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#JharkhandElection: मनिका सीट पर वोटरों की थाह लगाने में छूट रहे उम्मीदवारों के पसीने, कांग्रेस-भाजपा में सीधा मुकाबला

48% गैर आदिवासी वोटर, 52% आदिवासी वोटरों में से 56% खरवार, 27% उरांव और 9% चेरो जनजाति.

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Pravin kumar

Ranchi : सुबह के करीब नौ बज रहे थे. सूनी परहिया लातेहार-डाल्टेनगंज मुख्य सड़क पर तीन महिलाओं के साथ हाथ में हसुआ लिये खाली पैर चली जा रही थी. यह स्थान बरवाडीह प्रखंड के हेदेहत गांव का सिमाना है.

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काफी अनुरोध के बाद तीनों महिलायें रुकीं. काम पर जाने की बेचैनी उनके चेहरे पर साफ झलक रही थी. महज 10 मिनट की बातचीत में वे कई ऐसी बातें कह गयीं जो इलाके की हकीकत बयां करने के लिए काफी हैं.

सूनी कहती हैं- “क्या करें वोट देकर. बिना मजूरी किये पेट नही भरता.  सरकारी राशन से परिवार का गुजारा नहीं होता. उस पर भी अनाज कम मिलता है. इसे देखने वाला कोई नही.”

चुनाव की बातों से बेखबर सूनी परहिया पूछने पर कहती है- “अभी धनकटनी का समय है. गांव में राजनीतिक पार्टी का झंडा एक दो स्थानों पर लगा है, लेकिन कोई नेता नहीं आया है.”

सूनी की तरह सैकड़ों वोटरों से बातचीत से समझ में आता है कि मनिका विधानसभा क्षेत्र के वोटर खामोश हैं. यही खामोशी सभी उम्मीदवारों को बेचैन कर रही है.

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भाजपा-कांग्रेस के मुकाबले के बीच जदयू के बुधेश्वर सेंधमारी की कोशिश में

मनिका विधानसभा सीट से भाजपा ने अपने सीटिंग विधायक का टिकट काट कर रघुपाल सिंह को उम्मीदवार बनाया है. ऐसा एंटी इनकम्बेंसी से बचने के लिए किया गया है. भाजपा इस सीट पर जीत के लिए कोई कसर नहीं छोड़ना चाहती.

वहीं, 30 साल से इस सीट पर वनवास काट रही कांग्रेस ने इसे जीतने की उम्मीद में राजद से कांग्रेस में आये पूर्व विधायक रामचंद्र सिंह को उम्मीदवार बनाया है. सिंह गठबंधन उम्मीदवार के रूप में अपनी जीत सुनिचित करने के लिए पसीना बहा रहे हैं.

दूसरी ओर रघुपाल सिंह भाजपा और उसके सहमना संगठनों की बदौलत मनिका सीट को पार्टी की झोली में डालने को बेताब हैं.

लेकिन दोनों प्रमुख उम्मीदवारों का सिरदर्द बनी हुई है क्षेत्र के वोटरों की खामोशी.

इधर जदयू से बुधेश्वर उरांव, उरांव वोटरो को रिझाने में लगे हुए है, जबकि झाविमो के प्रत्याशी राजपाल सिंह चुनाव प्रचार में कही नजर नहीं आ रहे हैं.

झारखंड बनने के बाद हुए चुनावों में 2005 में रामचंद्र सिंह राजद से, 2009 में हरिकृष्ण सिंह भाजपा से और 2014 में हरिकृष्ण सिंह विधायक रहे.

विधानसभा क्षेत्र कृषि बहुल होने के बाद भी सिंचाई के बेहतर साधन विकसित नहीं किये गये हैं. मनिका बाजार में कई किसानो से बतचीत की तो उन्होने कहा कि मुख्यमंत्री कृषि आशीर्वाद योजना का लाभ नहीं मिला है. क्षेत्र से रोजगार के लिए बड़ी संख्या में युवक-युवतियों का पलायन महानगरों की ओर होता है.

मनिका का महत्पूर्ण फेक्टर: युवा कहते हैं, मुनेश्वर बोली तो रामचंद्र के वोट देअब

#JharkhandElection: मनिका सीट पर वोटरों की थाह लगाने में छूट रहे उम्मीदवारों के पसीने, कांग्रेस-भाजपा में सीधा मुकाबला
मुनेश्वर उरांव.

