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उच्च शिक्षा में सालाना साढ़े चार सौ करोड़ खर्च करने वाले झारखंड से हर साल बाहर जाते हैं लगभग 150 करोड़

  • राज्य में मौजूद हैं सात राष्ट्रीय स्तर के संस्थान
  • हर साल 15 हजार बच्चे जाते हैं झारखंड से बाहर
  • 150 करोड़ रुपये से अधिक रुपये जाते हैं दूसरे राज्य

Rahul Guru

Ranchi : झारखंड सरकार उच्च और तकनीकी शिक्षा पर एक साल में लगभग साढ़े चार सौ करोड़ रुपये खर्च करती है. साल दर साल राज्य में सरकार के प्रयासों से कई संस्थान खुले. कई राज्य स्तर के तो राष्ट्रीय स्तर के भी संस्थान हैं.

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इन सबके बाद भी राज्य से केवल उच्च और तकनीकी शिक्षा के लिए हर साल बड़ी संख्या में स्टूडेंट्स दूसरे राज्यों की ओर जाते हैं. इंजीनियरिंग और मैनेजमेंट दो ऐसे विषय हैं, जिनके लिए झारखंड के लगभग हर शहर से स्टूडेंट्स दूसरे राज्य की ओर रूख करते हैं. राज्य से हर साल औसतन 150 करोड़ रुपये दूसरे राज्य जाते हैं. वहीं बच्चों की संख्या 15 हजार के करीब होती है.

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आइआइटी से आइआइएम तक हैं यहां, फिर भी नहीं है डिमांड

झारखंड में राष्ट्रीय स्तर के कई संस्थान हैं. राष्ट्रीय स्तर के संस्थानों की बात करें तो यहां मैनेजमेंट की पढ़ाई के लिए आइआइएम, इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए आइआइटी, एनआइटी और ट्रिपल आइटी, लॉ की पढ़ाई के लिए नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी, होटल मैनेजमेंट की पढ़ाई के लिए इंस्टीट्यूट ऑफ होटल मैनेजमेंट हैं.

इसके अलावा एक केंद्रीय विश्वविद्यालय भी है. वहीं राज्य स्तर पर पहचान रखने वाले संस्थानों में बीआइटी, रक्षाशक्ति विवि, तकनीकी विश्वविद्यालय हैं. वहीं छह स्टेट यूनिवर्सिटी के अलावा 46 पॉलिटेक्निक और दो दर्जन से अधिक औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान है. इसके बाद भी यहां के उच्च और तकनीकी शिक्षा देने वाले संस्थान दूसरे राज्यों में डिमांड में नहीं रहते हैं.

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हजारों में स्टूडेंट्स और करोड़ों में रुपये जा रहे बाहर

शिक्षा के क्षेत्र में काम करने वाले विभिन्न एजेंसियों, संस्थानों और विशेषज्ञों की संयुक्त राय देखें तो इसमें कोई संदेह नहीं है कि राज्य से हर साल हजारों में बच्चे विभिन्न कोर्स की पढ़ाई के लिए बाहर जा रहे हैं. साथ ही उनके साथ करोड़ों रुपये भी जा रहे हैं.

मैंनेजमेंट संस्थान चलाने वाले संतोष कुमार के मुताबिक रांची जैसे शहर से एमबीए की पढ़ाई करने दो हजार से अधिक बच्चे मुंबई, बेंगलुरू, दिल्ली और नोएडा जैसे शहरों की ओर रूख करते हैं. इसी तरह इंजीनियरिंग में आठ हजार के करीब बच्चे दूसरे राज्य जाते हैं. इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए दक्षिण भारत, ओडिशा, बंगाल और दिल्ली में रहते हैं.

लॉ एंट्रेंस एग्जामिनेशन की तैयारी कराने वाले करण क्लासेस के निदेशक करण कुमार बताते हैं कि केवल मेरे यहां से तैयारी कर लॉ की पढ़ाई के लिए 600 से अधिक स्टूडेंट्स दिल्ली और बेंगलुरू जा रहे हैं. इस तरह से लॉ की तैयारी कराने वाले कई और संस्थान हैं, जहां से 200 के करीब बच्चे बाहर जा रहे हैं.

एक्सपर्ट के अनुमान के मुताबिक 15 हजार से अधिक स्टूडेंट्स हर साल दूसरे राज्य जाते हैं. चाहें इंजीनियरिंग की पढ़ाई हो, मैनेजमेंट की पढ़ाई हो या लॉ की पढ़ाई हो. एक कोर्स को पूरा करने में 10 से 12 लाख रुपये खर्च होते हैं. ऐसे में हिसाब लगायें तो 150 करोड़ से अधिक पैसा हर साल राज्य से बाहर जा रहा है.

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हर उच्च और तकनीकी शैक्षणिक संस्थान में शिक्षकों की कमी

उच्च और तकनीकी शिक्षा पर करोड़ों रुपये खर्च करने के बाद भी स्टूडेंट्स के पलायन होने की वजह संस्थानों का मुकम्मल नहीं होना भी है. बीते पांच साल में राज्य में पांच से अधिक संस्थान खुले, जिसमें ट्रिपल आइटी, रक्षा शक्ति विवि, तकनीकी विश्वविद्यालय और तीन स्टेट यूनिवर्सिटी शामिल हैं.

स्टेट यूनिवर्सिटी में शिक्षकों की भारी कमी है. यहां 4562 शिक्षकों की जरूरत है, जबकि कार्यरत शिक्षकों की संख्या 2224 ही है. इसी तरह टेक्निकल यूनिवर्सिटी में 92 स्वीकृत पद में से 91 पद रिक्त हैं. देश की तीसरा रक्षाशक्ति विश्वविद्यालय झारखंड अपने स्थापना काल से लेकर अब तक किराये के भवन में चल रहा है. वहीं यहां कार्यरत शिक्षक भी कांट्रैक्ट पर हैं. राज्य में मौजूद पॉलिटेक्निक संस्थानों में 432 पद शिक्षकों के हैं, लेकिन 89 शिक्षक ही कार्यरत हैं.

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