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बढ़ती बेरोजगारी में झारखंड के नरेगा मजदूरों के लिए काम का अधिकार महज मजाक

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  • 2 फरवरी को प्रखंड कार्यालय में रोजगार की मांग को लेकर होगा प्रर्दशन
  • राज्य में रोज़गार गारंटी परिषद की बैठक चार साल में सिर्फ एक बार मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में हुई
  • झारखंड मुक्ति मोर्चा की ओर से ‘नरेगा रोज़गार दो अभियान’ की घोषणा महज घोषणा बनकर रह गई
  • मजदूरों की 188 करोड़ मजदूरी का अभी भी भुगतान नहीं
  • मनरेगा मजदूरों को काम नहीं दे पा रही राज्य सरकार
  • रघुवर सरकार की योजना बनाओ अभियान ढकोसला, जमीनी सच्चाई कुछ और ही है

Ranchi: झारखंड नरेगा वॉच ने राज्य सरकार पर राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून (नरेगा) को कमजोर करने का आरोप लगाया है. एचआरडीसी में आयोजित संवाददाता सम्मेलन में झारखंड नरेगा वॉच ने राज्य सरकार के द्वारा मनरेगा कानून के अनुरूप क्रियान्वयन नहीं होने करने का भी आरोप लगाया. सरकार की नीतियों और बढ़ती बेरोजगारी और मनरेगा मजदूरों की दशा को लेकर झारखंड नरेगा वॉच की ओर से 2 फरवरी यानी शनिवार को प्रखंड कार्यालय में प्रदर्शन किया जायेगा.

संवाददाता सम्मेलन को सम्बोधित करते हुए झारखंड नरेगा वॉच के संयोजनक जेम्स हेरेज ने कहा कि राज्य सरकार के द्वारा रोजगार देने के वादे को लेकर बड़े-बड़े प्रचार किए जा रहे हैं, लेकिन गांव में मनरेगा जैसे कानून रहते हुए भी ग्रामीणों को रोजगार नहीं मिल रहा है. इस ओर सरकार का ध्यान नहीं है. वही झारखंड का ग्रामीण इलाका पलायन का दंश झेल रहा है.

100 दिनों की जगह 40 दिन काम

नरेगा कानून प्रत्येक ग्रामीण परिवार को 100 दिनों के काम का अधिकार देता है. लेकिन पिछले तीन वर्षों में झारखंड के जिन परिवारों को नरेगा में काम मिला हैं, उन्हें औसतन केवल 40 दिनों का ही रोज़गार मिल पाया है. आदिवासी और दलित परिवारों की कुल नरेगा मज़दूरी में हिस्सा 50% से गिरकर 38% हो गया. हालांकि, झारखंड सरकार रोज़गार सृजन के बड़े दांवे करती है.

मनरेगा मजदूरों को काम नहीं दे पा रही राज्य सरकार

2017-18 में मज़दूरों द्वारा मांगे गए कुल 70 लाख मानव-दिवस काम का केवल 43 लाख मानव-दिवस काम ही दे पाई. इसका मतलब है कि 39% मामलों में सरकार काम को उपलब्ध करने में असमर्थ रही. पिछले तीन वर्षों में सरकार ने 7 लाख से अधिक जॉब कार्ड रद्द कर दिए, जिसमें अनेक ऐसे परिवार भी हैं जो नरेगा में काम करते हैं और जिन्हें पता भी नहीं कि उनका कार्ड रद्द कर दिया गया है.

‘योजना बनाओ अभियान’ ढकोसला जमीनी सच्चाई कुछ और

सरकार ने बड़ी ताम-झाम के साथ 2015-16 में योजना बनाओ अभियान चलाया था. जिसमें ग्रामीणों और ग्राम पंचायतों ने मेहनत करके अपने गांवों के लिए 10 लाख से अधिक नरेगा योजनाओं का चयन किया था. ग्रामीणों द्वारा चयनित योजनाओं का कार्यान्वयन न कर राज्य सरकार तानाशाह तरीके से ग्राम सभाओं और ग्राम पंचायतों पर योजनाएं थोप रही है. साथ ही, पंचायती राज व्यवस्था, पेसा और नरेगा कानून का उल्लंघन कर के योजनाओं के कार्यान्वयन के लिए आदिवासी / ग्राम विकास समिति का गठन किया जा रहा है.

