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#corona : अमेरिका में पीड़ित मरीजो का इलाज में लगे डॉक्टर अनुराग आर्या ने लिखा- आपने कभी इस डर को महसूस किया है

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Dr Anurag Arya

ये हमारे ब्लॉगर साथी डाक साब Anurag Arya की पोस्ट है. व्हाट्सअप फॉरवर्ड छोड़ दीजिए.  पहले इनको पढ़िए. बेफिक्र नहीं होना है.  हालात खौफनाक हैं.

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हमारे हॉस्पिटल के बाहर टेंट है, मैं जब भी उन्हें देखता हूं ठहर जाता हूं. वो एक वर्ल्ड क्लास हॉस्पिटल से मिस मैच कोई अलग टुकड़े नजर आते हैं. मुश्किल वक़्त में आपके काम करने के तरीके अलग होते हैं. इससे पहले मैंने टेंट में 2014 में साउथ अफ्रीका में इबोला ऑउटब्रेक में काम किया था.

इसी तरह के टेंट में मैंने बहुत सारा दर्द, अकेलापन और मौत देखी थी. मैंने कभी सोचा नहीं था, मैं वो सब दोबारा देखूंगा. मैं कभी देखना भी नहीं चाहता था, वो बहुत दर्दनाक अनुभव था.

हम सब क्या देख रहे हैं उसे बयान करना आसान नहीं है. उन जगहों, उन लोगों को जिन्हें हम बरसों से जानते हैं, बदल गए हैं. हमारे इमरजेंसी रूम अब आईसीयू है. आवाजें और वो महसूस करने का एक खास जज्बा जो हमारे अंदर था, एक हफ्ते में सब बदल गया है.

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वो पेशेंट जिन्हें मैं रोज देखता था, अब कहीं नहीं दिखते. हर पेशेंट कोविड -19 का है. इमरजेंसी रूम में चलने का मतलब खांसी भरे एक कॉरिडोर से गुजरने जैसा है. सबकी पिच और फ्रीकवेंसी अलग है. पर उनका कारण एक ही है.

ये मरीजों की संख्या नहींं है, जो हमें परेशान कर रही है. ये बीमारी की त्रीवता है, सांसों का रुकना है !

एक रेस्पिरेटरी अरेस्ट में 6 से 8 प्रोफेशनल की जरुरत होती है.

एमरजेंसी डॉक्टर, अनेस्थेटिक्स, नर्सेस, रेस्पिरेटरी टेक्नीशियन.

एक घंटा सेटल होने में लगता है.

इतने में दूसरा पेशेंट तैयार हो जाता है.

अंतहीन सिलसिला.

हमें वो काम करना है, जो हमने कभी नहीं किया

गूगल फोग सर्च करते हुए पेशेंट के मॉनिटर चेक करना. ये प्रेडिक्ट करना कौन सा पेशेंट खतरे में पड़ सकता है. यदि आप उसे घर भेज देंगे तो और कौन सा पेशेंट जिन्दा रहेगा ? पैलेटिव केयर करना, परिवार के लोगों से बात करना. लंबे डिस्कसन इस बात पर कि क्या सम्भावनाएं हो सकती हैं ? परिवार के लोगों की हिचकियां, आंसू !

हम कुछ मिनट सिर्फ इसलिए उन पेशेंट के पास रुकते हैं ताकि वो “आखिरी बार” जाते समय हमें गुड बाय कह सकें. हम ड्रिप बंद करते हैं, वेंटिलेटर बंद करते हैं और इंतज़ार करते हैं.

आपके हाथ उनके हाथ में होते हैं. आप उनके परिवार के बारे में सोचते हैं, उनके घर, किसी का सुबकना याद करते हैं, कभी-कभी कोई प्रेयर स्टार्ट करता है. आप कुछ मदद नहीं कर सकते. बस चुपचाप आंसू बहाते हैं.

पर,

हम ऐसा कुछ नहीं करते.

हम सिर्फ खड़े होते हैं. और मृत्यु का समय नोट करते है. शाम के 7 बजकर 19 मिनट !

वेस्ट अफ्रीका में मैंने बहुत से लोगों की मृत्यु देखी है. उनमें से कई से सुबह लंबी बात भी की है. लंच करने गया हूं और वापस आया हूं. तो उन्हें ज़िंदा नहीं पाया.

हम इसलिए नहीं हैं, हमें तैयार उन्हें बचाने के लिए किया गया है. इसलिए नहीं के उन्हें अपने सामने खड़ा होकर जाते हुए देखें.  मैंने अफ्रीका में ये सीखा कि अगर मृत्यु आसानी से भी आये, तो भी उसके आदी मत बनो. आज हमारे पेशेंट की मृत्यु हो रही है, मेरे साथियों की भी.

