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The Kashmir Files – Movie Analysis : एक बार फिर दोराहे पर खड़ा है सच

Sanjay Prasad

फिल्म कश्मीर फाइल्स थिएटर से निकल सोशल मीडिया के जरिए सियासत तक जा पहुंची है. बीजेपी संसदीय दल की बैठक में चर्चा का विषय रही इस फिल्म को देश के कई भाजपा शासित प्रदेशों ने टैक्स फ्री भी कर दिया है. कश्मीरी पंडितों पर हुए अत्याचार और उनके पलायन की त्रासदी कहती इस फिल्म को लेकर सच एक बार फिर दोराहे पर खड़ा है. सोशल मीडिया पर इस फिल्म को देखने और नहीं देखने को लेकर मुहिम तक चल पड़ी है. एक पक्ष कश्मीर के सच को इतने साल तक दबाये रखने का आरोप लगा रहा है, तो दूसरा सच के साथ छेड़छाड़ करने और इसे सांप्रदायिक रंग देने की बात कर रहा है. इस फिल्म के कुछ विरोधी, समर्थकों को 2002 के गोधरा कांड पर फिल्म बनाने तक की नसीहत तक दे रहे हैं. यही नहीं, फिल्म के कथ्य और तथ्य के बीच एक पक्ष कश्मीर पर प्रकाशित कई पुस्तकों के पढ़ने की सलाह तक दे रहा है. इतना ही नहीं, फिल्म के निर्देशक विवेक अग्निहोत्री और अभिनेता अनुपम खेर के सोशल मीडिया पोस्ट बॉलीवुड के चेहरे को भी बेनकाब कर रहे हैं, जो अभी तक दर्शकों को कश्मीर के सच से बरगलाते रहे हैं. खैर, इस बहस का नतीजा यह है कि फिल्म खूब पब्लिसिटी बटोर रही है और इसे देखने के लिए सिनेमाघरों में भीड़ उमड़ रही है.

आखिर क्या है फिल्म में

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फिल्म 1990 के कश्मीर के हालात को दर्शाती है, जब कश्मीर आतंकवाद की आगोश में था. फिल्म पलायन के आसपास की घटनाओं को “नरसंहार” के रूप में चित्रित करती है, जिसमें हजारों कश्मीरी हिंदुओं का नरसंहार किया गया था, महिलाओं के साथ बलात्कार किया गया था और बच्चों को गोली मार दी गई थी. विस्थापित परिवारों को आज तक शरणार्थी के रूप में जीवित दिखाया गया है. ‘ कश्मीर फाइल्स  विवेक अग्निहोत्री द्वारा लिखित और निर्देशित सच्ची घटनाओं पर आधारित है. यह फिल्म कश्मीर विद्रोह के दौरान कश्मीरी मुसलमानों द्वारा कश्मीरी पंडितों के नरसंहार का चित्रण है. यह फिल्म पहले 26 जनवरी 2022 को रिलीज़ होने वाली थी लेकिन कोरोना वायरस और ओमिक्रोन की वजह से 11 मार्च 2022 को रिलीज़ हुई है. इसके कलाकारों में अनुपम खेर, दर्शन कुमार, मिथुन चक्रवर्ती, पल्लवी जोशी, भाषा सुंबली, चिन्मय मांडलेकर, पुनीत इस्सर, प्रकाश बेलावड़ी, अतुल श्रीवास्तव हैं.

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क्या फिल्मकार को आजादी है सच के साथ छेड़छाड़ करने की

ऐसी बात नहीं है कि किसी वास्तविक घटना पर आधारित यह पहली फिल्म है. इसके पहले भी वास्तविक घटनाओं पर आधारित कई फिल्में बनी हैं. जब कोई फिल्मकार ऐसे विषय पर फिल्म बनाता है, तो उसके सामने दो मुख्य चुनौतियां होती हैं. पहली कि वह वास्तविक घटना को सिनेमाई रंग दिये बगैर उसे सच के कितना करीब रख पाता है? दूसरी पेशेवर चुनौती होती है. हर फिल्मकार चाहता है कि उसकी फिल्में चली और प्रॉफिट मेकिंग हो. ऐसे में कई बार फिल्मकार वास्तविक विषय के साथ भी छेड़छाड़ करते हैं और उसे सिनेमाई रंग देने की कोशिश करते हैं ताकि दर्शकों को फिल्म बोझिल नहीं लगे. किसी वास्तविक घटना को सिनेमाई रंग देने पर फिल्मकारों और संचार विशेषज्ञों के बीच लंबे समय से बहस रही है कि क्या वास्तविक घटना के साथ छेड़छाड़ किया जा सकता है? इस पर अधिकतर फिल्मकारों का मानना है कि फिल्म एक कला है. ऐसे में फिल्मकार को यह क्रिएटिव फ्रीडम है कि वह अपनी जरूरत के हिसाब से फिल्म में प्रयोग करें. लेकिन जब फिल्म का विषय कश्मीर जैसा संवेदनशील मुद्दा हो, तो फिल्मकार की जिम्मेवारी बढ़ जाती है कि वह विषय को ऐसे पेश नहीं करें, जिससे समाज में गलत संदेश जाय और अनरेस्ट होने की संभावना बढ़े.

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