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370 हटाने पर बोले कश्मीरी : हमें बंदी बनाकर, सिर पर बंदूक तानकर आवाज घोंटकर मुंह में जबरन कुछ ठूंसने जैसा है

बंदूक के साये में  जी रहे हैं कश्मीरी - ज्यां द्रेज़

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Pravin Kumar

Ranchi:  कश्मीर से वापस लौटकर आये अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज़ और अन्य तीन जाने माने सामाजिक कार्यकताओं ने दावा किया है कि कश्मीर की हालत बेहद गंभीर है. अपने दौरे के दौरान कश्मीरियों के साथ बातचीत में धारा 370 और 35ए को हटाये जाने को जम्मू और कश्मीर के साथ किये गये संवैधानिक वायदे और वहां की जन भावनाओं के साथ विश्वासघात कहा जा रहा है. लोग बंदूक के साये में जी रहे हैं और उनकी नाराजगी चिंताजनक हो गयी है.

न्यूज विंग से फोन पर बात करते हुए ज्यां द्रेज़ के साथ कश्मीर से लौटे कविता कृष्णन, मैमूना मोल्ला और विमल भाई ने कश्मीर के हालात पर आंखों देखी बयां की.

इस बातचीत के कुछ अंश इस खबर के माध्यम से प्रस्तुत किया जा रहा है. ज्यां द्रेज़ ने कहा की हमने जिन लोगों से भी बात की है, उनकी तस्वीर और नाम सुरक्षा के लिहाज से जाहिर नहीं कर रहे हैं.

ज्यां द्रेज़ ने बताया कि हम 9 अगस्त को श्रीनगर पहुंचे, तो हमने देखा कि शहर कर्फ्यू की वजह से  खामोश है और उजाड़ जैसा दिख रहा है, भारतीय सेना और अर्द्धसैनिक बलों से भरा पड़ा है. हर ओर कर्फ्यू था और यह 5 अगस्त से लागू था.

श्रीनगर की गलियां सूनी थीं और शहर की सभी संस्थायें बंद थीं. बस कुछ एटीएम, दवा की दुकानें और पुलिस स्टेशन खुले हुए थे. लोग अकेले या दो लोग इधर-उधर जा रहे थे, लेकिन कोई समूह में नहीं चल रहा था.

भारतीय मीडिया केवल श्रीनगर के छोटे से इलाके में ही अपने को सीमित रखता है. उस छोटे से इलाके में बीच-बीच में हालात सामान्य जैसे दिखते हैं.

ज्यां द्रेज़  ने बताया कि इसी आधार पर भारतीय मीडिया यह दावा कर रही है कि कश्मीर में हालात सामान्य हो गये हैं. लेकिन इसका सच्चाई से कोई मेल नहीं है.

हमने श्रीनगर शहर और कश्मीर के गांवों व छोटे कस्बों में पांच दिन तक सैकड़ों लोगों से बातचीत करते हुए ही बिताये. हमने घाटी में रहने वाले कश्मीरी पंडितों, सिखों और कश्मीरी मुसलमानों से भी बातचीत की.

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हर जगह लोग गर्मजोशी से मिले. यहां तक कि जो लोग बहुत गुस्से में थे और हमारे मकसद के बारे में आशंकित थे, उनकी गर्मजोशी में भी कोई कमी नहीं थी. भारत सरकार के प्रति दर्द, गुस्सा और विश्वासघात की बात करने वाले लोगों ने भी गर्मजोशी और मेहमाननवाजी में कोई कसर नहीं छोड़ी.

इससे आगे ज्यां द्रेज़ ने बताया कि कश्मीर मामलों के भाजपा प्रवक्ता के अलावा हम एक भी ऐसे व्यक्ति से नहीं मिले, जिसने अनुच्छेद 370 को खत्म करने के भारत सरकार के फैसले का समर्थन किया हो. ज्यादातर लोग अनुच्छेद 370 और 35 ए को हटाने के निर्णय और हटाने के तरीके को लेकर बेहद गुस्से में थे.

