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मुझे मार कर फेंक दो कि मैं बूढ़ा हो गया हूं, मेरी किसी को फिक्र नहीं कि मैं बूढ़ा हो गया हूं

हैदराबाद एयरपोर्ट पर 18 जनवरी 2017 की सुबह कोलकाता के लिए Indigo की उड़ान लेते वक्त मुझे एक 75-80 की आयु वर्ग के  एक वृद्ध दंपति से मुलाकात हुई

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Rajesh Das

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Rajesh Kumar Das
Rajesh Das

हैदराबाद एयरपोर्ट पर 18 जनवरी 2017 की सुबह कोलकाता के लिए Indigo की उड़ान लेते वक्त मुझे एक 75-80 की आयु वर्ग के  एक वृद्ध दंपति से मुलाकात हुई जिन्हें उनके बच्चे एयरपोर्ट तक छोड़ने आए थे. जाड़े की वजह से उक्त वृद्ध दंपति के पास सामान अधिक था और एयरपोर्ट पर भी भीड़ भी बहुत ज्यादा थी. लंबी कतार की वजह से उक्त दंपत्ति बहुत थकान में भी थे और जाड़े के बावजूद उनके माथे से बहुत सारा पसीना निकल रहा था. मैंने वहां पर उन्हें एयरपोर्ट कर्मियों से मदद दिलाने की भी कोशिश की परंतु वे कर्मी फिर कहीं चले गए. बोर्डिंग डेस्क पर अपनी ट्रॉली से सामान उठाकर कनवेयर बेल्ट पर रखते हुए उन्हें बहुत परेशानी हुई फिर लाइन में खड़े कुछ लोगों की मदद भी उन्हें मिली मगर वहां पर एयरपोर्ट के किसी भी कर्मी की कोई मदद उक्त दंपत्ति को प्राप्त नहीं हो सकी. बात यहीं समाप्त नहीं हुई इसके बाद सुरक्षा जांच के वक्त भी उक्त दंपत्ति को उसी प्रकार अलग अलग लंबी लाइन में खड़ा होना पड़ा, एक्सरे मशीन से अपने सामान को वापस लेने में भी उन्हें परेशानी हुई और और एक लंबी परिक्रमा के पश्चात ही वे अंदर जा सके.

मुझे नहीं पता, वे बीमार हो सकते थे, उन्हें खड़े होने में परेशानी हो सकती थी, उन्हें सांस और हृदय संबंधी बीमारी हो सकती थी और भी बहुत सारी परेशानियां रही होंगी जिसे मैं उस छोटे से समय-काल में समझ नहीं पाया. हमारे देश में इस प्रकार की घटनाएं बेहद आम हैं, बच्चे बड़े शहरों में नौकरियां करते हैं और बूढ़े मां बाप अपने बच्चों के पास आते जाते रहते हैं. बच्चों के पास भी इतना समय नहीं होता है कि वे अपने माता-पिता के साथ हर समय रह सके और यह व्यवहारिक भी नहीं है. बूढ़े माता पिता को अपना ख्याल जहां तक हो सके खुद ही रखना पड़ता है,  जो हर वक्त और हर स्थान पर संभव नहीं है. एयरपोर्ट तो फिर भी एक सुविधा संपन्न स्थान है, अगर हम हमारी रेलवे स्टेशनों और बस अड्डों की ओर देखें तो हमारी आंखें नम हो जाएंगी. क्या हम किसी ट्रेन की बोगी में किसी बीमार वृद्ध व्यक्ति को स्ट्रेचर के मार्फत प्रवेश करा सकते हैं या व्हीलचेयर को ही बोगी के अंदर ले जा सकते हैं  या वयोवृध्द श्रेणी के लिए हमारे पास डेडीकेटेड रेलवे बोगी उपलब्ध है जहां उनके लिए कुछ जरूरी सुविधाएं उपलब्ध कराई जा सके.