वहां से लौटने के बाद 19 दिन मैंने न्यूयार्क के हॉस्पिटल में गुजारे एक पेशेंट की तरह.ॉ

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इबोला से लड़ते हुए !

हर रोज मैंने अपने पेशेंट के बारे में सोचा. जिन्हे मैंने जाते हुए देखा, इबोला ने जिसे चाहा ले गया. मै अपने लिए कुछ नहीं कर सकता था. सिवाय उम्मीद, इंतज़ार और चिंता के. मै जानता था मेरे साथी क्या महसूस कर रहे है, उनके चेहरे से दिखता था !

हम थकने लगे हैं, घंटो एक किस्म के सुरक्षित चश्मे के पीछे. गाउन और मास्क में. पर ये सिर्फ एक शुरुआत है. मानसिक थकान घुसपैठ करने लगी है. मुझे अपने साथियो की चिंता होने लगी है. हर रोज कोई मुझे कॉल करके रोने लगता है !

वे कब तक होल्ड करेंगे ???

मै कब तक होल्ड कर पाउंगा ?

मुझे याद है ग्वेना में  इबोला के समय में मुझे भी ऐसी चिंता रोज होती थी. क्या मेरा दिन आज है ? और ये चिंता हर दिन बढ़ जाती थी. मैंने अपने साथियो को इतना डरा कभी नहीं देखा, इतना आशंकित. पर एक साथ एक टीम की तरह काम को परफेक्शन के साथ करते हुए भी नहीं ! इतना फोकस, इतना नियंत्रित, इतनी एकजुटता के साथ. हां हमें अपने सुरक्षा उपकरणों की चिंता है, हमें दवाइयों के ख़त्म होने की भी चिंता है. हमें एक दूसरे की भी चिंता है.

पर मैंने हम सबके पास ऐसा एक उद्देश्य की कल्पना कभी नहीं की थी. अपने काम को लेकर इतनी  जिम्मेदारी का अहसास और गर्व पहले कभी नहीं हुआ था. मै जब कमरे में वापस कपड़ो को एक बैग में भर करके ले जाता हूं. गर्म पानी में नहाकर जब मै शीशे में अपने आप को देखता हूं, उस चश्मे के निशान अब भी मेरे चेहरे और नाक पर है.

हम कब तक होल्ड करेंगे !

एक अमेरिकन डॉक्टर कहती हैः 25 से 30 साल हॉस्पिटल में काम करने वाले लोग वसीयत लिखवा रहे हैं, कुछ वही के कागजो पर लिखकर  उसकी फोटो लेकर  भेज रहे हैं. दुनिया वैसी नहीं रही और इसके बाद भी वैसी नहीं रहेगी. वर्ग और क्लास के अलावा एक नयी विभाजन की रेखा भी खींची है. रंग की. कुछ हिस्सों में रंगभेद  का आरोप लग रहा है. वे कह रहे है हमे एडमिट नहीं किया जा रहा. गोरो के लिए हॉस्पिटल सुरक्षित रखे जा रहे हैं. अलबत्ता ये बहस का विषय है. पर एक अश्वेत आदमी लिख रहा है वेंटिलेटर की जरुरत में उसे नहीं चुना जाएगा.  उसके भय के अपने कारण होंगे, हम सच नहीं जानते.

दो पति-पत्नी की अलग चिंता है. दोनों हॉस्पटल में है, उन्हें अपनी दो बच्चियों की चिंता है. उन्हें कुछ हो गया तो उनका क्या होगा ?

शारीरिक रूप से असक्षम लोगो के अपने डर है. वे कहते हैं ट्यूब डालने के बाद तो मै हाथ से डॉक्टर को अपनी जरुरत बता नहीं पाउंगी. क्यूंकि मेरे हाथ काम करते नहीं. दूसरी कहती है तुम्हें इसकी जरुरत पड़ेगी, वे किसी दूसरे शारीरिक रूप से सक्षम आदमी को पहले तवज्जो देंगे !

आपने कभी इस डर को महसूस किया है. 

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नोटः- लेखक dr Anurag Arya एक प्रतिष्ठित डॉक्टर हैं. अभी अमेरिका में हैं. कोरोना पीड़ितों के इलाज के दौरान चिकित्सकों की मनोस्थिति पर उन्होंने एक अनुभव अपने ब्लॉग पर लिखा है. हम उसे हु-ब-हू प्रकाशित कर रहे हैं.

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