कई लोगों ने तो हमें यहां तक बताया कि देर-सबेर (जब पाबंदियां हटा ली जायेंगी या ईद के बाद या हो सकता है 15 अगस्त के बाद) बड़े विरोध-प्रदर्शनों की शुरुआत होगी. लोगों को शांतिपूर्ण प्रदर्शनों पर भी दमन और हिंसा की आशंका है.

जम्मू कश्मीर के लोगों की प्रतिक्रिया

इससे आगे न्यूज विंग को ज्यां द्रेज़ ने बताया कि, जब हमारा हवाई जहाज श्रीनगर में उतरा और यात्रियों को बताया गया के वे अपने मोबाइल फोन चालू कर सकते हैं तो सारे ही यात्री (इनमें ज्यादातर कश्मीरी थे) मजाक उड़ाते हुए हंस पड़े.

लोग कह रहे थे कि ”क्या मजाक है”. 5 अगस्त से ही मोबाइल और लैंड लाइन सेवाओं को बंद कर दिया गया था.

सफकदल (डाउन टाउन, श्रीनगर) में एक शख्स ने कहा कि ”सरकार ने हम कश्मीरियों के साथ गुलामों जैसा बर्ताव किया है. हमें कैद करके हमारी जिंदगी और भविष्य के बारे में फैसला कर लिया है. यह हमें बंदी बनाकर, हमारे सिर पर बंदूक तानकर और हमारी आवाज घोंटकर मुंह में जबरन कुछ ठूंस देने जैसा है.

कश्मीरी भारतीय मीडिया से भी नाराज हैं

भारतीय मीडिया के बारे में चारों तरफ नाराजगी है. लोग अपने घरों में कैद हैं, वे एक दूसरे से बात नहीं कर सकते, वे सोशल मीडिया पर अपनी बात नहीं रख सकते और किसी भी तरह अपनी आवाज नहीं उठा सकते.

वे अपने घरों में भारतीय टीवी चैनल देख रहे हैं, जिनमें दावा किया जा रहा है कि कश्मीर भारत सरकार के फैसले का स्वागत करता है. वे अपनी आवाज मिटा दिये जाने के खिलाफ गुस्से से खौल रहे हैं.

एक नौजवान ने कहा कि ”किसकी शादी है और कौन नाच रहा है?  यदि यह निर्णय हमारे फायदे और विकास के लिए है तो हमसे क्यों नहीं पूछा जा रहा है कि हम इसके बारे में क्या सोचते हैं?”

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अनुच्छेद 370 के खत्म होने पर प्रतिक्रिया  

अनंतनाग जिले के गौरी गांव के रहने वाले एक शख्स ने कहा कि ”हमारा उनसे रिश्ता अनुच्छेद 370 और 35 ए से था.अब उन्होंने अपने ही पैर पर कुल्हाड़ी मार दी है.

अब तो हम आजाद हो गये हैं.” वहां इन बातों को कहने से पहले इसी व्यक्ति ने नारा लगाया कि ‘हमें चाहिए आजादी’ और उसके बाद दूसरा नारा लगाया ‘अनुच्छेद 370 और 35 ए को बहाल करो.” 

वहीं बातामालू के एक शख्स ने कहा कि ”जो इंडिया के गीत गाते हैं, अपने बंदे हैं, वे भी बंद हैं.”  वहीं एक कश्मीरी पत्रकार ने भी इसपर कहा कि ”मुख्यधारा की पार्टियों से जैसा बर्ताव किया जा रहा है उससे बहुत से लोग खुश हैं. ये पार्टियां भारत की तरफदारी करती हैं और अब जलील हो रही हैं.”

”हालात सामान्य” हैं – या कब्रिस्तान जैसी शांति है?

क्या कश्मीर के हालात सामान्य और शांतिपूर्ण हैं? जैसा कि बताया जा रहा है. नहीं  बिल्कुल नहीं. ये बातें सोपोर में एक नौजवान ने ज्यां द्रेज़ से कही. उसने बताया कि, ”यह बन्दूक की नोंक पर खामोशी है, कब्रिस्तान की खामोशी”.

