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Jharkhand Panchayat Election- 2022 : गांव की सरकार हो या सूबे की, बोड़ाम के कर्ण सिंह जैसे गरीब आदिवासियों को क्या फर्क पड़ता है?

Special Correspondent 

Jamshedpur : झारखंड में सात साल बाद फिर गांव की सरकार बनने जा रही है. पंचायत के चुनाव हो रहे हैं. अभी नामांकन पत्र भरे जा रहे हैं. पंचायत समिति सदस्य, वार्ड मेंबर, मुखिया और जिला परिषद का सदस्य बनने की होड़ लगी है. नामांकन के बाद प्रत्याशीगण पांव-पांव गांव-गांव नापेंगे. रंगबिरंगे बैनर-पोस्टर छपेंगे. प्रत्याशी सोशल मीडिया से लेकर मुख्यधारा की मीडिया तक में जबरन मुस्कुराते हाथ जोड़े तसवीर छपवायेंगे. आसमान से चांद-तारे तोड़ लाने जैसे असंभव वादे भी करेंगे. लेकिन क्या ये वादे धरातल पर कभी उतर भी पायेंगे. अगर मुखिया से लेकर विधायक- सांसद बनने तक प्रत्याशी जितने वादे करते हैं, आम आदमी तक उसका रत्ती भर भी पहुंच पाता, तो भला आज कर्ण सिंह अपनी चार बेटियों और बूढ़ी मां के साथ एक खतरनाक रूप से जर्जर ऐसे घर में क्यों रहता, जो कभी भी उसकी मौत का कारण बन सकता है.

बोड़ाम प्रखंड की पहाड़पुर पंचायत में है कोयरा गांव में रहता है कर्ण सिंह. कर्ण सिंह को गरीब लिखा जा सकता है, लेकिन वह इतना मुफलिस है कि गरीब लिख देने भर से उसकी दयनीय हालत का जरा भी अंदाजा नहीं लगाया जा सकता. कर्ण सिंह आदिवासी समुदाय से आता है. वही समुदाय, जिसके नाम पर झारखंड में सबसे ज्यादा राजनीति होती है. कोढ़ में खाज की कहावत हम सबने सुनी है. लेकिन कर्ण सिंह इसे भोग रहा है. उसकी पत्नी को कुष्ठ रोग है. लिहाजा वह अपनी तीन बच्चियों को पति के भरोसे छोड़ कर कुष्ठ आश्रम चली गयी. उसकी सबसे छोटी बेटी महज एक साल की है. जंगल से लकड़ी चुनकर बाजार में बेच कर कर्ण सिंह को जो थोड़े बहुत पैसे मिलते हैं, उससे वह किसी तरह अपना, अपनी बूढ़ी मां और तीन बच्चियों का पेट भर पाता है. जिस कच्चे मकान में कर्ण सिंह और उसका परिवार रहता है, वह इतना जर्जर है कि कभी भी उसकी दीवारें गिर कर उसके परिवार को मौत की नींद सुला सकती हैं.

हर रात कर्ण और उसका परिवार सुबह का सूरज देखने की उम्मीद लिये खौफ के साये में सोता है. दुःखों का पहाड़ उठानेवाले इसपरिवार की दुर्दशा की सूचना पाकर मंगलवार को जिला विधिक सेवा प्राधिकार (डालसा) की टीम उसके घर पहुंची. अब डालसा से कर्ण को क्या मदद मिलती है, यह तो समय बतायेगा. लेकिन विडंबना है कि बोड़ाम प्रखंड के पीएलवी निताई चंद्र गोराई ने एक साल पहले बोड़ाम बीडीओ को कर्ण की हालत की जानकारी देते हुए उसके परिवार को शीघ्र पीएम आवास देने कराने की अनुशंसा की थी. लेकिन बीडीओ साहब दूसरे ज्यादा जरूरी कामों में व्यस्त हो गये. शायद ब्लॉक की विकास योजनाओं का क्रियान्वयन कराना  एक आदिवासी परिवार की जिंदगी से ज्यादा जरूरी था उनके लिए. इसके बाद भी  कई बार बीडीओ से मिलकर भी पीड़ित परिवार के नाम से पीएम आवास या शेड देने का आग्रह किया गया, लेकिन कर्ण सिंह को मकान नहीं मिला.

बात यहीं खत्म नहीं होती. सरकारी विकास योजनाओं की उपलब्धियों का ढोल पीटनेवाले अधिकारियों की पोल तो तब खुली, जब  “आपकी सरकार आपके अधिकार आपके द्वार” कार्यक्रम में फिर बोड़ाम बीडीओ को लिखित आवेदन देकर आवास उपलब्ध कराने की मांग की गयी. जिला विधिक सेवा प्राधिकार, जमशेदपुर के पीएलवी निताई चंद्र गोराई, अरुण रजक और राजीव महतो ने “आपकी सरकार आपके अधिकार आपके द्वार” कार्यक्रम के तहत पहाड़पुर पंचायत में बीडीओ बोड़ाम को लिखित आवेदन देकर कर्ण सिंह और उसके परिवार को तत्काल आवास मुहैया कराने की भी मांग की, लेकिन कुछ नहीं हुआ. सनद रहे कि . “आपकी सरकार आपके अधिकार आपके द्वार” वही कार्यक्रम था, जिसकी उपलब्धियों की खबरें बड़े जोर-शोर से प्रचारित की गयी थी. जिलों से लेकर प्रखंडों तक लाभुकों के हंसते-मुस्कुराते फोटो टेस्टिमोनियल के साथ दिखाये जाते थे. लेकिन इन सारी उपलब्धियों को बोड़ाम प्रखंड की पहाड़पुर पंचायत के कोयरा गांव में कर्ण सिंह का जर्जर कच्चा घर आईना दिखा रहा है. यह घर यह भी कहता है कि जनप्रतिनिधियों अपने वादों की कदर करते और सचिवालयों में जो नीतियां बनती हैं, उनका पालन जिला से लेकर प्रखंडों तक के अधिकारी अगर ईमानदारी से करते, तो कर्ण सिंह और उसके जैसे हजारों जरूरतमंद गरीब आज अपनी नारकीय जिंदगी को अपनी नियति न माने बैठे होते.

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