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करमा पर्व गुरुवार को, अखाड़ों में की जायेगी पूजा

Ranchi :  बहन-भाई के प्यार का प्रतीक करमा पर्व गुरुवार को मनाया जायेगा. राजधानी के विभिन्न अखाड़ों में इसे लेकर तैयारी चल रही है. वर्तमान में कई ऐसे लोग हैं, जो करमा को प्रकृति पर्व के रूप में मनाते हैं, लेकिन वास्तव में यह भाई-बहन के प्रेम के साथ भाईचारा और आपसी सौहार्द का त्योहार है, जो पूरे झारखंड में हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है. करमा पर्व के सात दिन पूर्व युवतियां बालू और मिट्टी को टोकरी में भरकर जावा रोपती हैं. इसे पाहन के घर में रखा जाता है और रोज सुबह-शाम पानी देकर सींचा जाता है. ऐसी मान्यता है कि जावा की उगाई अच्छी होने से घर, गांव, राज्य में खुशहाली आती है. भादो एकादशी के दिन होनेवाले करमा महोत्सव को काफी शुभ माना जाता है.

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पाहन कराते हैं मुख्य पूजा

इस दिन युवतियां अपने भाइयों की सलामती के लिए दिनभर निर्जला उपवास करती हैं. अपराह्न बाद युवतियां पारंपरिक नृत्य करते हुए करमा डाल का स्वागत करती हैं, जिसे कंधे में ले युवक अखड़ा स्थल पर रखते हैं, जिसके बाद पाहन द्वारा पूजा की जाती है. पूजा के दौरान अखड़ा में रंगुवा, चरका और माला मुर्गों को अनाज खिलाया जाता है. ऐसा माना जाता है कि मुर्गों द्वारा अनाज पूरा खा लेना ग्राम देवता की खुशहाली का प्रतीक है, जबकि मुर्गे अगर अनाज नहीं खाते हैं, तो इसे ग्राम देवता की नाराजगी का प्रतीक माना जाता है. इसके बाद इन मुर्गों की बलि अखड़ा स्थल पर दी जाती है. बलि दिये हुए मुर्गे को पाहन और उनके सहयोगी खाते हैं. चडरी सरना समिति में जग्गू पाहन, तो वहीं करमटोली में जगलाल पाहन पूजा करायेंगे.

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करम और धरम भाइयों की कहानी

करमा की कहानी बताते हुए चडरी सरना समिति के केंद्रीय अध्यक्ष रवि मुंडा ने बताया कि करमा दो भाइयों करम और धरम की कहानी है कि कैसे सरना मां के आशीर्वाद से उन्होंने गांव में शांति-खुशहाली स्थापित की. करम और धरम के पिता दो भाई थे, जिनमें से करम और धरम के पिता शहर में काम करने चले जाते हैं, लेकिन शहर में अधिक पैसा कमाने और शहरी परिवेश के कारण उनकी मानसिकता गांवों के प्रति बदल जाती है. जब वह गांव लौटकर आते हैं, तो सभी को घृणा की दृष्टि से देखते थे. अपने घमंड में आकर उनका नाश होने लगा और नौबत ऐसी आ गयी कि उनकी सारी संपत्ति देखते ही देखते खत्म हो गयी. ऐसे में एक दिन करम वृक्ष के नीचे बैठकर वह अपने आपको कोस रहे थे कि तभी उन्हें सरना मां दर्शन देती हैं और भादो एकादशी के दिन करमा पर्व मानने की बात कहती हैं. पर्व करते हुए ही उन्हें करम और धरम दो पुत्रों की प्राप्ति हुई, जिनके कारण उनके पिता और गांव का उत्थान हुआ.

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इन अखाड़ों में होगी पूजा

करमा के दिन विभिन्न अखाड़ों में सामूहिक पूजा की जाती है. इसमें चडरी सरना समिति, करमटोली सरना समिति, नगड़ाटोली, बरियातू, कोकर सरना टोली, मघुकम सरना स्थल आदि में पूजा की जायेगी. उसी तरह विभिन्न हॉस्टलों में भी करमा पूजा का आयोजन किया जायेगा.

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