साथ ही उस नौजवान ने कहा कि कश्मीर के ताजा हालात पर, वहां के समाचार पत्र ग्रेटर कश्मीर के फ्रंट पेज पर कुछ खबरें छपीं थीं और पिछले पन्ने पर खेल संबंधी खबरें, बीच के सभी पेजों पर शादियां और अन्य समारोहों को स्थगित कर देने की सूचनाओं से भरे हुए थे.

वहीं जब ज्यां द्रेज़ उस इलाके से आगे बढ़े तो उन्होंने देखा कि अनंतनाग, शोपियां और पम्पोर (दक्षिण कश्मीर) में हमें केवल बहुत छोटे बच्चे ही ईद के मौके पर उत्सवी कपड़े पहने दिखे. ऐसा लगा कि मानों बाकी सभी लोग शोक मना रहे हों. अनंतनाग के गुरी में एक महिला ने कहा कि ”हमें ऐसा लग रहा है, जैसे कि हम जेल में हैं”.

”पिछले सात दिनों से हम अपने घरों में कैद थे  और मेरे गांव लांगट में आज भी दुकानें बंद हैं इसलिए ईद की खरीदारी करने सोपोर शहर आयी हूं और यहां मेरी बेटी नर्सिंग की छात्रा है, उसकी कुशल क्षेम भी ले लूंगी”

विरोध, दमन और बर्बरता

9 अगस्त को श्रीनगर के शौरा में करीब 10000 लोग विरोध करने के लिए जमा हुए. सैन्य बलों द्वारा उनपर पैलट गन से फायर किया गया. जिसमें कई घायल हुए. हमने 10 अगस्त को शौरा जाने की कोशिश की, लेकिन सीआरपीएफ के बैरिकेड पर रोक दिया गया. उस दिन भी हमें बहुत से युवा प्रदर्शनकारी सड़क पर रास्ता जाम किये दिखाई दिये.

कम से कम 600 राजनीतिक दलों के नेता और सामाजिक कार्यकर्ता गिरफ्तार किये जा चुके हैं. इस बात की कोई जानकारी हमें नहीं है कि किन धाराओं या अपराधों में वे गिरफ्तार हैं और उन्हें कहां ले जाकर बंद किया गया है.

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मीडिया पर पाबंदी  

ज्या द्रेज़ ने बताया कि एक पत्रकार ने हमें बताया कि इतना कुछ होने के बाद भी अखबार छप रहे हैं. इंटरनेट न होने से एजेंसियों से समाचार नहीं मिल पा रहे हैं और हम एनडीटीवी से देखकर जम्मू और कश्मीर के बारे में संसद में होने वाली गतिविधियों को रिपोर्ट करने तक सीमित रह गये हैं. यह अघोषित सेंसरशिप है. अगर सरकार पुलिस को इंटरनेट और फोन की सुविधा दे सकती है और मीडिया को नहीं तो इसका और क्या मतलब हो सकता है ?”

कश्मीरी टीवी चैनल पूरी तरह से बंद हैं

कश्मीरी समाचार पत्र जो वहां के विरोध प्रदर्शनों की थोड़ी सी भी जानकारी देते हैं, जैसा कि शौरा की घटना के बारे में हुआ, तो उन्हें प्रशासन की नाराजगी का शिकार होना पड़ रहा है.

टीम ने महसूस किया

साथ ही ज्यां द्रेज़ की टीम ने ये महसूस किया कि अनुच्छेद 370 और अनुच्छेद 35ए खत्म करने के भारत सरकार के निर्णय और जिस तरीके से ये निर्णय लिया गया उसके खिलाफ कश्मीर में गहरा असंतोष एवं गुस्सा व्याप्त है.

इस असंतोष को दबाने के लिए सरकार ने कश्मीर में कर्फ्यू जैसे हालत बना दिये हैं. थोड़े से एटीएम, कुछ कैमिस्ट की दुकानों और पुलिस थानों के अलावा कश्मीर पूरी तरह से बंद है. जनजीवन पर पाबंदियां और कर्फ्यू जैसे हालात से कश्मीर का आर्थिक जीवन भी चरमरा गया है.

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