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जंगल वनाश्रितों के लिए संसाधन नहीं, प्राकृतिक धरोहर है: सिमोन उरांव

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Ranchi: गांवों से शहर आने पर पता चलता है कि कितनी तेजी से बदलाव हो रहा है. भले ग्रामीणों के पास इतने संसाधन न हों और न ही इतनी आधुनिकता है, लेकिन फिर भी समय के साथ होनेवाले बदलाव से गांव भी अछूते नहीं हैं. युवाओं में अपनी विरासत संजोने की लगन काफी दिखाई देती है. ये बातें पद्मश्री सिमोन उरांव ने सामुदायिक अधिकार समागम में कहीं. कार्यक्रम का आयोजन संवाद और नेशनल आदिवास एलायंस की ओर से किया गया. मुख्य अतिथि सिमोन उरांव ने कहा कि वनाश्रितों के लिए जंगल संसाधन या पदार्थ नहीं हैं, ये जंगल आदिवासियों के लिए प्राकृतिक धरोहर है. जिसे वे बचाना चाहते हैं. लेकिन आनेवाली पीढ़ी इस धरोहर की ओर ध्यान नहीं दे रही है. उन्होंने कहा कि जिस तेजी से प्राकृतिक संपदाओं का दोहन हो रहा है, जरूरी है कि आने वाली पीढ़ी इसके महत्व को समझे.

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जमीन कोई खरीद बिक्री की वस्तु नहीं

सिमोन उरांव ने कहा कि जमीन को बिकाउ वस्तु बना कर पेश किया जा रहा है. जबकि जमीन प्रमुख प्राकृतिक संसाधनों में से एक है. जिसमें जंगल, जमीन तो जुड़े हैं ही साथ ही खनन और खेती जैसे महत्वपूर्ण कार्यों का आधार भी जमीन है. ऐसे में जरूरी है कि लुप्त होती पंरपराओं और संस्कृतियों के साथ जमीन को भी बचाया जाये.

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रिसर्च सिर्फ विनाश के लिए हुए

सामाजिक कार्यकर्ता सिद्धेश्वर सरदार ने कहा कि आदिवासियों के नाम पर जितने भी रिसर्च हुए वो सभी सिर्फ और सिर्फ विनाश के लिए किये गये. रिसर्च सेंटरों और रिसर्चों की स्थिति अब हास्यप्रद हो गई है. गांवों से शहर आ चुके युवाओं को गांवों की परंपराओं की जानकारी नहीं होती. इससे बड़ी दुर्भाग्य की बात और क्या होगी. उन्होंने कहा कि लेकिन फिर भी सुदूर गांवों में लोग हैं, जो इन परंपराओं और संस्कृति को बचाने में लगे हैं. मौके पर छत्तीसगढ़, उड़ीसा आदि राज्यों से आये लोग भी उपस्थित थे.

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