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खूंटी : उकड़ीमाड़ी पंचायत के ईचा गांव में बुनियादी सुविधाओं का अभाव, न पीने का पानी ना स्वास्थ्य केन्द्र में डॉक्टर, सड़क भी जर्जर

Khunti : त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव को लेकर झारखंड के कई जिलों में उत्साह है. गांव की सरकार बनाने में लोग बढ़ चढ़कर हिस्सा ले रहे हैं तो वहीं कई ऐसे पंचायत हैं जहां के लोगों में चुनाव को लेकर उत्साह नजर नहीं आ रहा. इसका कारण है गांव में विकास का ना होना. आज भी कई गांव ऐसे हैं जहां पीने के लिए पानी की व्यवस्था नहीं है. नहाने के लिए गांव की महिलाएं व पुरूष चुआं जाने को मजबूर हैं. खेत खलिहान की क्या ही बात की जाए.

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ईचा गांव की बदहाली

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खूंटी जिला अंतर्गत तोरपा प्रखंड के उकड़ीमाड़ी पंचायत में एक गांव ऐसा भी है जहां सरकार की कोई योजना ठीक से नहीं पहुंच पाई है. गांव में ना पानी की व्यवस्था है ना ही रोजगार सृजन की कोई योजना चल रही है. इसी वजह से गांव से लोग पलायन कर रहे हैं. अब हालात ऐसे हैं कि गांव में कुछ लोग ही बच गए हैं. जो किसी तरह अपना जीवन यापन कर रहे हैं.

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पलायन से बदली गांव की सूरत

ईचा (बगीचा) में लगने वाले साप्ताहिक हाट में कभी दूर दराज गांव से बाजार लगाने ग्रामीण कारोबारी पहुंचते थे, कारोबार भी अच्छा होता था लेकिन वक्त के साथ गांव में बहुत कुछ बदला है. अब न तो पहले जैसी रौनक बाजार में दिखती है ना ही लोग दुकान लगाने गांव पहुंचते हैं. इसका कारण एक ये भी है कि कुछ लोगों ने अपना व्यवसाय बदल लिया तो कुछ बाहर चले गए और जो बच गए वो बाजार नहीं आते.

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तोरपा से ईचा जाने वाली सड़क जर्जर

तोरपा से ईचा गांव की दूरी करीब सात किलोमीटर है लेकिन वहां आपको जाने के लिए कड़ी मशक्कत करनी पड़ेगी. सड़क जर्जर हो चुकी है. बीच रास्ते में छाता नदी पर बना पुल मरम्मत नहीं होने की वजह से जर्जर हो चुका है.

छाता नदी पर बना पुल हो रहा जर्जर

बरसात के मौसम में स्थिति और भयावह हो जाती है. लेकिन इस ओर ना तो प्रशासन की नजर है ना ही नेताओं की. पत्रकारों का आना भी नहीं होता.

तमाम मीडिया हाउस के पत्रकार गांव की बदहाली की तस्वीर दिखाने के बजाय अपनी ही डुगडुगी बजाने में लगे हैं. जिससे गांव की जानकारी बाहर नहीं आ पाती और सरकार की योजना ग्रामीणों तक नहीं पहुंच पाती. सामाजिक संस्था का भी इस ओर ध्यान नहीं जाता.

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नशे की गिरफ्त में बर्बाद हो रहे ग्रामीण युवा

ईचा गांव में युवा सेना बहाली के लिए रोजाना दौड़ लगाने वाली युवा पीढ़ी अब नशे की गिरफ्त में हैं. न तो इनका ध्यान पढ़ाई की ओर है ना ही कारोबार की तरफ. पहले क्रिकेट फुटबॉल जैसे गेम खेलते युवा दिख भी जाते थे लेकिन नशे के आदि हो चुके इन युवाओं को न तो अपने करियर की चिंता है ना ही परिवार की. नशा खरीदने के लिए ये चोरी करने से भी गुरेज नहीं करते. गांव में प्रतिभा की कोई कमी नहीं रही है. यहां के मेहनतकश युवा विपरित परिस्थितियों में भी अपना घर बार चला रहे हैं.

गांव में रोजगार के साधन

ग्रामीणों का रोजगार मुख्यत: कृषि ही है. हालांकि गांव में सिंचाई की व्यवस्था नहीं है इसके बावजूद ग्रामीण कटहल, इमली, उड़द, रागी, बैर जैसे उपज से आमदनी करते हैं. गांव में कुछ लोग छोटा मोटा व्यवसाय भी करते हैं जिससे उनकी दाल रोटी चलती है. वहीं कुछ लोग दैनिक मजदूरी करते हैं. गांव में पानी की व्यवस्था नहीं होने की वजह से खेतों में हरियाली कम ही होती है लेकिन गांव के किसान मौसम के अनुसार धान, शकरकंद, मूंगफली की खेती करते हैं. गांव के एक घर में मधुमक्खी पालन भी हो रहा है.

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झोलाछाप डॉक्टर के सहारे स्वास्थ्य व्यवस्था

गांव में राजकीय मध्य विद्यालय के साथ एक स्वास्थ्य केन्द्र भी है लेकिन वहां न तो मेडकल स्टॉफ होते हैं ना ही डॉक्टर. गांव में कोई बीमार पड़ जाए तो उस मरीज के लिए झोलाछाप डॉक्टर ही मौजूद होते हैं ज्याद हुआ तो ओझा हैं ही जो बीमारी को झाड़ फूंक कर भगा देते हैं. गांव के लोग आज भी उसी जनप्रतिनिधि को वोट देते हैं जो हॉस्पिटल खोलने का वादा करते हैं.

ग्रामीणों को कुशल बनाने की जरूरत

ईचा गांव में खुशहाली तभी आएगी जब जनप्रतिनिधि गांव का दौरा कर यहां के परेशानियों से रूबरू होंगे. पत्रकार उनकी समस्या को सरकार तक पहुंचाएंगे इसके साथ ही सामाजिक सरोकार से जुड़े एनजीओ गांव में जाकर प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाना चाहिए और वहां के ग्रामीणों को मशरूम, रेशम, मधुमक्खी पालन के साथ पारंपरिक खेती हटकर कुछ सिखाया जाय जिससे उनका जीवनस्तर बेहतर हो सके.

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