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#JharkhandPolitics : क्या झारखंड भाजपा में बाबूलाल नहीं बन सके सर्वमान्य चेहरा

Akshay Kumar Jha

2019 के झारखंड विधानसभा चुनाव में बीजेपी को करारी शिकस्त मिली. जिसके बाद बीजेपी पिछले पांच में पहली बार बैकफुट पर दिखी. रघुवर दास हाशिए पर चले गये. विधानसभा चुनाव के नतीजों ने रघुवर दास को इतना पीछे धकेल दिया कि राज्य में बीजेपी को चेहरा बदलना पड़ा. केंद्र की तरफ से एक परिपक्व राजनीतिक चाल चली गयी. मोहरा बना जेवीएम. पार्टी की तरफ से बाबूलाल मरांडी को सबसे बड़ा चेहरा बनाने की कोशिश की गयी. वजह थी एक आदिवासी चेहरा.

झारखंड ने पांच साल की बहुमतवाली सरकार को ठुकरा कर एक आदिवासी नेता यानी हेमंत सोरेन को अपना नेता चुना. इसलिए बीजेपी को भी एक आदिवासी नेता को मैदान में लाना पड़ा. पार्टी की तरफ से उन्हें विधायक दल का नेता भी चुन लिया गया. लेकिन विधानसभा में उन्हें नेता प्रतिपक्ष का पद नहीं मिल पाया. सत्ता पक्ष ने कागजों पर यह साबित नहीं होने दिया. लिहाजा विधानसभा के बाहर बाबूलाल बीजेपी के विधायक दल के नेता तो हैं, लेकिन विधानसभा में वो एक साधारण विधायक.

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इधर राजनीतिक हलकों में एक बात जोर पकड़ रही है. बात हो रही है कि क्या सच में बाबूलाल को झारखंड बीजेपी ने अपना लिया है. या फिर सिर्फ शीर्ष नेतृत्व के आदेश का पालन हो रहा है. क्योंकि कई ताजा मामले सामने आये हैं, जिससे ये साफ हो रहा है कि बाबूलाल मरांडी बीजेपी का चेहरा तो बना दिये गये, लेकिन वो चेहरा मुरझाया हुआ माना जा रहा है, खिला हुआ नहीं.

चुनाव आयोग से मिली हरी झंडी, लेकिन पार्टी सत्ता पर दबाव नहीं बना सकी

बाबूलाल मरांडी को बीजेपी की तरफ से नेता प्रतिपक्ष बनाने के बाद सत्ता औप विपक्ष आमने-सामने आ गया. राजनीतिक उठा-पटक का अखाड़ा बना विधानसभा का बजट सत्र. लगातार करीब एक हफ्ते तक बीजेपी के विधायकों ने सदन को चलने नहीं दिया. मांग थी कि बाबूलाल को नेता प्रतिपक्ष का दर्जा दिया जाये. लेकिन ऐसा बीजेपी करवा नहीं सकी. बाबूलाल खुद आगे आये और कहा कि अब नेता प्रतिपक्ष को लेकर हंगामा नहीं करेंगे. मामला वहीं शांत हो गया. इसके बाद कभी भी बीजेपी की तरफ से सत्ता पर ऐसा दबाव नहीं बनाते देखा गया. तमाम तरह की बातों का विरोध बीजेपी कर रही है. लेकिन नेता प्रतिपक्ष का माममला ठंडे बस्ते में चला गया. जबकि चुनाव आयोग ने यह साफ कर दिया कि बाबूलाल का बीजेपी में जाना सही है.

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प्रदेश अध्यक्ष के चुनाव में भी रहे साइडलाइन

बाबूलाल के पार्टी में शामिल होने के बाद पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष चुना गया. केंद्र ने दीपक प्रकाश को कमान दी. इस पूरे प्रकरण में बाबूलाल ने दूरी बनाये रखी. पार्टी सूत्रों का कहना है कि बाबूलाल अपने एक उम्मीदवार की वकालत केंद्रीय प्रबंधन से कर रहे थे. लेकिन उनकी बात नहीं बनी. कुछ लोगों का कहना है कि बाबूलाल उस वक्त पार्टी में नये थे. इसलिए उन्होंने किसी का नाम आगे नहीं किया. लेकिन यह भी नहीं भूलना चाहिए कि बाबूलाल का नाता बीजेपी से आज का नहीं है.

बाबूलाल के मजबूत होने से पार्टी के दिग्गज आदिवासी नेता को खतरा

इससे पहले बीजेपी झारखंड के लिए अर्जुन मुंडा पार्टी का आदिवासी चेहरा हुआ करते थे. लोकसभा चुनाव जीतने के बाद उन्हें केंद्रीय मंत्रीपद मिल गया. दिल्ली की राजनीति में मशगूल अर्जुन मुंडा की पकड़ ऐसे भी झारखंड पर कम हो गयी. बाबूलाल की एंट्री से खतरा और बढ़ गया. बाबूलाल का कद पार्टी और झारखंड में जितना बड़ा होता जायेगा दूसरे सभी आदिवासी नेताओं पर खतरा उतना ही गहराता जायेगा. लिहाजा पार्टी को अच्छे से समझनेवाले लोगों का कहना है कि एक खेमा इसलिए भी बाबूलाल को प्रमोट करने से बचता है. इसका ताजा उदाहरण अर्जुन मुंडा की तरफ से मिला है. पार्टी के दूसरे बड़े नेताओं की तरह उन्होंने कभी भी हेमंत सोरेन को सीधा टारगेट नहीं किया. जबकि जेएमएम की तरफ से केंद्र की सत्ता को कई बार निशाने पर लिया गया. कोरोना संकट के दौरान अर्जुन मुंडा ने सीएम हेमंत सोरेन को तीन बार चिट्ठी लिख कर अलग-अलग मामले में आग्रह और अनुरोध किया. लेकिन कभी भी सीधा आरोप नहीं लगाया.

जेएमएम बाबूलाल को घेरता रहा और बीजेपी ने चुप्पी साधे रखी

कोरोना संकट के दौरान डिजिटल राजनीति अपने चरम पर है. फेसबुक, ट्विटर और व्हाट्सएप एक धारदार हथियार की तरह काम कर रहे हैं. तीन दिनों पहले बाबूलाल ने झारखंड के मंत्री मिथिलेश ठाकुर पर ट्विटर के जरिए वार किया. उन्होंने मंत्री जी से कहा कि वो क्वारंटाइन सेंटर न जाया करें, क्योंकि जहां वो गये थे वहां एक घंटे के बाद ही कोरोना का मरीज मिला. साथ में एक वीडियो भी बाबूलाल ने जारी किया. (हालांकि न्यूज विंग उस वीडियो की सत्यता को प्रमाणित नहीं करता है.) इस ट्वीट का काउंटर मंत्री मिथिलेश ठाकुर के अलावा तमाम जेएमएम के लोग करते दिखे. ट्विटर पर बाबूलाल घिरते नजर आये. लेकिन बीजेपी का आइटी सेल और बात-बात पर ट्वीट करनेवाले दिग्गजों ने चुप्पी साध ली.

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