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झारखंड आंदोलन के अग्रणी नायक रहे न्यायमूर्ति स्वर्गीय एलपीएन शाहदेव

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Dr. Bhim Prabhakar

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झारखंड आंदोलन में जिन महान विभूतियों ने अपना योगदान दिया है उनमें अग्रणी नाम न्यायमूर्ति स्वर्गीय एलपीएन शाहदेव का है. झारखंड अलग राज्य के संघर्ष में स्वर्गीय शाहदेव ने बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया. जब झारखंड अलग राज्य के बिल को बिहार विधानसभा की सहमति प्राप्त करने हेतु बिहार विधानसभा भेजने की घोषणा हुई तो लालू प्रसाद यादव ने इसका विरोध करते हुए घोषणा की कि बिहार का बंटवारा उनकी लाश पर ही संभव है. राजद प्रमुख की एसी घोषणा के बावजूद झारखंड आंदोलन की धार कमजोर नहीं पड़ी. इन विषम परिस्थितियों में भी आंदोलन को जारी रखना कोई आसान काम नहीं था. पर स्व. शाहदेव के इरादे डिगे नहीं. अलग राज्य के प्रबल समर्थक और गैर राजनीतिक पृष्ठभूमि से सर्वसम्मत नेतृत्व प्रदान करने के लिए न्यायमूर्ति शाहदेव को सर्वदलीय अलग राज्य निर्माण समिति का संयोजक चुना गया.

16 पार्टियों ने मंच साझा किया

इस समिति में झारखंड से संबंधित भाजपा, झारखंड मुक्ति मोर्चा, आजसू, झारखंड पीपुल्स पार्टी ,कांग्रेस, समेत लगभग 16 पार्टियों के नेता एक साथ आये. उन्होंने एक मंच पर आकर साझा आंदोलन चलाने की घोषणा की. बिहार विधानसभा में 21 सितंबर 1998 को झारखंड विधेयक पर चर्चा होनी थी. सर्वदलीय अलग राज निर्माण समिति ने इसी दिन बिहार के झारखंड हिस्से को बंद करने की घोषणा कर दी. समिति का यह मानना था कि बिहार विधानमंडल से झारखंड विधेयक तो पारित होगा नहीं लेकिन बंद करने से केंद्र को यह स्पष्ट संदेश जायेगा कि झारखंड के लोगों की मंशा क्या है. श्री शाहदेव के नेतृत्व में 21 सितंबर 1998 को झारखंड में सर्वदलीय बन्द का आवाहन किया गया. इस बंद के आवाहन से हजारों कार्यकर्ता सड़कों पर उतरे और ‘पहले माटी, फिर पार्टी’ का नारा बुलंद किया. हज़ारों कार्यकर्ताओं ने जस्टिस शाहदेव के नेतृत्व में सड़कों पर उतर कर लोगों को अलग झारखंड राज्य के निर्माण हेतु प्रेरित करने का विशेष कार्य किया.

शहीद चौक के पास गिरफ्तार किये गये न्यायमूर्ति शाहदेव

शहीद चौक, रांची के पास से न्यायमूर्ति शाहदेव को तत्कालीन प्रशासन ने गिरफ्तार कर लिया. उन्हें कोतवाली थाना ले जाया गया. उन्हें और उनके साथ कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार कर रखा गया. इतिहास में यह पहली घटना थी जब न्यायालय के किसी पूर्व न्यायाधीश को किसी आंदोलन के क्रम में गिरफ्तार कर थाना में बैठा कर रखा गया. इस सफलता के बाद सर्वदलीय समिति ने अलग राज्य निर्माण होने तक केंद्र पर दबाव बनाए रखा. न्यायमूर्ति शाहदेव ने दूसरा मोर्चा भी खोला, उन्होंने स्थानीय पत्र-पत्रिकाओं अखबारों समाचार पत्रों एवं आलेख और आर्टिकल्स के माध्यम से केंद्र सरकार पर झारखंड राज्य के गठन के लिए दबाव बनाया. उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि यह थी कि उन्होंने झारखंड के एक ऐसे बड़े तबके को इस आंदोलन में जुड़ने के लिए प्रेरित किया जो इस आंदोलन को शंका की दृष्टि से देखता था.

केंद्र को समझाने में सफल रहे

न्यायमूर्ति शाहदेव केंद्र सरकार को यह समझाने में सफल रहे थे कि यदि बिहार विधानसभा विरोध भी करे तो भी अलग राज्य का गठन हो सकता है. इसके लिए दो-तिहाई बहुमत की बाध्यता नहीं होती है. न्यायमूर्ति शहदेव ने विधि विशेषज्ञ के रूप में झारखंड के आंदोलनकारियों का प्रतिनिधित्व किया एवं केंद्र सरकार से बातचीत हेतु गठित प्रतिनिधि समिति का भी नेतृत्व किया.

3 जनवरी 1930 को हुआ था जन्म

न्यायमूर्ति शाहदेव का जन्म 3 जनवरी 1930 को लातेहार जिला के चंदवा प्रखंड के गांव में हुआ था. इनकी प्रारंभिक शिक्षा महुआमिलान स्थित सरकारी विद्यालय में हुई थी. उन्होंने बालकृष्ण हाइस्कूल रांची से मैट्रिक की परीक्षा पास की. रांची कॉलेज रांची से स्नातक की उपाधि प्राप्त करने के बाद उन्होंने कानून की पढ़ाई पूरी की. 1958 में न्यायिक सेवा में आ गए. इनकी पोस्टिंग हजारीबाग में मुंसिफ के पद पर हुई थी. 1980 में धनबाद के जिला एवं सत्र न्यायाधीश बने 1983 में इनका तबादला धनबाद हुआ. 1986 से 1992 तक पटना उच्च न्यायालय रांची पीठ में न्यायाधीश के पद पर है न्यायमूर्ति थे.

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