ऐसे तमाम संदर्भों से जुड़ी कुछ जरूरी बातों को मैं आपके समक्ष बिंदुवार रखना चाहूंगा

  1. IRDA (Insurance Regulatory & Development Authority of India) के अनुसार बीमा क्षेत्र का भारत में काफी पुराना इतिहास है. बीमा क्षेत्र का मनुस्मृति धर्मशास्त्र और कौटिल्य के अर्थशास्त्र में भी उल्लेख पाया गया इन बड़े ग्रंथों में संसाधनों को एक स्थान पर पूल करना और पुनः जरूरतमंद तक इन्हें पहुंचाने की बात कही गई है.

1993 में रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर श्री आर एन मल्होत्रा साहब की अध्यक्षता में बनी कमेटी के सुझाव के आधार पर निजी संस्थानों को भी बीमा के क्षेत्र में प्रवेश दिया गया, ऐसा स्वस्थ प्रतिस्पर्धा को बढ़ाने और उपभोक्ता तक इसका फायदा पहुंचाने के उद्देश्य से किया गया. इसके साथ ही विदेशों की कंपनियां भी भारत में बीमा क्षेत्र में अपना कारोबार करने लगी. नौजवानों की एक बड़ी आबादी वर्तमान में स्वास्थ्य बीमा का लाभ देश के विभिन्न बीमा कंपनियों से प्राप्त कर रही है परंतु अगर वृद्धजनों की श्रेणी में देखा जाए तो ना वहां ज्यादा बीमा छाजन है और अगर कहीं बीमा मिल भी रहा है तो वहां इसके प्रीमियम की दर इतनी अधिक है कि साधारण वर्ग  के  वृद्ध लोगों के लिए इसे लेना नामुमकिन है. इस विषय पर मेरा प्रश्न बिल्कुल साफ है- कि जब खेल के मैदान में भी “समानता की नीति (Equality)” के साथ खिलाड़ी खेलने के लिए उतरते हैं तो इस क्षेत्र में वृद्धजनों के साथ इतना बड़ा अन्याय क्यों हो रहा है जबकि स्वास्थ्य संबंधी जरूरतें उनकी कहीं ज्यादा है, क्या इसे लेबल प्ले कहा जा सकता है?

7 वर्ष पूर्व बेहद मुश्किल से ही मुझे अपनी वृद्ध माता के लिए रॉयल सुंदरम नामक बीमा कंपनी से लगभग तीन लाख रुपए तक की स्वास्थ्य बीमा प्राप्त हो पाई थी जबकि इलाज के लिए यह रकम बहुत ही कम है. अगर आप भी अपने परिवार के अंदर, जान पहचान के लोगों या सरकार के विद्वान जनों के बीच में भी इस विषय पर विमर्श करेंगे तो आप पाएंगे कि वृद्धजनों में स्वास्थ्य बीमा की सुविधा सही तरीके से सुलभ ही नहीं है.

मेरा ऐसा मानना है कि हर वृद्ध व्यक्ति जिसकी उम्र 65 साल से अधिक है, ने किसी न किसी रूप में राष्ट्र निर्माण में अपना योगदान दिया है और चूँकि अब वह बूढ़े हो गए हैं राष्ट्र को भी उनके लिए कुछ सोचना चाहिए, उन्हें हर जरूरी सुविधा (कम प्रीमियम पर स्वास्थ्य बीमा समेत) मुफ्त और सुलभ तरीके से प्राप्त होनी चाहिए ताकि वास्तव में श्रवण कुमार की अवधारणा पूरी होती दिखाई पड़े. आपने 27 दिसंबर 2016 को देहरादून चारधाम महामार्ग विकास परियोजना के उद्घाटन के अवसर पर हमारे माननीय सड़क निर्माण मंत्री श्री नितिन गडकरी जी को श्रवण कुमार की संज्ञा दी थी परंतु मेरा ऐसा मानना है कि आपके सिर्फ इस एक बड़े कदम से आप महामान्य श्रवण कुमार की श्रेणी में स्वत: आ जाएंगे.

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  1. सरकार के द्वारा वर्तमान में वृद्ध जनों की योजनाएं जैसे ओल्ड एज होम, डे केयर सेंटर, वृद्धावस्था पेंशन, अस्पतालों में डेडीकेटेड स्वास्थ्य सुविधाएं, इनकम टैक्स में छूट, वर्तमान और पूर्ववर्ती बचत योजनाएं, धारा 80 D और 80DDB की छूट, TDS में छूट, रेलवे में रियायती टिकट और अन्य सुविधाएं, सुरक्षा व्यवस्था आदि वैसे तो बेहतर लगती हैं परंतु अभी हमारे देश को इससे काफी ऊपर जाना है.

