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CBI विवाद में सेलेक्ट कमेटी का हिस्सा रहे जस्टिस सीकरी ने ठुकराया मोदी सरकार का प्रस्ताव

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NewDelhi: उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति ए के सीकरी को लंदन स्थित राष्ट्रमंडल सचिवालय मध्यस्थता न्यायाधिकरण (सीएसएटी) में सेवानिवृत्ति के बाद एक सरकारी प्रस्ताव मिलने पर रविवार को विवाद खड़ा हो गया. दरअसल जस्टिस सीकरी के इस प्रस्ताव के लिए अपना नाम वापस ले लिया है. हालांकि, पिछले महीने उन्होंने इस पद के लिए अपनी सहमति दी थी.

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माना जा रहा है कि सरकार ने पिछले साल के अंत में सीएसएटी के लिये उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश सीकरी के नाम की अनुशंसा की थी.
उल्लेखनीय है कि न्यायाधीश सीकरी, आलोक वर्मा पर निर्णय लेने के लिए बनी हाईपावर सेलेक्ट कमेटी में शामिल थे. और सिर्फ तीन दिन पहले उनके वोट से सीबीआई के निदेशक के पद से आलोक वर्मा को हटाने का फैसला किया गया.

राहुल गांधी ने साधा निशाना

जस्टिस सीकरी द्वारा अपना नाम वापस लिए जाने के बाद कांग्रेस इसे सीबीआई विवाद से जोड़कर देख रही है. और पूरे मामले पर सरकार से जवाब चाहती है.
एक मीडिया रिपोर्ट का हवाला देते हुए कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने ट्वीट कर कहा,जब इंसाफ के तराजू से छेड़छाड़ की जाती है तब अराजकता का राज हो जाता है. उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री राफेल घोटाले को दबाने के लिये कुछ भी करने से नहीं चूकेंगे, वह सबकुछ बर्बाद कर देंगे. वह डरे हुए हैं. यह उनका डर है जो उन्हें भ्रष्ट बना रहा है और प्रमुख संस्थानों को बर्बाद कर रहा है.

सरकार पर निशाना साधते हुए कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अहमद पटेल ने कहा कि सीएसएटी में सीकरी के नामांकन पर केंद्र को काफी बातों का जवाब देना होगा.

आलोक वर्मा मामले से नहीं सरोकार

सूत्रों ने कहा कि राष्ट्रमंडल न्यायाधिकरण के पद के लिये सीकरी की सहमति मौखिक रूप से ली गई थी. न्यायमूर्ति सीकरी को छह मार्च को सेवानिवृत्त होना है.
प्रधान न्यायाधीश के बाद देश के दूसरे सबसे वरिष्ठ न्यायाधीश के एक करीबी सूत्र ने पीटीआई को बताया कि न्यायाधीश ने रविवार शाम को विधि मंत्रालय को पत्र लिखकर सहमति वापस ले ली. उन्होंने कहा कि आलोक वर्मा को सीबीआई निदेशक पद से हटाने का फैसला लेने वाली समिति में न्यायमूर्ति सीकरी की भागीदारी को सीएसएटी में उनके काम से जोड़ने को लेकर लग रहे आक्षेप गलत हैं.

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अधीर रंजन चौधरी के साथ-साथ केरल के नेता के सुरेश, पार्टी प्रवक्ता मनीष तिवारी और तिरुवनंतपुरम के सांसद शशि थरूर इस पद के लिए दौड़ में शामिल थे.

सूत्रों ने कहा, ‘‘क्योंकि यह सहमति दिसंबर 2018 के पहले हफ्ते में ली गई थी, इसका सीबीआई मामले से कोई संबंध नहीं था. जिसके लिये वह जनवरी 2019 में प्रधान न्यायाधीश की तरफ से नामित किये गए.’’

उन्होंने कहा कि दोनों को जोड़ते हुए एक पूरी तरह से अन्यायपूर्ण विवाद खड़ा किया गया. सूत्रों ने कहा, ‘असल तथ्य यह है कि दिसंबर 2018 के पहले हफ्ते में सीएसएटी में पद के लिये न्यायमूर्ति की मौखिक स्वीकृति ली गई थी.’

सीएसएटी के मुद्दे पर सूत्रों ने कहा, ‘यह कोई नियमित आधार पर जिम्मेदारी नहीं है. इसके लिए कोई मासिक पारिश्रमिक भी नहीं है. इस पद पर रहते हुए प्रतिवर्ष दो से तीन सुनवाई के लिए वहां जाना होता और लंदन या कहीं और रहने का सवाल ही नहीं था.’

विवादों से दूर रहना चाहते हैं जस्टिस सीकरी

ज्ञात हो कि सरकार ने इस जिम्मेदारी के लिये पिछले महीने उनसे संपर्क किया था. उन्होंने अपनी सहमति दी थी. इस पद पर रहते हुए प्रतिवर्ष दो से तीन सुनवाई के लिए वहां जाना होता और यह बिना मेहनताना वाला पद था.  सीकरी ने सरकार में सक्षम प्राधिकार को पत्र लिखकर अपनी सहमति वापस ले ली है. न्यायमूर्ति सीकरी के एक करीबी सूत्र ने कहा, ‘उन्होंने (सीकरी ने) अपनी सहमति वापस ले ली है. उन्होंने कोई कारण नहीं बताया है. वह महज विवादों से दूर रहना चाहते हैं.’

सरकारी सूत्रों ने बताया कि विधि मंत्रालय द्वारा आंतरिक प्रक्रिया पूरी करने के बाद पिछले महीने न्यायमूर्ति सीकरी का नामांकन किया गया था. सूत्रों ने बताया कि विदेश मंत्रालय ने भारत के नामांकन के बारे में सीएसएटी को सूचित कर दिया है. इस पर न विदेश मंत्रालय ने और न ही विधि एवं न्याय मंत्रालय ने कोई प्रतिक्रिया दी है. 1965 में स्थापित किए गए राष्ट्रमंडल सचिवालय अपने 53 राष्ट्र सदस्यों के बीच विवाद के मामले में मध्यस्थता की भूमिका निभाता है.

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