Jamshedpur

चिड़ीदाग : आदिवासी समुदाय में गर्म सलाखों से नन्हे बच्चों का पेट दागने की अनोखी परंपरा

टुसू पर्व के दूसरे होता है आयोजन, मान्यता है कि पेट की बीमारी से मिलता है छुटकारा

Ashok Kumar

Jamshedpur : झारखंड के कोल्हान प्रमंडल के कई इलाकों में आदिवासी समुदायों में टुसू पर्व के ठीक दूसरे दिन चिड़ी दाग की परंपरा है. चिड़ी दाग में पांच साल तक के बच्चों को पेट को गर्म सलाखों से दागने का काम किया जाता है. ऐसा करते समय छोटे बच्चे दर्द से खूब रोते और चिल्लाते हैं, लेकिन समाज के लोग परंपरा के नाम पर इस रस्म को आज तक निभाते आ रहे हैं. चिड़ी दाग में ओझा बच्चे की नाभि को चारों तरफ गर्म लोहे से दागता है. पेट को दागने के पहले उसपर सरसों का तेल लगाया जाता है.

परिवार के लोग पकड़ लेते हैं हाथ-पैर

चिड़ी दाग के लिए परिवार के जो लोग भी अपने छोटे बच्चे को लेकर पहुंचते  हैं. वे बच्चे का हाथ और पैर जोर से पकड़ लेते हैं. इस बीच बच्चा खूब छटपटाता और चीखता-चिल्लाता  है, लेकिन प्राचीन काल से इस अनोखी परंपरा को समाज के लोग निभाते चले आ रहे हैं.

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पेट की बीमारी ठीक होने की है मान्यता

चिड़ी दाग परंपरा के पीछे के बारे में बताया जाता है कि ऐसा करने से बच्चों को पेट की तकलीफ नहीं होती है. पेट की बीमारी भी उन्हें नहीं छू पाती है. आधुनिक युग में आज भी झारखंड के कई गांवों में यह परंपरा विद्वमान है.

लकड़ी जलाकर लोहे को करते हैं गर्म

चिड़ी दाग परंपरा को निभाने के लिए लकड़ी जलाकर लोहे को गर्म किया जाता है. जब वह पूरी तरह  से गर्म हो जाता है, तब उसे बाहर निकालकर ओझा बच्चे के  पेट को चार बार दागता है. दागने के बाद बच्चे के सिर पर ओझा अपना हाथ फेरता है और परिवार के लोग बच्चे को लेकर अपने घर पर चले जाते हैं.

कड़ाके की ठंड में हुआ चिड़ी दाग

शनिवार की बात करें तो सुबह के समय कड़ाके की ठंड पड़ रही थी और बच्चे को लेकर लोग करनडीह के बोदरा टोला की तरफ जा रहे थे. वहां पर छोटू सरदार ओझा हैं और उनकी ओर से ही चिड़ी दाग परंपरा निभाई जा रही थी. छोटू का कहना है कि यह विरासत उन्हें अपने बुजुर्गों से मिली है.

कहां-कहां होता है आयोजन

पूर्वी सिंहभूम जिले के करनडीह के बोदरा टोला, बागबेड़ा के सोमाय झोपड़ी, पोटका, चाईबासा से सटे ओड़िशा क्योंझर जिले के पांडापाड़ा, पश्चिमी सिंहभूम, सरायकेला-खरसावां के अलावा कई जिले में शनिवार को चिड़ी दाग का आयोजन किया गया. इसमें गांव के लोग अपने बच्चे के लोग ओझा के पास गये और परंपरा का निर्वहन किया.

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