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पोषाहार नहीं दे रही झारखंड सरकार और जोर-शोर से मनाया जा रहा है पोषण माह

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Ranchi: पूरे झारखंड में पोषण माह मनाया जा रहा है. जिला और प्रखंड स्तर पर कार्यक्रमों का आयोजन हो रहा है. सरकार और समाज कल्याण विभाग की कोशिश है कि धूम-धाम से पोषण माह मनाया जाए. इसके लिए पंचायत प्रतिनिधियों को बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेने की अपील की जा रही है. लेकिन गौर करने वाली बात यह है कि बिना पोषाहार दिए ही राज्य की सरकार पोषण माह मना रही है.

राज्य भर में सरकार की तरफ से दिए जाने वाले पोषणयुक्त ‘रेडी टू इट’ पोषाहार पिछले चार महीने से बंद है. ‘रेडी टू इट’ आंगनबाड़ी केंद्र के माध्यम से छोटे बच्चों गर्भवती एवं धात्री महिलाओं को दिया जाता है, ताकि जन्म से पहले और बाद में मां और बच्चे सेहतमंद रह सकें.

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उपायुक्त पोषाहार नहीं बल्कि दे रहे हैं निर्देश

30 अगस्त को राज्य के करीब-करीब सभी उपायुक्तों ने कार्यशाला आयोजित कर आंगनबाड़ी की सभी पर्यवेक्षिकाओं को यह निर्देश दिया है कि राष्ट्रीय पोषण माह के तहत जिले में जन-जन तक जाकर जमीनी स्तर की सही रिपोर्ट जिला मुख्यालय में दें. ताकि, सही लोगों तक सही पोषण पहुंच सके. मगर जमीनी हकीकत कुछ और ही है. राज्य के बच्चों एवं महिलाओं को पिछले चार महीनों से पौष्टिक आहार नहीं दिया जा रहा है.

अंडा तो नसीब ही नहीं

सरकार ने पोषाहार के साथ बच्चों को अंडा और फल देने की व्यवस्था की है. ताकि, बच्चे कुपोषित न हों. यह योजना चार जून 2018 से लागू है. दिलचस्प बात यह है कि बच्चों को अंडा तो देना शुरू किया गया. लेकिन, बच्चों की संख्या जितना नहीं. इतना ही नहीं, जो अंडे बच्चों के बीच परोसे गए वो काफी निम्न स्तर के हैं. कई जगह जांच में यह मामला सामने आया है. इसके अलावा जो बच्चे अंडों का सेवन नहीं करते हैं उन्हें फल देना था. लेकिन, शायद एक बार भी नहीं हुआ, जब बच्चों ने फल खाया हो. इस बात की शिकायत सेविकाओं ने सीडीपीओ से कई बार की. लेकिन, कोई फायदा नहीं हुआ.

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आंकड़े जो सच बयां करते हैं

नौनिहाल कैसे तंदुरुस्त रहें. इस पर भी सवालिया निशान खड़े हो गए हैं. ‘रेडी टू इट’ अब रेडी नहीं, बल्कि देरी के चक्कर में फंसता जा रहा है. बताते चलें कि पूरे प्रदेश में इस योजना के तहत 34 लाख 85 हजार 416 लाभुक हैं. इसमें 27 लाख दो हजार 944 बच्चों के साथ 20 हजार 216 अति कुपोषित बच्चे और 7 लाख 62 हजार 256 गर्भवती और बच्चों को दूध पिलाने वाली माताएं भी शामिल हैं.

एक्सटेंशन और टेंडर के चक्कर में फंस रहा मामला

योजना एक्सटेंक्शन व टेंडर के चक्कर में पिछले चार माह से फंसी है. एक्सटेंशन देते-देते कंपनियों का विभाग पर करोड़ों का बकाया हो गया था. झारखंड में 38,640 आंगनबाड़ी केंद्रों में पोषाहार की आपूर्ति करने वाली तीन कंपनियों ने सरकार पर 335 करोड़ रुपये का दावा भी ठोंका. पहली बार पूरक पोषाहार के लिए जो टेंडर निकाला गया, उसके नियम इतने सख्त थे कि पूरे देश भर से इतने बड़े काम को करने के लिए सिर्फ छह कंपनियों ने ही रुचि दिखायी. इन छह कंपनियों में तीन वो कंपनियां थी जो पहले से ही राज्य में पूरक पोषाहार बांटने का काम कर रही थी. बाकी तीन कंपनियों में यूपी की चेमेस्टर, महाराष्ट्र की महिला गुट और तमिलनाडू की राशि न्यूट्री फूड शामिल थीं. दोबारा विभाग की तरफ से 21 मई को जो टेंडर निकाला गया, उसमें भी मामूली बदलाव था. टेंडर भरने के लिए कंपनी के टर्नओवर में किसी तरह का कोई बदलाव नहीं किया गया है. पहली बार की तरह इस बार भी कंपनी के टर्नओवर को 95 करोड़ रखा गया. स्वयं सहायता ग्रुप और सखी मंडलों के लिए टर्नओवर 24 करोड़ रखा गया. बदलाव सिर्फ ईएमडी (अर्नस्ट मनी डिपोजिट) में किया गया. इसके बाद मनचाही कंपनियों को टेंडर देने के लिए समाज कल्याण विभाग के द्वारा छोटी-छोटी बातों पर पोषाहार का टेंडर रद्द कर दिया गया.

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