्टि किसान आंदोलन “दशा और दिशा”,” बदलाव की कसौटी” “संभावनाओं की तलाश “और किशन पटनायक….आत्मा और कथ्य प्रकाशित हुए हैं.

डॉक्टर लोहिया के निधन के बाद उनके सिद्धांतों के विपरीत समाजवादी नेताओं के आचरण से छुद होकर वे संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी से अलग हुए तथा लोहिया विचार मंच की स्थापना की 1980 में समता संगठन ,1990 में जनादोलन समन्यव समिति 1995 में “समाजवादी जन परिषद” ,1957 में जन आंदोलन के राष्ट्रीय समन्यव के गठन में अहम भूमिका निभाई ,1975 में आपातकाल दरमियान भूमिगत रूप से हुए से वे मेरे यहां कोई दिनों तक रहे.

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बाद में गिरफ्तार होकर तिहाड़ जेल में गए. 1969,11 जून को श्रीमती बीना मंजरी दास से कोर्ट में विवाह हुआ और दोनों ने बिना संतान रहने का संकल्प लिया. 27 सितंबर 2004 को उनका निधन भुवनेश्वर में हुआ.
आज की राजनीति में उनके जैसा सतही राजनीतिक चिंतन से अलग कुछ गहरा और मौलिक सोचने वाले अधेका विरल ही मिलेंगे.

(मधुकर वरिष्ठ पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता हैं)

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