मजदूरों की 188 करोड़ मजदूरी का अबतक भुगतान नहीं

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झारखंड सरकार दावा कर रही है कि इस वर्ष 99% मज़दूरों को काम करने के 15 दिनों के अदंर मज़दूरी मिली है. झारखंड नरेगा वॉच ने इसे सबसे बड़ा झूठ करार दिया. मज़दूरों की आधार संख्या की गलत इंट्री, आधार के साथ गलत बैंक खाते का जुड़ाव, मस्टर रोल में बिना नाम जोड़े मज़दूरों से काम करवाना, बिना मज़दूरी भुगतान किए योजनाओं को बंद कर देना आदि के कारण से राज्य के लाखों मज़दूरों को उनकी मज़दूरी मिलती ही नहीं है. पिछले चार वर्षों में 170 करोड़ रु से अधिक की मज़दूरी भुगतान रिजेक्ट हो गयी, जिसमें से 100 करोड़ रु का भुगतान अभी भी लंबित है.

राज्य की न्यूनतम मज़दूरी से 71 रुपये कम मिलते हैं मनरेगा मजदूरों को

भाजपा सरकार द्वारा एक ओर देश और राज्य के आर्थिक विकास का ढिंढोरा पीटा जा रहा है. वहीं दूसरी ओर इस वर्ष नरेगा मज़दूरों की मज़दूरी दर बढ़ाई ही नहीं गयी. झारखंड की नरेगा मज़दूरी राज्य की न्यूनतम मज़दूरी से 71 रुपये कम है. न्यूनतम मज़दूरी से कम दर पर काम करवाना बंधुआ मज़दूरी के सामान है. साथ ही, इस वर्ष लाखों मज़दूरों का भुगतान कई बार रुक गया क्योंकि केंद्र सरकार द्वारा पर्याप्त राशि का समय पर आवंटन नहीं किया गया.

राज्य रोज़गार गारंटी परिषद की बैठक 4 साल में एकबार हुई

झारखंड सरकार की नरेगा मज़दूरों के प्रति मंशा इससे स्पष्ट होती है कि राज्य रोज़गार गारंटी परिषद (जिसकी अध्यक्षता स्वयं मुख्यमंत्री करते हैं एवं जिसकी जिम्मेवारी है राज्य में नरेगा के क्रियान्वयन पर नज़र रखना) की पिछले चार वर्षों में केवल एक बैठक हुई है. ना सामाजिक अंकेक्षण के निर्णयों के अनुसार मज़दूरों के अधिकारों के उल्लंघन के लिए ज़िम्मेवार अधिकारियों पर उचित प्रशासनिक कार्रवाई की जा रही है और न ही 19 ज़िलों में लोकपाल के रिक्त पदों की नियुक्ति. साथ ही, नरेगा कर्मियों के 40 प्रतिशत पद भी रिक्त हैं.

‘नरेगा रोज़गार दो अभियान’ की घोषणा कर भूला जेएमएम

नरेगा मज़दूरों के प्रति राजनीतिक प्रतिबद्धता की कमी केवल सत्तारूढ़ दल तक ही सीमित नहीं है. प्रमुख विपक्षी दलों की ओर से भी मज़दूरों के अधिकारों के लिए किसी प्रकार का संघर्ष नहीं दिख रहा है. वर्तमान विधान सभा सत्र में इन मुद्दों पर न के बराबर चर्चा हुई है. हाल में झारखंड मुक्ति मोर्चा की ओर से ‘नरेगा रोज़गार दो अभियान’ की घोषणा की गई, जो सराहनीय है. लेकिन घोषणा के आगे किसी प्रकार की कार्रवाई नहीं की गयी. झारखंड नरेगा वॉच इन मुद्दों को लेकर पूरे राज्य में 2 फरवरी को प्रदर्शन करेगा.

नरेगा वॉच की ओर से संवाददाता सम्मेलन को जेम्स हेंरेज, संयोजक, तारामणि साहू, सहसंयोजक और अशर्फी नंद प्रसाद और सकीना ने संबोधित किया.

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