कांग्रेस उम्मीदवार रामचंद्र सिंह चेरो जनजाति समुदाय से आते हैं. मनिका विधानसभा में 9% आबादी चेरो समुदाय की है. विधानसभा के बूथ संख्या 1 से लेकर 16 तक रामचंद्र सिंह को चेरो बहुल इलाके में 90 प्रतिशत वोट मिलता है.

महुआडांड़ प्रखंड में कांग्रेस उम्मीदवार को अधिक वोट मिलने की संभावना दिख रही है जबकि गारू प्रखंड में कांग्रेस और भाजपा उम्मीदवारों के बीच कांटे की टक्कर देखने को मिल सकती है.

वहीं इलाके में कांग्रेस जिलाध्यक्ष मुनेश्वर उरांव को पार्टी द्वारा टिकट नही दिये जाने को लेकर भी कांग्रेस के प्रति ग्रामीणों में नाराजगी दिख रही है. इसका प्रभाव लोहरदगा विधानसभा सीट पर भी देखने को मिल सकता है जहां से खुद प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष रामेश्वर उरांव चुनाव मैदान में हैं.

इलाके में कई गांवो में मुनेश्वर को लोग लेकर चर्चा करते नजर आये. कुछ युवाओं ने पूछने पर सीधा कहा- मुनेश्वर बोली तो रामचंद्र के वोट देअब.

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क्या कहते हैं निर्वतमान विधायक हरे कृष्णा सिंह के समर्थक?

हरे कृष्णा सिंह.

भाजपा के पूर्व विधायक हरे कृष्णा सिंह सीधे तौर पर उम्मीदवारी काटे जाने का विरोध तो नहीं कर रहे हैं लेकिन उनके समर्थको को टिकट काटे जाने का मलाल जरूर चेहरे पर दिखाई देता है. समर्थक जरूर पूछते हैं कि आखिर उनका टिकट क्यों कटा?

नाम ना छापने की शर्त पर समर्थक कहते हैं कि टिकट कटना और काटने का खेल सीधा मुख्यमंत्री बनाने से जुड़ा हुआ है. हरे कृष्णा सिंह एक केंद्रीय मंत्री के नजदीकी होने की खामियाजा भुगत रहे हैं.

वर्तमान मुख्यमंत्री ने नये चेहरे की सिफारिश की, जबकि विधायक क्षेत्र में सक्रिय रहे हैं, काम भी किया है. फिर भी भाजपा ने टिकट कटा है.

रामचंद्र और रघुपाल के बीच सीधा मुकाबला

रामचंद्र सिंह की मजबूती कबरी, कोटम, लाई, बदुआ, सरयू, गणेशपुर, पीरी, चतम, रेवत, कुचल, मइल, मोटलोंग, डूकी, पगर, जोखा कोई जैसे बूथों में समर्थकों की गतिविधियों से नजर आयी, जबकि बरबाडीह, मंगरा, केचकी, कंचनपुर, बेतला, खूरा, चपरी, छेछा, कुचला, छिपादोहर, हरातू, मुंडू जैसे बूथों के इलाके में भाजपा समर्थकों की गतिविधि नजर आती है.

भाजपा और कांग्रेस खेमे में बंटे हैं इन गांव के वोटर

कई गांव इलाके में ऐसे नजर आये जहां उम्मीदवारो के पक्ष में ग्रामीण बंटे नजर आये, जिनमें धनकारा, परसही, वेदी, देववार, सिंजो, बरबया, बड़ी, तुबांगड़ा, पटना, छल्लकी, जन्हो जैसे गांव हैं.

क्या है मनिका विधानसभा सीट पर जातीय समीकरण

मनिका विधानसभा अनुसूचित जनजाति के लिए रिजर्व सीट है. विधानसभा क्षेत्र में 52% आदिवासी आबादी है जिसमें मुख्य रूप से 56% खरवार, 27% उरांव और 9% चेरो हैं.

जनजातियों में मुंडा समुदाय भी मौजूद है लेकिन इनकी संख्या आदिम जनजाति के बराबर है. कोरवा, परहिया बिरुजिया, नगेशिया जैसी आदिम जनजातियां भी हैं. वहीं 48% आबादी का हिस्सा गैर-आदिवासी वोटरों का है जिसमें 30 हजार के करीब मुस्लिम हैं.

विधानसभा क्षेत्र में 40000 वोटर पिछड़ी जातियों से हैं जिसमें सबसे अधिक बनिया समुदाय से हैं. विधानसभा में कुल वोटों का 11%  सवर्ण जातियों का है जिसमें ब्राह्मण, राजपूत व अन्य जातियां शामिल हैं.

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