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केसीआर : कांग्रेस के साधारण कार्यकर्ता से तेलंगाना गौरव की पहचान बनने का सफर

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Hyderabad : कांग्रेस के साधारण कार्यकर्ता के रूप में लगभग गुमनामी में सियासी सफर की शुरूआत से तेलंगाना गौरव का चेहरा बनने तक के. चंद्रशेखर राव ने राजनीति की तेज लहरों पर बड़े सधे अंदाज में अपनी चुनावी नैया पार की है. उन्होंने कांग्रेस को झुकने पर मजबूर करके अलग तेलंगाना राज्य के गठन में सफलता भी हासिल की. अलग तेलंगाना राज्य के दशकों पुराने एकमात्र स्वप्न को साकार करने के लिए बनी तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस) की मंगलवार को घोषित परिणामों में जबरदस्त जीत के बाद केसीआर के नाम से लोकप्रिय के. चंद्रशेखर राव (64) ने देश के सबसे नये राज्य का सबसे ऊंचे कद वाला नेता होने का अपना दावा बरकरार रखा है.

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जून 2014 में तेलंगाना के गठन के बाद से हुए पहले विधानसभा चुनाव में मिली यह सफलता उनके लिए राष्ट्रीय राजनीति में बड़ी भूमिका निभाने की उनकी आकांक्षा को मूर्त रूप देने में अत्यंत महत्वपूर्ण साबित हो सकती है. उन पर अकसर परिवार का शासन चलाने और भाई-भतीजावाद को बढ़ावा देने के आरोप लगते रहे हैं. कार्यवाहक मुख्यमंत्री राव के बेटे के टी रामाराव उनकी सरकार में मंत्री रहे. वहीं बेटी के. कविता निजामाबाद से लोकसभा सदस्य हैं. राव के भतीजे हरीश राव भी राज्य की कार्यवाहक सरकार में मंत्री हैं.

विस भंग करने के राव के फैसले को मास्टरस्ट्रोक के रूप देखा गया 

गैर-भाजपा और गैर-कांग्रेस मोर्चे के हिमायती रहे केसीआर की यह सफलता क्षेत्रीय क्षत्रप के रूप में उनकी ताकत को और मजबूती प्रदान करेगी. तेलंगाना विधानसभा का कार्यकाल समाप्त होने से करीब सात महीने पहले ही सितंबर में विधानसभा भंग करने के राव के फैसले को मास्टरस्ट्रोक के रूप में देखा जा रहा है. उन्हें लगता था कि लोकसभा चुनावों के साथ राज्य विधानसभा चुनाव होने पर राष्ट्रीय मुद्दे राज्य के मुद्दों पर हावी हो सकते हैं. उन्होंने विधानसभा भंग करने की सिफारिश करने के कुछ ही घंटे के भीतर 119 सदस्यीय विधानसभा के लिए 105 उम्मीदवारों के नाम का ऐलान कर दिया था.  तभी से टीआरएस के उम्मीदवार मैदान में उतर गये और उनकी मेहनत रंग लाई.

‘तेलंगाना गौरव’ के मुद्दे को जीवंत रखा

टीआरएस अध्यक्ष ने आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन चंद्रबाबू नायडू पर लगातार निशाना साध कर ‘तेलंगाना गौरव’ के मुद्दे को जीवंत रखा. उन्होंने नायडू पर तेलंगाना का विकास बाधित करने का आरोप लगाते हुए उन्हें बाहरी नेता की संज्ञा भी दी. इसके अलावा वह बार-बार अपनी सरकार की कल्याणकारी योजनाओं का उल्लेख करते रहे. खुद को मेडक जिले के चिंतामडाका गांव का किसान बताने वाले राव की संपत्ति पिछले करीब चार साल में 41 प्रतिशत बढ़कर 22.6 करोड़ रुपये पहुंच गयी है.

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2001 में तेदेपा छोड़ और टीआरएस का गठन

युवा कांग्रेस के साधारण कार्यकर्ता के रूप में राजनीतिक करियर की शुरूआत करने वाले राव ने 1983 में तेलुगू देशम पार्टी का दामन थामा. वह पहले ही चुनाव में सिद्दीपेट सीट पर कांग्रेस उम्मीदवार से हार गये. केसीआर 1985 में इस सीट पर चुनाव जीत गये और उसके बाद से उनका सफर सफलता के पथ पर आगे बढ़ता रहा. वह एनटी रामाराव सरकार में मंत्री भी रहे. वह आंध्र प्रदेश विधानसभा के उपाध्यक्ष की जिम्मेदारी भी निभा चुके हैं. अलग तेलंगाना राज्य का उनका सपना उन्होंने कभी नहीं छोड़ा. 2001 में उन्होंने तेदेपा छोड़ दी और टीआरएस का गठन किया.

2009 के लोकसभा चुनाव तेदेपा के साथ मिलकर लड़े

उन्होंने कांग्रेस के साथ हाथ मिलाया और 2004 के लोकसभा चुनाव उसके साथ गठबंधन में लड़े. कांग्रेस ने तेलंगाना को राज्य बनवाने का वादा किया था. बाद में कांग्रेस पर इस मुद्दे पर गंभीर नहीं होने का आरोप लगाते हुए उन्होंने गठबंधन छोड़ दिया. राव ने 2009 के लोकसभा चुनाव तेदेपा के साथ मिलकर लड़े. विभिन्न राजनीतिक घटनाक्रम से गुजरते हुए राव ने अलग तेलंगाना राज्य के लिए आमरण अनशन शुरू कर दिया. तत्कालीन केंद्रीय गृह मंत्री पी चिदंबरम ने नौ दिसंबर, 2009 को घोषणा की, कि तेलंगाना के गठन के लिए कदम उठाये जाएंगे. इसके बाद राव ने 11 दिन तक चले अपने अनशन को समाप्त कर दिया. लंबे संघर्ष के बाद आखिरकार वह अलग तेलंगाना राज्य बनवाने में सफल रहे और राज्य के पहले मुख्यमंत्री बने.

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