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जेएमएम ने ठुकराया ऑफर, अब रविंद्र पांडेय थाम सकते हैं जदयू का हाथ !

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Akshay Kumar Jha
Ranchi: 2019 के लोकसभा चुनाव में सबसे यादगार और अहम किस्सा बीजेपी सांसद रविंद्र कुमार पांडेय का ही माना जाएगा. बाघमारा विधायक ढुल्लु महतो और रविंद्र पांडेय की लड़ाई इस मोड़ पर खत्म होगी ऐसा कयास शायद ही किसी ने लगाया हो. लेकिन सवाल है कि अब आगे क्या.

बाघमारा विधायक ने इस लड़ाई में अपनी हार मान ली है और पार्टी का साथ देने का मन बना लिया है. लेकिन रविंद्र पांडेय के तेवर नरम होने के बजाय और तल्ख हो रहे हैं. अगर इस बार वो सांसद का चुनाव नहीं लड़ते हैं तो यह उनकी राजनीतिक जीवन का शायद आखिरी अध्याय माना जाएगा.

ऐसे में बीजेपी से बगावत कोई बहुत बड़ी अचरज की बात नहीं होगी. इससे पहले अखबारों की सुर्खियों में भी यह बात आ चुकी है कि रविंद्र पांडेय ने टिकट के लिए जेएमएम को ऑफर दिया था. लेकिन जेएमएम ने अपनी राजनीति के लिए रविंद्र पांडेय को फिट नहीं माना और जवाब अब तक ना में ही है.

जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष से हो रही है सीधी बात

जब शहीद ही होना है तो, घर बैठ कर क्यों लड़ाई लड़ कर ही शहीद होंगे. ऐसा बयान अखबार को देने वाले रविंद्र पांडेय से अगर पार्टी कोई वफादारी की उम्मीद रखती है, तो यह पार्टी का ना पचने वाला बड़प्पन माना जाएगा. बाघमारा में अपने समर्थकों के साथ रविंद्र पांडेय ने मीडिया से कहा कि जल्द ही रैली भी होगी और अपना बैनर और पोस्टर भी होगा. लेकिन सवाल है कि पोस्टर बैनर होंगे किसके?

पुष्ट सूत्रों के हवाले से मिली जानकारी यह है कि रविंद्र पांडेय जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतीश कुमार से सीधी बात कर रहे हैं. जदयू को भी रविंद्र पांडेय को टिकट देने में परेशानी नहीं है. क्योंकि जदयू एनडीए फोल्डर में है जरूर, लेकिन झारखंड में नहीं बल्कि बिहार में.

वहीं, जदयू को एक ऐसा उम्मीदवार भी मिल जाएगा जो पांच बार सांसद रह चुका है. एक ऐसा उम्मीदवार जिसकी जीतने की संभावना जतायी जाती हो. वैसे भी झारखंड में जदयू का आधार ना के बराबर है. दोनों ही एक दूसरे के लिए फिलवक्त जरूरत हैं. बताया जा रहा है कि अगर सबकुछ ठीक रहा तो 26 मार्च को इस खबर पर मुहर लग सकती है.

मेरी रविंद्र पांडेय से कोई बात नहीं हुई हैः प्रदेश अध्यक्ष

न्यूज विंग ने इस मामले पर जदयू झारखंड के प्रदेश अध्यक्ष शैलेंद्र महतो से बात की. उन्होंने कहा कि झारखंड में भी पार्टी अपने उम्मीदवार उतार सकती है. लेकिन वो उम्मीदवार कौन होंगे और कहां से उतारे जाएंगे यह पार्टी आलाकमान के हवाले से तय होगा. रविंद्र पांडेय की जहां तक बात है, उन्होंने मुझसे अभी तक किसी तरह की कोई बात नहीं की है. पार्टी के बड़े सदस्यों से बात हुई होगी, इस बात की जानकारी मुझे नहीं है.

आजसू की बढ़ जाएगी मुश्किल

रविंद्र पांडेय पर अगर जदयू भरोसा जताता है, तो निश्चित तौर पर आजसू की मुश्किल बढ़ जाएगी. यह सच है कि रविंद्र पांडेय की जीत के पीछे बीजेपी का झंडा रहा है. लेकिन रविंद्र पांडेय करीब 30 साल से गिरिडीह में राजनीति कर रहे हैं. उनके अपने कैडर और वोट भी हैं.

ऐसे में अगर वो जीत की गणित से दूर भी रहते हैं, तो जीतने वाले उम्मीदवार के लिए जीत का समीकरण जरूर बन सकते हैं. बेरमो, गोमिया और गिरिडीह में उन्हें काफी समर्थन मिल सकता है. ऐसे भी यही तीनों विधानसभा सीट गिरिडीह लोकसभा सीट पर जीत का गणित तय करते हैं. नतीजा जो भी हो, पर देखना दिलचस्प होगा कि गिरिडीह में रविंद्र पांडेय की राजनीति की नयी पारी शुरू होती है या किस्सा खत्म.

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