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खूंटी: घोर नक्सल इलाके में बहने वाले गंगा नाला पर बना जिले का सबसे बड़ा बोरीबांध

Ranchi: खूंटी जिला प्रशासन, सेवा वेलफेयर सोसाइटी और क्षेत्र के ग्राम सभाओं के द्वारा एक साथ हाथ मिलाकर चलाये जा रहे जनशक्ति से जल शक्ति अभियान के तहत जिले में बोरी बांधों का निर्माण किया जा रहा है. इसी क्रम में जिले का सबसे बड़ा बोरीबांध गुरूवार को घोर नक्सल प्रभावित इलाके में बसे अड़की प्रखंड के बिरबांकी गांव से होकर बहने वाले गंगा नाला पर बनाया गया.

इस बोरी बांध की लंबाई 120 फीट है. बांध के बनने के बाद 200 फीट चौड़ी और लगभग एक हजार फीट लंबे अर्थात एक लाख वर्ग फीट में पानी लबालब भर गया है. पानी देखने के बाद ग्रामीण काफी उत्साहित हैं.

आजादी के बाद यह पहला मौका था जब इस गांव के गंगा नाला पर बांध बना. वैसे तो बरसात और जाड़े के दिनों में यहां पानी की कमी नहीं होती है, लेकिन गर्मी के दिनों में लोगों को पानी के लिए काफी परेशानियां उठानी पड़ती हैं.

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साप्ताहिक हाट में आने वाले लोगों को मिलेगी राहत

दक्षिणी खूंटी का सबसे बड़ा साप्ताहिक हाट बिरबांकी में लगता है, जहां चार जिलों खरसावां, पश्चिमी सिंहभूम, खूंटी और रांची के गांवों के लोग व्यापार करने और अपनी जरूरत के सामानों की खरीददारी करने पहुंचते हैं. हाट बाजार में आए दुकानदारों और ग्रामीणों को गर्मी के दिनों में पानी के लिए काफी परेशानी उठानी पड़ती थी.

बिरबांकी के मुखिया जवरा पाहन कहते हैं कि इस बोरीबांध के बनने से हाट बाजार में आने वाले लोगों को पानी के लिए परेशानी नहीं उठानी होगी. उन्होंने कहा कि बांध में भरे पानी को देख अब किसान खाली पड़े खेतों में फसल लगाने की बात सोचने लगे हैं.

पहले समझ नहीं पाये थे ग्रामीण

आखिर बोरियों से पानी कैसे रुकेगा, क्या इतने बड़े गंगा नाला को बोरियों से बांधा जा सकता है. इसके अलावा कई सवाल गांव के लोगों के मन में थे. गांव के लोगों को बोरीबांध कन्सेप्ट समझ में नहीं आ रहा था.

लेकिन जब सेवा वेलफेयर सोसाइटी के लोग और इस कार्य में भरपूर सहयोग कर रहे नईमुद्दीन खां ने बोरीबांध ग्रामीणों के साथ मिलकर बनाना शुरू किया, तो गांव के लोगों का उत्साह धीरे-धीरे बढ़ता गया.

गंगा नाला में बह रही पतली धार जब बांध का शक्ल लेने लगी, तो लोगों का उत्साह बढ़ता चला गया. लोगों ने पूरी शक्ति लगा दी और पांच घंटे में बोरीबांध बनकर तैयार हो गया. गांव के लोग इसे जलक्रांति मान रहे हैं. अब इनके द्वारा अन्य स्थानों पर भी बोरीबांध बनाने का मन बनाया जा रहा है.

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मदईत परंपरा से बना बांध

गांव के लुकिन मुंडा ने कहा कि पहले पूर्वज मदईत परंपरा से पत्थरों का बांध बनाया करते थे. यह बोरीबांध उसका ही बदला हुआ स्वरूप है. उन्होंने कहा कि मदईत परंपरा में ईली-मंडी (हंड़िया-भात) की परंपरा है.

ईली के साथ देसी मुर्गा की व्यवस्था गांव के लोगों द्वारा की गयी और बोरीबांध के साथ गांव के लोगों का सामूहिक पिकनिक भी संपन्न हो गया. इस दिन आवश्यक वस्तुओं की दुकानों को छोड़ गांव के सारे लोग अपनी दुकानें बंद कर बोरीबांध में मदईत कर रहे थे.

बूढ़े और नन्हे हाथों ने भी निभायी सहभागिता

पूरे बदन में झुर्रियां थीं, लेकिन कंकपाते हाथों से बुजुर्ग बोरीबांध के किनारे पत्थरों को सजा रहे थे, जिससे बांध की मजबूती बढ़ गयी. वहीं छोटे बच्चे भी नन्हें हाथों से मिट्टी का एक ढ़ेला बांध में फेंक रहे थे. छोटे, बड़े, बूढ़े सारे लोगों ने जल संरक्षण में अपना योगदान दिया.

गांव के हालु मुंडा ने कहा कि सबसे बड़ा फायदा होगा कि भूगर्भीय जलस्तर बढ़ेगा और गांव के कुंआ, तालाब और चापानल नहीं सूखेंगे. मवेशियों के पीने का पानी, गांव के लोगों को नहाने-धोने के लिए अब पानी समस्या नहीं बनेगा.

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