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मजदूर कल्याण के 313 करोड़ से अपना घाटा पाटने में लगी झारखंड सरकारः CAG 

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Giridih: झारखंड सरकार भले ही श्रमिक के हित में कार्य करने का लाख दावा करे, लेकिन सच्चाई ठीक इसके विपरित है. राज्य सरकार मजदूरों के कल्याण में खर्च होने वाले पैसों को गलत तरीके से अपना घाटा कम करने में लगा रही है. यह खुलासा भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) ने अपनी रिपोर्ट में किया है.

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रिपोर्ट में कहा गया है कि मजूदरों के कल्याण के नाम पर उपकर के मद में 312.90 करोड़ रुपये वसूले, लेकिन अभी तक इस राशि को श्रमिक कल्याण बोर्ड में जमा नहीं कराया गया है. राज्य सरकार ने इस पैसे का इस्तेमाल राजकोषीय घाटे को कम करने में भी किया है. कैग ने इसे गलत बताते हुए राज्य सरकार की कार्यशैली पर सवाल खड़े किये हैं.

वित्तीय अनियमितता का उदाहरण

CAG की रिपोर्ट में झारखंड सरकार पर गंभीर सवाल उठाए गए हैं. रिपोर्ट के अनुसार, श्रमिक कल्याण उपकर (सेस) के नाम पर झारखंड सरकार ने वर्ष 2008-09 से साल 2016-17 (8 साल) के बीच सरकारी परियोजनाओं का ठेका लेने वाले ठेकेदारों से 312.90 करोड़ रुपये वसूल किये. इन पैसों को मजदूरों के हित में खर्च करना था, लेकिन सरकार ने ऐसा नहीं किया.

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झारखंड सरकार ने उपकर के मद में वसूली गई राशि को श्रमिक कल्यााण बोर्ड (फरवरी 2018 तक) में जमा ही नहीं कराया. CAG ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि श्रमिक कल्याण बोर्ड में पैसे को जमा ना कराने के कारण सेस वसूलने का उद्देश्य पूरा नहीं हो सका. साथ ही राज्य सरकार की जवाबदेही पर भी सवाल उठाया गया है. CAG ने झारखंड के वित्त विभाग से सेस के मद में वसूली गई राशि को जल्द से जल्द श्रमिक कल्याण बोर्ड में जमा कराने को सुनिश्चित करने की सिफारिश की है.

सीएजी ने उठाए गंभीर सवाल

CAG ने श्रमिकों के कल्यााण के लिए वसूले जाने वाले उपकर के संबंध में निर्धारित प्रावधानों का भी हवाला दिया है. रिपोर्ट में कहा गया है कि कांट्रैक्टल लेबर (रेग्यूलेशन एंड एबोलिशन) रूल्सा, 1971 के तहत श्रमिक कल्याण के मद में लगाए गए सेस से प्राप्त राशि को श्रमिक कल्याण बोर्ड में जमा कराना अनिवार्य है. ताकि इस पैसे का इस्तेमाल मजदूरों के कल्याण में किया जा सके. रिपोर्ट के अनुसार, तमाम नियम-कायदे के बावजूद राज्ये सरकार ने प्रावधानों का पालन नहीं किया.

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झारखंड सरकार पर गंभीर सवाल उठाते हुए रिपोर्ट में कहा गया कि श्रमिक कल्याण उपकर से मिली राशि का राजस्व के तौर पर इस्तेमाल किया गया और संबंधित वर्षों में इसे रिवेन्यू सरप्लस (राजस्व की अधिकता) के तौर पर दिखाया गया. साथ ही राजकोषीय घाटे (सरकार की आय और खर्च का अंतर) को भी कम करके दिखाया गया.

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