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कर्नाटक संकटः कथित “अंतरआत्मा” के जगने के जगजाहिर “रहस्य”

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Faisal Anurag

लोकसभ चुनाव परिणाम के बाद से ज्यादातर विपक्षी दलों और सरकारों का संकट गहरा गया है. पहला गंभीर संकट कर्नाटक का है. कांग्रेस जनता दल सेकुलर की गंठबंधन सरकार, जो अपने गठन के समय से ही  भारतीय जनता पार्टी के निशाने पर रही है, 13 विधायकों की कथित अंतरआत्मा की पुकार का गंभीर शिकार हुई है.

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इससे कर्नाटक सरकार का पतन तय दिख रहा है. कांग्रेस, जदयू और निर्दलीय विधायकों की बगावत कितनी स्वभाविक है और कितनी प्रायोजित, यह भी स्पष्ट है. भारत के लोकतांत्रिक सरकारों के इतिहास का यह दौर राजनीतिक पार्टी में भारी पूंजीनिवेश और उसके अनैतिक प्रयोग का खतरा झेल रहा है. बातें की जाती हैं कि लोकतंत्र बिना विपक्ष के कारगर नहीं हो सकता लेकिन विपक्ष पर राजनीतिक बुलडोजर चलाने के तमाम उपक्रम बताते हैं कि लोकतंत्र गंभीर बीमारी के लक्षण से ग्रस्त है.

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बड़े पैमाने पर दलबदल की घटनाएं पहले भी हुई हैं. लेकिन अब देखा जा रहा है कि भारत ने आया राम और गया राम तथा भजन लाल के दलबदल को भी देखा है. लेकिन नई परिघटना यह है कि राजनीतिक फैसले मैन्युफैक्चर करने के लिए दलबदल का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया जा रहा हे. झारखंड में झाविमो के छह विधायकों का पाला बदल हो या गुजरात और कर्नाटक में इस्तीफा के माध्यम से बहुमत-मैन्युफैक्चर, भारतीय लोकतंत्र के नये दौर को बता रहा है.

अंतरआत्मा की आवाज सुनने वाले विधायकों का समूह मुंबई के लग्जरी होटल में ऐश-ओ-आराम के लिए यदि पहुंच जा रहे हैं तो इसके निहितार्थ साफ हैं. अदालतें और कानूनी प्रावधानों के साथ सीधा खिलवाड़ बता रहा है कि लोकतंत्र और जनादेश की कितनी कम परवाह इन नेताओं और इनको हवा देने वाले करते हैं.

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तो क्या मान लेना चाहिए कि भारत एकदलीय शासन की गिरफ्त में है. और लोकतंत्र की बहुलतावादी प्रवृति को खारिज किया जा चुका है. देश के बहुसंख्यक मतदाताओं का जिस तरह का मनोविज्ञान तैयार हुआ है, उसमें इस तरह की घटनाएं मायने नहीं रख रही हैं. लोकतंत्र का प्रहरी मीडिया भी सवाल उठाने की जगह नई  सरकार के स्वागत की पीठिका तैयार कर रहा है. विधानसभा चुनाव के बाद से गुजरात में कांग्रेस के विधायकों  से इस्तीफा कराना फिर उन्हें टिकट देना आम बात है. अब अल्पेश ठाकोर भी इस लाइन में हैं.

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अल्पेश बहुत बड़े नैतिक वायदों के साथ राजनीति में आये लेकिन दो साल भी उनकी नैतिकता नहीं चली. अल्पेश ठाकोर ने उस भीड़ को उकसाया था जिसने कुछ समय पहले ही हिंदी इलाकों के लोगों के साथ मारपीट कर गुजरात से खदेड़ा था. तब उनके खिलाफ कोई सख्त कार्रवाई नहीं की गयी थी. और अब वे भाजपा के दरवाजे पर प्रवेश के लिए खड़े हैं.

यदुरप्पा की हड़बड़ी में बनी सरकार जब समर्थन नहीं जुटा पायी तो कुमारस्वामी सरकार के बनते ही उसे गिराने की साजिश की जाने लगी. तरीका यह खोजा गया कि विधायकों का इस्तीफा करा दिया जाये. पहले भी तीन विधायकों का इस्तीफा कराया गया. लोकसभा चुनाव में कर्नाटक में भाजपा को मिली बड़ी कामयाबी के बाद कमजोर दिखने वाले विधायकों को पाला में लाने का आसान रास्ता तय कर लिया गया और कुमारस्वामी की विदेश यात्रा के बीच विधायकों के इस्तीफे करा दिये गये. कांग्रेस के कुछ विक्षुब्ध नेता भी कुमारस्वामी सरकार को गिराने की साजिश में लगे हुए हैं. सिद्धरमैया जैसे नेताओं की भूमिका भी संदिग्ध है.

लोकसभा चुनाव की नाकामयाबी के बाद से कांग्रेस के अनेक नेता सुरक्षित भविष्य के लिए बेहद परेशान हैं. राहुल गांधी के कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफे के बाद कांग्रेस की दिशाहीनता के कारण के कारण इस तरह के नेताओं की परेशानी दुगनी हो गयी है. राजनीति में तात्कालिक शरणस्थली की तलाश तेजी से की जा रही है.

और भाजपा उन्हें प्रश्रय भी दे रही है. 2014 में भी भाजपा ने कांग्रेस के अनेक नेताओं को अपने पाले में लाकर टिकट दिया था और इस सिलसिले को बरकार रखा गया है. कांग्रेस पर एक तरफ भाजपा नेतृत्व इतिहास के गलत उदाहरणों से हमला कर उसे कमजोर करने का अभियान चला रहा है, वहीं उसके सहयोगी ओर उसके नेताओं को पाले में लाने की कोशिश सुनियरोजित तरीके से की जा रही है. कांग्रेस के नेताओं को इस हालात की गंभीरता को समझते हुए नेतृत्व के मसले को हल करने की जरूरत है. लेकिन उनकी देरी हालात को गंभीर और पेचीदा भी बना रही है.

कर्नाटक के पहले भी पूर्वोत्तर के कई राज्यों और गोवा में किये गये प्रयोगों को दुहराया जा रहा है. एकदलीय शासन की खतरनाक होती प्रवृति लोकतंत्र के भविष्य को ले कर भी अनेक तरह का संकेत दे रही है. एक तरफ पांच ट्रिलियन की इकोनॉमी के नारे से वाटरों के अरमानों को संतुष्ट काने का प्रयास जारी है वहीं दूसरी ओर विपक्षी सरकारों को सत्ता से हटाने के लिए इस तरह के कई प्रयोग अंजाम में लाये जा रहे हैं.

विपक्षी दलों के लिए यह सावधान होने का अंतिम समय है. उन्हें अपने कमजोर नेताओं को लेकर ठोस  रणनीति को अंजाम देना चाहिए. मैन्युफैक्चर्ड जनादेश पाने की प्रक्रिया के संकट को कम करके नहीं आंका जाना चाहिये.

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