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कृषि कानून पर झामुमो का विरोध, कहा-महाजनी प्रथा की होगी वापसी, कांट्रेक्ट फार्मिंग से किसान होंगे तबाह

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Ranchi :  नये कृषि विधेयक के खिलाफ झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) राज्यभर में मंगलवार को सड़कों पर उतरा. पार्टी के केन्द्रीय नेतृत्व के निर्देश पर रांची में भी घेराव प्रदर्शन किया गया. पार्टी के केन्द्रीय महासचिव और प्रवक्ता सुप्रियो भट्टाचार्य ने इस दौरान कहा कि केन्द्र सरकार ने किसान विरोधी नीतियां बनायी हैं.

इस कानून से आजाद भारत में फिर से महाजनी प्रथा शुरू हो सकती है. केंद्र ने कृषि विधेयक 2020 संसद से बिना बहस के जबरन पारित करवाया है. इस विधेयक से इसका सीधा लाभ पूंजीपतियों एवं बड़े औद्योगिक घरानों को मिलना तय है. इसके जरिये देश के बाजारों में काला बाज़ारी करने की खुली छूट दे दी गयी है. झामुमो इसे राज्य में कभी लागू नहीं होने देगा.

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निरस्त हो काला कानून

डीसी छवि रंजन को एक ज्ञापन सौंपने झामुमो के लोग.

धरना कार्यक्रम के बाद सुप्रियो भट्टाचार्य के नेतृत्व में पार्टी ने डीसी छवि रंजन को एक ज्ञापन सौंपा. राष्ट्रपति को लिखे गये इस पत्र में नये कृषि विधेयक को काला कानून बताते हुए इसे निरस्त करने की मांग की गयी है. इसमें कहा गया है कि केंद्र सरकार का किसान एवं मजदूर विरोधी चरित्र उजागर हो गया है.

बहुमत के आधार पर निरंकुश मोदी सरकार ने कृषि विधेयक, 2020 को संसद में बगैर किसी चर्चा व विचार विमर्श के जबरन पारित कर लिया है. राज्यसभा में संसदीय प्रणाली को ध्वस्त किया गया. प्रतिनिधि मंडल में मुश्ताक आलम,  डॉ महुआ माजी,  जिला सचिव डॉ हेमलाल कुमार मेहता और अन्य लोग भी शामिल थे.

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किसानों को नहीं मिलेगा MSP

झामुमो के अनुसार नये कृषि विधेयक से अनाज मंडी-सब्जी मंडी को खत्म कर दिया जायेगा. इससे कृषि उपज खरीद व्यवस्था पूरी तरह बर्बाद हो जाएगी. ऐसे में किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य’ (MSP) बाजार भाव के अनुसार फसल की कीमत नहीं मिल सकेगी. इसके फसलों को दलाल औने-पौने दामों पर खरीदकर मुनाफा कमाएंगे. देश की कृषि उपज मंडी व्यवस्था खत्म होने से सबसे बड़ा नुकसान किसानों को होगा.

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मंडियां खत्म होते ही अनाज-सब्जी मंडी में काम करने वाले लाखों-करोड़ों मजदूरों, आढ़तियों, मुनीम, ढुलाईदारों, ट्रांसपोर्टरों की रोजी रोटी और अपने आप खत्म हो जाएगी. नये कानून से किसान ठेका प्रथा में फंसेगा. अपनी ही जमीन पर वह बंधुआ मजदूर बना दिया जायेगा. गरीब किसान बड़ी कंपनियों के साथ फसल की खरीद फरोख्त का कॉन्ट्रेक्ट बनाने, समझने में फेल रहेगा. ऐसे में इस कानून को कैंसिल किया जाये.

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