सरकार की इन तमाम योजनाओं का वृद्धजन और भी अधिक लाभ उठा पाएंगे यदि सरकार “वृद्घ मित्र आपके द्वार” जैसी कोई योजना ला पाय जिसमें पेशेवर काउंसलर घरों में जाकर वृद्धजनों की जरूरतों को एक सरल प्रपत्र में भरे, एक सेंट्रलाइजड पोर्टल में पोस्ट करें और उसका निदान करवा पाए. आपने डिजिटल लाइफ सर्टिफिकेट दिए जाने संबंधी एक योजना को शुरू भी किया है परंतु अभी भी इस योजना के आच्छादन का स्तर बहुत ही निम्न है, इस प्रकार की योजनाओं को अधिकारियों के भरोसे ही पूरी तरह से नहीं छोड़ा जा सकता है. नीति तभी पूरी तरह से कामयाब हो सकती है जब उसके लिए फिक्स्ड टाइमलाइन हो.

काउंसलरों के घर-घर जाकर मिलने की स्थिति में वृद्धजनों के अंदर भी एक महत्व का भाव जागृत होगा कि सरकार उनकी सुधि हर संभव तरीके से ले रही है, उन्हें बहुत ही अच्छा महसूस होगा.

  1. भारतीय रेलवे में बहुत कुछ नया हो रहा है, एक अच्छे कायाकल्प की तैयारी चल रही है. क्यों ना इसी महत्वपूर्ण दौर में हम एल्डरली फ्रेंडली बोगियां बनाएं जिसे हम अपनी ट्रेनों में जरूरतों और बुकिंग की संख्या के आधार पर लगा सके तो वृद्धजनों के लिए खासी राहत हो जाएगी. इसके साथ-साथ हर ऐसे स्थानों में जहां वृद्धजनों का आना जाना होता है वहां पर एल्डरली फ्रेंडली काउंटरस और सहायकों को तैनात किया जा सकता है ताकि वृद्धजनों को जरूरत पर मदद पहुंचाई जा सके.
  2. वृद्धजनों को स्वास्थ्य सुविधाएं भी एक नवाचारी ढंग से प्राप्त हो सके इसके लिए डेडिकेटेड स्वास्थ्य सुविधाएं और अस्पताल निर्दिष्ट किए जा सकते हैं. अगर ऐसे अस्पतालों में हॉस्पिटैलिटी क्षेत्र से प्रशिक्षित लोगों की नियुक्ति हो जो वृद्धजनों से आत्मीयता से बात भी करें और उनका इलाज भी करें तो खासी सहूलियत हो जाएगी.
  3. जाड़े के मौसम के दौरान गरीब वृद्ध जनों को स्थानीय प्रशासन के सहयोग से कंबल आदि का वितरण किया जाता है, अगर इस तरह के प्रयासों को पेशेवर तरीके से पूर्ण किया जाए तो अधिक बेहतर होगा जैसे अलग-अलग शहरों के बड़े व्यवसायिक घरानों को उस शहर में गरीब वृद्धजनों के लिए रैन बसेरे और ओल्ड एज होम की जिम्मेदारी दी जा सकती है. वृद्धजन उनके लिए कुछ छोटे-मोटे काम भी कर सकते हैं ताकि उनके जीवन की मोबिलिटी भी बनी रहे और स्वालंबन के साथ जीवन जीने की अवधारणा भी आगे बढ़ सके. जाड़े के मौसम में प्रशासन के द्वारा मात्र कंबल बांट देना  हमारे देश के वेलफेयर स्टेट की अवधारणा से पूरी तरह मेल भी नहीं खाता है, हालांकि यह जरूरत पर बेहद आवश्यक भी है.

पूर्ण विश्वास है कि आप मेरे सुझावों पर गौर करते हुए जरूरी संज्ञान लेने की कृपा जरूर करेंगे!!

श्रेष्ठ भारत के निर्माण के निमित्त और न्यू इंडिया की कामना सहित,

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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