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गांव के लोक मुहावरे और कहानियों से लोगों को परिचित करा रही हैं ज्योति

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Chhaya

Ranchi:  इंसान की चाह ही उसे शोहरत दिलाती है. जहां एक ओर समाज आधुनिकता के प्रभाव में आकर अपनी सभ्यता संस्कृति से बिछड़ती जा रही है.

वहीं दूसरी ओर कुछ लोग हैं जो इसी सभ्यता और संस्कृति को लोगों के बीच फिर से जीवित करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं.

कुछ ऐसा ही कर रही हैं चाईबासा की रहनेवाली ज्योति बाला लामय. जो कॉलेज के दिनों से ही आदिवासी सभ्यता संस्कृति को बचाने के लिए काम कर रही हैं. फिलहाल वे झारखंड स्पेस एप्लिकेशन सेंटर में कार्यरत हैं.

लेकिन अपने काम के बीच से ही समय निकाल कर यें गांवों और कस्बों में हो जनजाति की लुप्त होती संस्कृति की जानकारी देती हैं.

खुद ज्योति ने बताया कि कॉलेज की पढ़ाई करते हुए इन्हें जानकारी हुई कि झारखंड की जनजातिय पंरपरा कितनी समृद्ध है. इसके हर अनुष्ठान के अपने महत्व हैं. लेकिन लोग इन सबसे दूर भाग रहे हैं.

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ग्रामीणों को सिखाती हैं पुरानी परंपराएं

अपने काम के बारे में बताते हुए ज्योति ने कहा कि पहले गांव कस्बों में लोग अपने घर-आंगन में ही मधुमक्खी पालन करते थे.

लेकिन अब लोग बाजार में मिलने वाले शहद से काम चलाते हैं. जबकि गांवों में जो शहद बनते हैं, उनकी गुणवत्ता काफी अधिक होती है.

इसलिए ज्योति अपने खाली समय में अलग-अलग गांवों में जाकर ग्रामीणों विशेषकर महिलाओं और बच्चों को मधुमक्खी पालन सिखाती हैं.

ज्योति ने बताया कि कुछ ऐसे भी लोग हैं जो मधु पालन से ही अब अपनी जीविका चला रहे हैं. वहीं इससे मोम आदि बनाकर भी कुछ ग्रामीण लड़कियां जीविकोपार्जन कर रही है.

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लोक संस्कृति और मुहावरों से करा रही हैं परिचित

न सिर्फ जीविकोपार्जन बल्कि ये आदिवासी के बीच लुप्त होती जा रही हो मुहावरों को भी बच्चों को सिखाती हैं.

उन्होंने बताया कि गांवों से बड़ी संख्या में लोग शहर की ओर आ रहे हैं. कुछ अजीविका के लिए तो कुछ पढ़ने के लिए. लेकिन इन सबके बीच जो संस्कृति थी वो लुप्त होती जा रही है.

उन्होंने अपने बचपन का जिक्र करते हुए कहा कि दादी-नानी से हम तरह-तरह के मुहावरे और स्थानीय कहानियां सुना करते थे. लोग अब अपने बच्चों को ये सब नहीं सिखाते.

जबकि इन कहानियों और मुहावरों से भी सीख मिलती है. इसलिए ये इस क्षेत्र में भी काम करती हैं.

कॉलेज के दिनों से कर रही हैं कार्य

इन्होंने बताया कि जब यें कॉलेज के दिनों में छुट्टियों में घर जाया करती थी. तब शहरी और गांवों की संस्कृति में काफी अंतर देखती थी.

तब लगा कि अगर इस वक्त लोग अपनी संस्कृति से इतनी दूर भाग रहे हैं तो आने वाले समय में स्थिति और भी खराब होगी. गांवों तक में परंपराओं का निशान नहीं रहेगा.

इसलिए इन्होंने अकेले ही गांवों के लोगों के बीच इसे बचाने की पहल की है. ज्योति ने कहा कि बहुत सारे गांवों के लोग अब उनको पहचानने लगे हैं. वो भी इनके साथ मिलकर काम करती हैं.

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