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दिव्यांगों को सबल करने में झारखंड की कछुआ चाल, पिछले पांच सालों में 10 हजार को भी नहीं मिला एडिप स्कीम का लाभ

Amit Jha 

Ranchi: दिव्यांगजनों को शारीरिक तौर पर और भी सबल बनाने को उन्हें कृत्रिम अंग दिये जाने की सुविधा है. इसके लिये केंद्र के स्तर से एडिप योजना का लाभ दिया जाता रहा है. केंद्र की ओर से इसके लिये राज्य सरकारों को पैसे आवंटित किया जाते हैं. पर झारखंड में पिछले पांच सालों में स्थिति यह रही है कि दस हजार दिव्यांगजनों को भी इसका लाभ नहीं मिल सका है. ऐसे राज्य में 5 लाख से भी अधिक दिव्यांगजन हैं जिन्हें सपोर्ट की जरूरत है. वैसे माना जाता है कि राज्य की कुल जनसंख्या का तकरीबन 6 फीसदी तक संख्या दिव्यांगजनों की है. इसकी तुलना में इसके पड़ोसी राज्यों को ही देखें तो करीब 20 हजार से लेकर एक लाख से भी अधिक को एडिप स्कीम का लाभ स्थानीय सरकारों ने दिलाया है. ऊपर से कोढ़ में खाज यह कि दिव्यांगजनों के हक, अधिकारों को देखने वाला राज्य निःशक्तता आय़ोग को खुद ही सहारे की जरूरत है. अप्रैल 2021 से आयुक्त का पद खाली है.

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पड़ोसी राज्यों की तुलना में कहां है झारखंड

सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय (केंद्र) की मानें तो दिव्यांगजनों को कृत्रिम अंगों सहित विभिन्न सहायक यंत्र और उपकरण प्रदान करने को एडिप नामक योजना का कार्यान्वयन किया जाता है. इससे दिव्यांगताओं के प्रभाव को कम करके और उनकी आर्थिक क्षमता को बढ़ाकर उनका शारीरिक, सामाजिक और मनोवैज्ञानिक सशक्तिकरण किया जाता है. 2016-17 से 2020-21 की अवधि में झारखंड को भी इसका लाभ मिला है. 2016-17 में झारखंड के 806, 2017-18 में 1604, 2018-19 में 4882, 2019-20 में 216 और 2020-21 में 1809 लाभार्थियों को ही इसका लाभ दिया जा सका है. मतलब पिछले पांच वर्षों की अवधि में 9317 दिव्यांगजनों तक ही एडिप का लाभ पहुंच पाया.

झारखंड के साथ बने राज्य छत्तीसगढ़, उत्तराखंड को देखें तो यहां एडिप का लाभ पाने वाले दिव्यांगजनों की संख्या ज्यादा है. छत्तीसगढ़ में पिछले पांच सालों में 17,888, उत्तराखंड में 28,964 को इसका लाभ मिला है. पड़ोसी राज्यों में तो आंकड़ा और भी बड़ा है. बिहार में 43,186, ओड़िशा में 52,001 तो पश्चिम बंगाल में तो एक लाख से अधिक (1,00,544) लाभार्थियों को इससे फायदा मिला है. यूपी में तो 3,15,930 इससे लाभान्वित हो चुके हैं. असम में 53,459 दिव्यांगजनों को इसके जरिये राहत मिली है.

क्या रही वजह

पूर्व निःशक्तता आयुक्त सतीश चंद्रा बताते हैं कि उन्होंने अपने स्तर से कई बार जिलों से बात की. पत्र लिखा कि वे दिव्यांगजनों की संख्या समय रहते उपलब्ध कराएं. ऐसा होने पर अधिक से अधिक लाभार्थियों को लाभ मिल पाता. पर इस पर अपेक्षित तरीके से गंभीरता नहीं दिखायी गयी. वैसे अपने कार्यकाल में उन्होंने 5 लाख दिव्यांगजनों को विकलांगता प्रमाण पत्र दिलाने में पहल की. इसमें से 2 लाख से अधिक दिव्यांगजनों को स्वामी विवेकानंद योजना के तहत पेंशन लाभ मिल रहा है. रांची में समेकित क्षेत्रीय विकास केंद्र भी वर्ष 2021 के प्रारंभ में खुल गया. इसके जरिये प्रथम चरण में अलग अलग जिलों में कैंप लगाकर दिव्यांगों को लाभ दिलाया गया है.

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