Opinion

न्यूज चैनल और नॉन-मीडिया एक्टरों की जुगलबंदी

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Manoj Khare

पिछले कुछ समय से टीवी न्यूज चैनलों का एक नया आक्रामक और सक्रिय रूप सामने आया है. खासकर सुशांत सिंह राजपूत प्रकरण के बाद मीडिया का यह रूप खुलकर उजागर हुआ है. महत्वपूर्ण बात वह नया तरीका है, जिससे टीवी चैनल सोशल मीडिया पर सक्रिय और तटस्थ लोगों को भी अपने एजेंडे में फंसा लेते हैं और सोशल मीडिया के स्वतंत्र स्पेस पर अतिक्रमण कर लेते हैं. इसको जरा सिलसिलेवार ढंग से समझने की कोशिश करते हैं.

पहले मीडिया टीआरपी के लिये वह लोक लुभावन चीजें दिखाती थी. जो जनता देखना चाहती थी. फाईव सी काफी चर्चित रहे – क्राइम, क्रिकेट, सिनेमा, सेलिब्रिटी और कांस्परेसी. बीच-बीच में मीडिया हाईप पैदा किए जाते थे.

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फिर मीडिया जनता को जीवन के असल मुद्दों से भटकाने के लिए एजेंडा सेट करने लगी. भूत, चुड़ैल, नाग-नागिन, भुतहे किले-महल से शुरू होकर दाऊद, बगदादी, किम जोंग और प्रलय एवं पृथ्वी के अंत की खबरें खूब चलाई गईं.

अब इन सबके बीच नया रुझान है. न्यूज चैनलों का सीधे-सीधे कुछ व्यक्तियों, समूहों या राजनीतिक दलों के विरुद्ध आक्रामक रवैया अख्तियार करना और स्वतंत्र सोशल मीडिया तक को अपने प्रभाव में ले लेना.

याद कीजिये पालघर में दो साधुओं की मॉब लिचिंग पर अर्नब गोस्वामी ने कांग्रेस नेता सोनिया गांधी और उनके परिवार पर कैसे खुलकर हमला बोला था. वही हमलावर रुख बाद में रिया चक्रवर्ती और अब उद्धव ठाकरे के विरुद्ध अपनाया गया.

इस पूरे खेल में मीडिया के एंकर और रिपोर्टर ही नहीं, बल्कि बाहर बैठे नॉन-मीडिया एक्टर भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. पायल रोहतगी, बबिता फोगाट और कंगना रौनात जैसे लोग आक्रामक बयान देते हैं. जिन्हें चैनल हाइलाइट करते हैं.

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वे मिलकर एक जाल फैलाते हैं- एक प्रकार का ट्रैप एजेंडा. खास बात विरोधी पक्ष भी इस ट्रैप में अपनी नादान हरकतों या वाद-विवाद में कूद पड़ता है और न्यूज चैनलों का खेल खेलने के लिए फंस जाता है. इस तरह पक्ष-विपक्ष दोनों सेट किये गए एजेंडे पर भिड़ जाते हैं. सोशल मीडिया पर सक्रिय लोग भी उसी एजेंडे पर चर्चा में उलझ जाते हैं. आपने देखा होगा अभी बड़े-बड़े पत्रकार और लेखक रिया-सुशांत-कंगना पर पोस्ट डालने लगे थे.

जाहिर है इन चर्चाओं का न तो कोई निष्कर्ष निकल सकता है और न निकलता है. पर गैर-जरूरी मुद्दों को लाइम लाइट में बनाए रखने का यह ट्रैप एजेंडा यथा संभव लंबे समय तक सफलता पूर्वक चलाया जाता है और ठंडा पड़ने से पहले उसका फोकस शिफ्ट कर दिया जाता है या नया एजेंडा पकड़ लिया जाता है.

याद करें सुशांत राजपूत की आत्महत्या प्रकरण को कैसे लगातार मुख्य मुद्दा बनाये रखा गया. नेपोटिज्म, फिर दिशा सालियान और सुशांत की हत्या षड्यंत्र, आदित्य ठाकरे के जुड़ाव, मर्डर मिस्ट्री, 15 करोड़ की हेराफेरी, रिया के काला जादू और आत्महत्या के लिए उकसाने वाली भूमिका, ड्रग्स माफिया तक लगातार समय के हिसाब से फोकस बदला गया और मुद्दे को गर्म रखा गया. जब रिया गिरफ्तार हो गई तो कंगना बनाम शिवसेना पर पहुंच गए.

रोजगार, जीडीपी में भारी गिरावट, चीन का खतरा, क्रोनी कैपिटलिज्म और सबसे बढ़कर भारत के विश्व की कोरोना कैपिटल बनने की ओर बढ़ते कदम जैसी खबरें सिरे से सभी लोकप्रिय चैनलों और काफी हद तक सोशल मीडिया से लुप्तप्रायः कर दी गईं.

व्हाट्सएप्प पर तो पहले से आइटी सेल का कब्जा था ही. अब मीडिया के हमले की जद में फेसबुक और ट्विटर पर सक्रिय लोग भी आ गए हैं. ऐसे में सजग नागरिकों का कर्तव्य है कि न्यूज चैनलों और उनके नॉन-मीडिया एक्टरों की जुगलबंदी को समझा जाए, जो सोशल मीडिया के स्पेस तक को हड़पने का काम कर रही है. विरोधियों तक को अपने ट्रैप में शामिल कर दूसरे मुद्दों पर चर्चा को रोक रही है.

इस खेल से निपटने का एक ही उपाय है, इनके एजेंडे से दूर रहना. न उनकी चर्चा करना, न बहस में पड़ना. ट्रैप एजेंडे पर साइलेंट रहते हुए है, असल मुद्दों को चर्चा के केंद्र में रखना. याद रखिये, बहुसंख्यक लोग इनके समर्थक नहीं हैं, पर जब वे बौद्धिक जमात को इन्हीं एजेंडों पर उलझा देखते हैं, तो वे भी उसी ट्रैप में आसानी से फंस जाते हैं.

यदि इन प्रायोजित मुद्दों पर टिप्पणी बंद कर दी जाए. न पक्ष में बोला जाए, न विपक्ष में. किसी भी ट्रैप एजेंडे पर कोई रिएक्शन न दिया जाए. तो ऐसे प्रायोजित एजेंडे ज्यादा नहीं चल पाएंगे और सोशल मीडिया जैसा सशक्त माध्यम ज्यादा स्वतंत्र और सार्थक बना रह सकेगा.

डिसक्लेमरः ये लेखक के निजी विचार हैं

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