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JHARKHAND: खिलाड़ियों को तराशने में जिसने उम्र खपा दी, वह फाकाकशी में गुजार रहीं आखिरी दिन

Ranchi: नयी खेल नीति अब तक ठंडे बस्ते में है. इसका खामियाजा एथलेटिक्स की पूर्व कोच मारिया गोरती खलखो को उठाना पड़ रहा है. खेल विभाग में 30 सालों तक सेवा देने के बावजूद तंगहाली का जीवन जीना उसकी नियति बन गयी है. जेवलिन थ्रो की नेशनल प्लेयर भी रह चुकी मारिया ने महुआडांड़ एथलेटिक बालिका सेंटर, लातेहार में 1988 से अगस्त 2018 तक संविदा पर 30 सालों तक सेवा भी दी थी. रिटायरमेंट के बाद उनके हाथ खाली ही रहे. अब स्थिति यह है कि उन्हें वृद्धा पेंशन पाने को जुगत लगानी पड़ रही है. दो सालों से एक लंग्स के भरोसे जी रही मारिया अब बिस्तर धर चुकी हैं. बीमारियों की वजह से और ढंग से इलाज की सुविधा नहीं मिलने से शरीर अब साथ छोड़ रहा. उधर, मदद के नाम पर खेल विभाग नीति, प्रावधानों को परखने में ही समय गुजार रहा है.

 

कर्जदार होती जिंदगी

खेल के जुनून में मारिया शादी नहीं कर सकी. रिटायरमेंट के बाद आऱा गेट (नामकुम, रांची) में अपनी सगी बहन के घर में आसरा लिये हुए है. दिन काट रही हैं. लंग्स की परेशानी संबंधी गंभीर इश्यू पर 2019 में रिम्स से इलाज शुरू कराया. अब उन्हें लगातार दवाओं का सहारा लेना होता है. हर माह 4000 रुपये से अधिक की जरूरत केवल दवाओं की होती है. साथ ही दूसरी जरूरतें हैं जिनके लिए इदर उदर से मदद लेनी होती है. बीमारी शुरू होने के बाद से अब तक 1 लाख से भी अधिक का कर्ज उनके माथे चढ़ चुका है. अब तो स्थिति उनकी और मुश्किल हो गयी है. अपने घर में बिस्तर पर ही पड़े पड़े अपने दिन गिन रही है.

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सीएम ने लिया था संज्ञान

गौरतलब है कि फरवरी माह में विधायक सीता सोरेन ने मारिया के लिये सहयोग की अपील सीएम से की थी. इसके बाद सीएम हेमंत सोरेन ने रांची जिला प्रशासन से मारिया को आर्थिक और स्वास्थ्य सेवा के लिये सहयोग करने को कहा था. इसके बाद उसे उस दौरान 25 हजार रुपये की तात्कालिक सहायता दी गयी थी. हालांकि इसके बाद अप्रैल में भी मारिया गंभीर स्थिति में रिम्स, रांची में इलाज के लिये लायी गयी थी. यहां भी खेल विभाग के स्तर से 25 हजार की मदद दी गयी थी. वैसे पूर्व में भी उसे खिलाड़ी कल्याण सहायता कोष से खेल निदेशालय ने एक लाख रुपये की मदद दिलायी थी. हालांकि यह सब मदद उसके लिये उंट के मूंह में जीरा वाली बात है.

 

क्या कहता है विभाग

खेल सचिव अमिताभ कौशल के मुताबिक मारिया के केस में विभाग की नजर है. नीतियों के मुताबिक सहायता का जो भी प्रावधान होगा, उन्हें मदद मिलेगी. वैसे जानकारी के मुताबिक मारिया को मदद का मसला जिला संचालन समिति के पास 3 माह से भी अधिक समय से अटका है. इसमें डीसी, डीडीसी और डीएसओ की अहम भूमिका होती है. पर पंचायत चुनाव और अन्य व्यस्तताओं की वजह से इसकी बैठक नहीं होने की खबर है. समिति की अनुशंसा के बाद ही खेल विभाग जरूरी आर्थिक सहयोग पर निर्णय लेगा. तब तक मारिया अपनी सांसें गिनती रहेगी.

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क्या कहता है खेल संघ

झारखंड ग्रैपलिंग संघ के प्रमुख प्रवीण सिंह कहते हैं कि सरकार नयी खेल नीति का लागू करने और खिलाड़ियों, कोचों को प्रोत्साहित करने की बात कहती है. पर आखिर धरातल पर कब तक नयी नीति उतरेगी. ऐसा लगता है मानो यह पंचवर्षीय योजना का हिस्सा हो. इसे तुरंत लागू करना चाहिये. पिछले कुछ माह पहले एक खिलाड़ी मर गया. मारिया जैसी कोच अभी बीमार है. इन्हें अब तक मदद नहीं मिली है. ऐसे अनेकों खिलाड़ियों, कोचों के उदाहरण हैं.

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